उपराज्यपाल मनोज सिन्हा: सनातन धर्म ने कभी खुद को नहीं थोपा, विविधता और सहअस्तित्व है इसकी पहचान
सारांश
मुख्य बातें
जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने शनिवार, 27 जून 2026 को श्रीनगर में आयोजित एक अंतरधार्मिक संवाद कार्यक्रम में कहा कि प्राचीन हिंदू धर्म — सनातन धर्म — ने अपने हजारों साल के इतिहास में कभी स्वयं को किसी पर थोपा नहीं, बल्कि विविधता और सहअस्तित्व को अपनी मूल शक्ति के रूप में अपनाया। यह कार्यक्रम राष्ट्रीय उर्दू भाषा संवर्धन परिषद और अंतरधार्मिक सद्भाव फाउंडेशन ऑफ इंडिया द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किया गया था।
भारतीय सभ्यता की विरासत
उपराज्यपाल सिन्हा ने भारत को एक ऐसी प्राचीन सभ्यता के रूप में रेखांकित किया जो आपसी सम्मान की नींव पर खड़ी है। उन्होंने कहा कि भारत में विभिन्न धर्म न केवल सहअस्तित्व में रहे हैं, बल्कि फले-फूले हैं और विश्व को शांति का संदेश भी दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि प्राचीन भारत ने ईसाई धर्म, इस्लाम, यहूदी धर्म और पारसी धर्म को यहाँ पनपने की पूर्ण स्वतंत्रता दी।
सिन्हा ने कहा, वेद और उपनिषद जैसे प्राचीन ग्रंथ सदैव सद्भावपूर्ण जीवन का पाठ पढ़ाते आए हैं। उन्होंने इस दर्शन को 'भारतीयता' की संज्ञा दी — वह लोकाचार जो विश्व को सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान, सत्य की खोज, विविधता में एकता और वसुधैव कुटुंबकम का विचार देता है।
सनातन धर्म का वैश्विक संदेश
उपराज्यपाल ने कहा कि संघर्षों और असहिष्णुता से जूझ रही आज की दुनिया में सनातन धर्म और भारतीय दर्शन की मूल भावना एक मार्गदर्शक प्रकाश का काम कर सकती है। उन्होंने कहा कि आज दुनिया धर्म, भाषा और नस्ल के आधार पर बंटी हुई है, लेकिन भारतीय विचार में इन विभाजनों को पाटने की अनूठी क्षमता है।
उन्होंने ऋषियों के उस शाश्वत सिद्धांत का भी उल्लेख किया जिसमें कहा गया है कि सत्य किसी एक मार्ग तक सीमित नहीं है — सत्य अनंत है और उस तक पहुँचने के अनेक मार्ग हैं। इसीलिए, उन्होंने कहा, भारत ने विविधता को विभाजन नहीं बल्कि वरदान माना है।
कश्मीरियत और भारतीयता का संबंध
सिन्हा ने जम्मू-कश्मीर को भारत का 'मुकुट रत्न' बताते हुए कहा कि यहाँ सदियों से सद्भाव और सहअस्तित्व जीवन का अभिन्न अंग रहा है। उन्होंने 'कश्मीरियत' शब्द की व्याख्या करते हुए कहा कि यह वास्तव में 'भारतीयता' के दर्शन से उत्पन्न हुआ है — वह भावना जो वैदिक काल से ही सभी धर्मों, संस्कृतियों और परंपराओं के प्रति समान सम्मान का आह्वान करती है।
गौरतलब है कि यह कार्यक्रम ऐसे समय में आयोजित हुआ जब जम्मू-कश्मीर में अंतरधार्मिक संवाद और सामाजिक एकजुटता को नई गति देने के प्रयास तेज हो रहे हैं।
इस्लाम और भारतीय संस्कृति का संगम
उपराज्यपाल ने कहा कि जब 12वीं और 13वीं शताब्दी में इस्लाम भारत आया और सूफी संत तथा इस्लामी विद्वान यहाँ पधारे, तो उन्होंने प्रेम, आध्यात्मिकता, करुणा और समानता पर आधारित एक अद्वितीय भारतीय संस्कृति पाई। यह मिलन भारत की उस सहिष्णु परंपरा का प्रमाण है जो विभिन्न विचारधाराओं को आत्मसात करने में सक्षम रही है।
युवा पीढ़ी से आह्वान
सिन्हा ने युवा पीढ़ी से आग्रह किया कि वे इस दृष्टिकोण को आगे बढ़ाएँ और विश्व को यह याद दिलाएँ कि आपसी सम्मान के माध्यम से ही स्थायी शांति संभव है। उन्होंने कहा कि भारत एक जीवंत विचार है जो यह घोषणा करता है कि मानवता को एक परिवार की तरह मिलकर रहना चाहिए। आने वाले समय में इस संवाद की निरंतरता और इसका विस्तार ही भारत की वैश्विक भूमिका को परिभाषित करेगा।