28 जून 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

कश्मीरियत सहअस्तित्व की आत्मा है, धर्म से ऊपर मानवता: कर्ण सिंह का श्रीनगर में संदेश

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
कश्मीरियत सहअस्तित्व की आत्मा है, धर्म से ऊपर मानवता: कर्ण सिंह का श्रीनगर में संदेश

सारांश

पूर्व सदर-ए-रियासत कर्ण सिंह ने श्रीनगर में कहा — कश्मीरियत महज़ एक शब्द नहीं, सदियों की सहअस्तित्व की जीती-जागती परंपरा है। सूफीवाद, लाल डेड और नंद ऋषि की विरासत को याद दिलाते हुए उन्होंने एक सीधा संदेश दिया: मानवता धर्म से ऊपर है।

मुख्य बातें

कर्ण सिंह ने 27 जून 2026 को श्रीनगर में अंतरधार्मिक संवाद कार्यक्रम को संबोधित किया।
कश्मीरियत को सूफीवाद और साझा सांस्कृतिक मूल्यों में निहित सहअस्तित्व की आत्मा बताया।
1893 की शिकागो विश्व धर्म संसद और स्वामी विवेकानंद के सार्वभौमिक संदेश का उल्लेख किया।
लाल डेड, मीर सैयद अली हमदानी और नंद ऋषि को प्रेम व सहिष्णुता की परंपरा के प्रतीक बताया।
ऋग्वेद के श्लोक 'एकम सत विप्रा बहुधा वदन्ति' का हवाला देते हुए कहा — सभी धर्म एक ही सत्य की ओर जाते हैं।
स्पष्ट संदेश: मानवता को सदैव धार्मिक मतभेदों से ऊपर रखा जाना चाहिए।

जम्मू-कश्मीर के पूर्व 'सदर-ए-रियासत' डॉ. कर्ण सिंह ने शनिवार, 27 जून 2026 को श्रीनगर में कहा कि कश्मीरियत — घाटी की सदियों पुरानी सहअस्तित्व की परंपरा — सूफीवाद और साझा सांस्कृतिक मूल्यों की नींव पर टिकी है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि मानवता को सदैव धार्मिक मतभेदों से ऊपर रखा जाना चाहिए और इस विरासत को निरंतर अंतरधार्मिक संवाद के ज़रिए जीवित रखना अनिवार्य है।

संवाद का मंच और संदर्भ

शेर-ए-कश्मीर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन केंद्र, श्रीनगर में 'उर्दू, कश्मीरियत और साझा सांस्कृतिक परंपराएं' विषय पर आयोजित अंतरधार्मिक संवाद कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कर्ण सिंह ने आयोजकों की सराहना की। उन्होंने कहा कि उर्दू, कश्मीरियत और सांझी सांस्कृतिक विरासत जैसे विषय इतने गहरे हैं कि इन पर अलग-अलग कई दिनों तक विचार-विमर्श किया जा सकता है। यह आयोजन ऐसे समय में हुआ जब कश्मीर घाटी में सामाजिक सद्भाव की पुनर्स्थापना पर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज़ है।

विवेकानंद से विश्व धर्म संसद तक — ऐतिहासिक संदर्भ

अंतरधार्मिक संवाद की ऐतिहासिक जड़ों की बात करते हुए सिंह ने 1893 में शिकागो में आयोजित विश्व धर्म संसद का उल्लेख किया, जहाँ स्वामी विवेकानंद ने सार्वभौमिक स्वीकृति और आध्यात्मिक एकता का संदेश विश्व के समक्ष रखा था। उन्होंने कहा कि अंतरधार्मिक संवाद का उद्देश्य किसी एक धर्म को श्रेष्ठ सिद्ध करना नहीं, बल्कि एक-दूसरे की मान्यताओं को समझना और यह मानना है कि सभी धर्म अंततः एक ही सत्य की दिशा में ले जाते हैं।

उन्होंने ऋग्वेद के प्रसिद्ध श्लोक 'एकम सत विप्रा बहुधा वदन्ति' — अर्थात 'सत्य एक है, ज्ञानी उसे अलग-अलग नामों से पुकारते हैं' — का उद्धरण देते हुए कहा कि यदि ईश्वर एक है, तो विभिन्न धर्मों के लिए अलग-अलग ईश्वर नहीं हो सकते। जिस प्रकार किसी पर्वत की चोटी तक पहुँचने के अनेक रास्ते होते हैं, उसी प्रकार विभिन्न धर्म भी एक ही गंतव्य की ओर ले जाते हैं।

कश्मीर की सभ्यतागत विरासत

कर्ण सिंह ने कश्मीर को एक बहुस्तरीय सभ्यतागत भूमि बताते हुए कहा कि घाटी में वैदिक परंपराओं, बौद्ध धर्म, शैव धर्म और बाद में सूफीवाद का क्रमिक विकास हुआ है। उन्होंने लाल डेड, मीर सैयद अली हमदानी और शेख नूरुद्दीन नूरानी (नंद ऋषि) जैसे संत-विभूतियों का उल्लेख किया, जिन्होंने सदियों से प्रेम, सहिष्णुता और सहअस्तित्व की संस्कृति को पोषित किया।

गौरतलब है कि कश्मीर में सूफीवाद की जड़ें इसीलिए गहरी हैं क्योंकि उसने प्रेम का संदेश दिया, घृणा का नहीं। सिंह ने स्पष्ट किया कि कोई भी धर्म नफ़रत के ज़रिए फल-फूल नहीं सकता — मानवता को सर्वोपरि रखना ही वास्तविक धार्मिकता है।

आगे की राह

कर्ण सिंह के इस संबोधन को कश्मीर में सामाजिक पुनर्निर्माण की दिशा में एक सांस्कृतिक हस्तक्षेप के रूप में देखा जा रहा है। उनका यह आह्वान कि अंतरधार्मिक संवाद को संस्थागत रूप दिया जाए, नीति-निर्माताओं और नागरिक समाज दोनों के लिए एक दीर्घकालिक एजेंडा प्रस्तुत करता है। घाटी में शांति और सांस्कृतिक पुनरुद्धार की यह बातचीत आने वाले समय में और प्रासंगिक होती जाएगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल यह है कि क्या यह विमर्श नीतिगत स्तर पर उतरता है या केवल सम्मेलन कक्षों तक सीमित रहता है। सूफी संतों और वैदिक परंपराओं की साझा विरासत का उल्लेख प्रेरक है, परंतु घाटी में विस्थापित समुदायों की वापसी और सामाजिक पुनर्मिलन के ठोस कदमों के बिना यह विमर्श अधूरा रहेगा। कर्ण सिंह जैसे वरिष्ठ व्यक्तित्व की आवाज़ में वज़न है — अब देखना यह है कि यह आवाज़ नीति-निर्माताओं तक पहुँचती है या नहीं।
RashtraPress
28 जून 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कश्मीरियत क्या है और कर्ण सिंह ने इसे क्यों महत्वपूर्ण बताया?
कश्मीरियत कश्मीर की सदियों पुरानी सहअस्तित्व, प्रेम और सहिष्णुता की सांस्कृतिक परंपरा है, जो वैदिक, बौद्ध, शैव और सूफी विरासत के संगम से बनी है। कर्ण सिंह ने इसे 27 जून 2026 को श्रीनगर में आयोजित अंतरधार्मिक संवाद में 'सहअस्तित्व की आत्मा' बताया और कहा कि इसे निरंतर संवाद के ज़रिए जीवित रखना ज़रूरी है।
कर्ण सिंह ने किस कार्यक्रम में यह बात कही?
उन्होंने श्रीनगर के शेर-ए-कश्मीर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन केंद्र में 'उर्दू, कश्मीरियत और साझा सांस्कृतिक परंपराएं' विषय पर आयोजित अंतरधार्मिक संवाद कार्यक्रम को 27 जून 2026 को संबोधित किया।
कर्ण सिंह ने स्वामी विवेकानंद का उल्लेख क्यों किया?
अंतरधार्मिक संवाद की ऐतिहासिक प्रासंगिकता बताने के लिए कर्ण सिंह ने 1893 की शिकागो विश्व धर्म संसद का संदर्भ दिया, जहाँ स्वामी विवेकानंद ने सार्वभौमिक स्वीकृति और आध्यात्मिक एकता का संदेश दिया था। उनका तर्क था कि यही परंपरा कश्मीरियत की भावना से मेल खाती है।
कश्मीर में सूफीवाद की क्या भूमिका रही है?
कर्ण सिंह के अनुसार, कश्मीर में सूफीवाद इसलिए पनपा क्योंकि उसने प्रेम का संदेश दिया। लाल डेड, मीर सैयद अली हमदानी और शेख नूरुद्दीन नूरानी (नंद ऋषि) जैसे संतों ने घाटी में प्रेम, सहिष्णुता और सहअस्तित्व की संस्कृति को सींचा, जो कश्मीरियत की पहचान बन गई।
कर्ण सिंह ने धर्म और मानवता के बारे में क्या कहा?
कर्ण सिंह ने कहा कि कोई भी धर्म घृणा के माध्यम से फल-फूल नहीं सकता और मानवता को सदैव सर्वोपरि रखा जाना चाहिए। उन्होंने ऋग्वेद के 'एकम सत विप्रा बहुधा वदन्ति' श्लोक का हवाला देते हुए कहा कि सभी धर्म एक ही परम सत्य की ओर जाते हैं।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 6 घंटे पहले
  2. 3 सप्ताह पहले
  3. 1 महीना पहले
  4. 2 महीने पहले
  5. 3 महीने पहले
  6. 3 महीने पहले
  7. 5 महीने पहले
  8. 9 महीने पहले