अरुण गोविल ने UN में उठाया स्वास्थ्य का अधिकार, सुप्रीम कोर्ट के अनुच्छेद 21 फैसलों का दिया हवाला
सारांश
मुख्य बातें
भाजपा सांसद अरुण गोविल ने 23 अक्टूबर 2026 को न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र के स्वास्थ्य के अधिकार पर विशेष दूत के साथ हुई बातचीत में भारत की न्यायपालिका की अहम भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि भारत का सर्वोच्च न्यायालय दशकों से संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन के अधिकार) की व्यापक व्याख्या करते हुए उसमें स्वास्थ्य के अधिकार को भी शामिल मानता रहा है। यह चर्चा 'स्वास्थ्य के अधिकार को न्यायिक रूप से लागू कर न्याय और जवाबदेही सुनिश्चित करना' विषय पर केंद्रित थी।
बातचीत का मुख्य विषय और भारत का पक्ष
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन ने एक्स पोस्ट के माध्यम से यह जानकारी साझा की। गोविल ने बातचीत के दौरान माना कि इलाज का खर्च, भाषा की बाधा, दूरी और कानूनी जानकारी की कमी जैसी चुनौतियाँ नागरिकों को स्वास्थ्य के अधिकार का पूरा लाभ उठाने से रोक सकती हैं।
उन्होंने कॉरपोरेट जवाबदेही के मुद्दे को भी उठाया और कहा, 'कुछ मामलों में कॉरपोरेट ताकत जवाबदेही से बच निकलती है।' साथ ही उन्होंने रिपोर्ट में वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं को शामिल किए जाने की सराहना की, जिससे सदस्य देश परस्पर सीख सकें।
सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले
गोविल ने 1995 के एक महत्वपूर्ण सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का विशेष उल्लेख किया, जिसमें श्रमिकों के स्वास्थ्य और कल्याण को प्राथमिकता दी गई थी। उन्होंने कहा, '1995 में ही अदालत ने स्पष्ट कर दिया था कि स्वास्थ्य और चिकित्सा देखभाल का अधिकार मौलिक अधिकार है।' अदालत ने यह भी निर्देश दिया था कि नियोक्ता अपने कर्मचारियों को स्वास्थ्य बीमा और सुरक्षित कार्यस्थल उपलब्ध कराएँ।
उन्होंने उन न्यायिक हस्तक्षेपों का भी जिक्र किया जिनका उद्देश्य मरीजों को आपातकालीन चिकित्सा सेवाएँ सुनिश्चित करना और अस्पताल की सुविधाओं में सुधार करना था। यह ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच असमान बनी हुई है।
पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन से जुड़े अधिकार
गोविल ने बताया कि सर्वोच्च न्यायालय ने स्वच्छ और स्वस्थ पर्यावरण को भी अनुच्छेद 21 के दायरे में माना है। उन्होंने कहा, '2024 में अदालत ने जलवायु परिवर्तन के नकारात्मक प्रभावों से सुरक्षा को भी संवैधानिक अधिकार माना।' गौरतलब है कि यह फैसला जलवायु न्याय के संदर्भ में भारतीय न्यायशास्त्र में एक उल्लेखनीय विकास है।
खाद्य लेबलिंग और प्रजनन स्वास्थ्य
सांसद गोविल ने पैकेज्ड खाद्य पदार्थों पर चेतावनी वाले लेबल लगाने से संबंधित हालिया न्यायिक निर्देशों का उल्लेख करते हुए इसे स्वास्थ्य पर व्यावसायिक प्रभावों से जुड़ा एक महत्वपूर्ण मुद्दा बताया। उन्होंने प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच से संबंधित भारतीय सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का जिक्र करने के लिए विशेष दूत की सराहना की।
भारत की प्रतिबद्धता और आगे की राह
गोविल ने कहा कि भारत अपनी स्वास्थ्य व्यवस्था को अधिक सुलभ, किफायती और समान बनाने के लिए निरंतर प्रयासरत है। उन्होंने कहा, 'हम इस बात के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं कि देश के हर नागरिक को गुणवत्तापूर्ण और किफायती स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध हों।' भारत के न्यायिक अनुभव और वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं के बीच यह संवाद आने वाले समय में नीति-निर्माण को और मजबूत बनाने का आधार बन सकता है।