अयोध्या के प्राचीन कौशल्या-सुमित्रा कुंडों पर अतिक्रमण: हाईकोर्ट ने एक हफ्ते में खाली कराने का आदेश दिया
सारांश
मुख्य बातें
इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच ने अयोध्या के ऐतिहासिक माता कौशल्या कुंड और माता सुमित्रा कुंड पर हुए अतिक्रमण को लेकर जिला प्रशासन को कड़ा आदेश दिया है। न्यायालय ने एक सप्ताह के भीतर इन दोनों पौराणिक कुंडों से अतिक्रमण हटाने और उन्हें संरक्षित करने का निर्देश दिया है। यह आदेश सिद्धपीठ हनुमानगढ़ी के महंत एवं हिंदू सुरक्षा सेवा संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष महंत राजू दास द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद आया है।
मामले की पृष्ठभूमि
ये दोनों कुंड अयोध्या सदर तहसील के अंतर्गत बाग बिजैसी क्षेत्र में स्थित हैं और धार्मिक एवं पुरातात्विक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं। महंत राजू दास के अनुसार, कथित तौर पर लगभग चार दशकों से इन कुंडों तक पहुँचने वाला मुख्य सार्वजनिक मार्ग आबादी क्षेत्र से होकर संचालित होता रहा है। याचिका में आरोप लगाया गया कि धीरे-धीरे भूमाफियाओं ने कुंडों की जमीन पर कब्जा कर लिया और उनकी मूल पहचान को मिटाने की कोशिश की।
गौरतलब है कि प्रशासन को पहले भी इस संदर्भ में शिकायतें दी गई थीं, लेकिन कथित तौर पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, जिसके बाद यह मामला न्यायालय तक पहुँचा।
पानी टंकी निर्माण से बढ़ा विवाद
महंत राजू दास ने बताया कि आबादी के दक्षिणी दिशा में दो पानी टंकियाँ एक साथ निर्मित की गईं, जबकि ये दोनों टंकियाँ अलग-अलग वार्डों में स्वीकृत थीं। इस निर्माण के कारण भूमि की पूर्ति के लिए कुंड तक जाने वाला सार्वजनिक मार्ग कथित तौर पर अधिग्रहीत होता चला गया। इसी के चलते आसपास की जमीन पर अतिक्रमण की शिकायतें बढ़ती रहीं और अंततः कुंडों का अस्तित्व ही संकट में आ गया।
न्यायालय का निर्देश
जनहित याचिका की सुनवाई के बाद इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच ने स्पष्ट आदेश दिया कि इन कुंडों की भूमि पर जो भी अतिक्रमण हुआ है, उसे तत्काल हटाया जाए। न्यायालय ने यह भी कहा कि इन ऐतिहासिक और धार्मिक स्थलों की पहचान और महत्व को बनाए रखने के लिए प्रशासन उन्हें सुरक्षित करे। जिला प्रशासन को इस संबंध में एक सप्ताह का समय दिया गया है।
महंत राजू दास का पक्ष
महंत राजू दास ने कहा कि यह लड़ाई केवल जमीन की नहीं, बल्कि अयोध्या की सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत को बचाने की है। उनका कहना है कि इन कुंडों का उल्लेख पौराणिक ग्रंथों में भी मिलता है और इनकी उपेक्षा स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने प्रशासन से अपेक्षा जताई कि न्यायालय के आदेश का पालन समयसीमा के भीतर सुनिश्चित किया जाए।
आगे की राह
न्यायालय के आदेश के बाद अब सभी की निगाहें अयोध्या जिला प्रशासन पर टिकी हैं कि वह निर्धारित एक सप्ताह में किस तरह की कार्रवाई करता है। यह मामला अयोध्या में धार्मिक और ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण को लेकर व्यापक बहस को भी नई दिशा दे सकता है।