बीरभूम का राजनीतिक परिदृश्य: टीएमसी का बढ़ता वर्चस्व और भाजपा की चुनौतियाँ

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बीरभूम का राजनीतिक परिदृश्य: टीएमसी का बढ़ता वर्चस्व और भाजपा की चुनौतियाँ

सारांश

बीरभूम में टीएमसी का वर्चस्व और भाजपा की चुनौतियों पर विशेष ध्यान। जानें यहाँ के विधानसभा सीटों का हाल और आगामी चुनावों की तैयारियाँ।

मुख्य बातें

बीरभूम में टीएमसी का एकतरफा राज है।
भाजपा अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
अल्पसंख्यक वोटर्स का महत्वपूर्ण प्रभाव है।
2024 के चुनावों में टीएमसी और भाजपा के बीच कड़ा मुकाबला होगा।

कोलकाता, 17 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। पश्चिम बंगाल का बीरभूम संसदीय क्षेत्र कभी वामपंथियों का अभेद्य गढ़ माना जाता था, लेकिन अब यह टीएमसी का प्रमुख केंद्र बन चुका है। यहाँ भाजपा लगातार अपनी स्थिति मजबूत करने का प्रयास कर रही है। यह क्षेत्र ग्रामीण है, जहाँ उत्तर भाग (मुर्शिदाबाद सीमा के पास) मुस्लिम बहुल है। वहीं, दक्षिणी और पश्चिमी बीरभूम में हिंदू बहुसंख्यक हैं, जिनमें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (मुख्य रूप से संथाल) का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

बीरभूम लोकसभा क्षेत्र संख्या 42 के अंतर्गत सात विधानसभा सीटें आती हैं। 2021 के विभाजनकारी चुनावों में टीएमसी ने यहाँ एकतरफा जीत हासिल की थी।

मुरारई: यह सीट टीएमसी का सबसे मजबूत किला है। यहाँ मुस्लिम जनसंख्या का अच्छा खासा प्रभाव है। 2021 में टीएमसी के मोशर्रफ होसैन ने 45 प्रतिशत से अधिक के विशाल अंतर से जीत प्राप्त की।

नलहाटी: यह भी अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्र है। यहाँ टीएमसी के राजेंद्र नारायण दास मौजूदा विधायक हैं, जिन्होंने 2021 में लगभग 28 प्रतिशत के बड़े अंतर से जीत हासिल की।

हंसन: इस सीट की ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर आधारित है और यहाँ भी अल्पसंख्यकों का प्रभाव है। टीएमसी के नेता अशोक कुमार चट्टोपाध्याय ने 2021 में आसानी से जीत दर्ज की।

रामपुरहाट: यह एक मिश्रित आबादी वाली सामान्य सीट है। यहाँ टीएमसी के वरिष्ठ नेता और राज्य विधानसभा के उपाध्यक्ष आशीष बनर्जी विधायक हैं। 2021 में यहाँ मुकाबला कड़ा था और जीत का अंतर केवल 4 प्रतिशत रहा।

सिउड़ी: यह जिला मुख्यालय है और यहाँ हिंदू बहुसंख्यक और उच्च दलित आबादी है। टीएमसी के बिकाश रॉय चौधरी यहाँ से विधायक हैं, लेकिन 2021 में उनकी जीत का अंतर महज 3.4 प्रतिशत था।

सैंथिया (एससी): यह अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट है। राज्य सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का यहाँ बड़ा प्रभाव है। टीएमसी की नीलाबती साहा यहाँ से विधायक हैं और उन्होंने 2021 में शानदार जीत दर्ज की।

दुबराजपुर (एससी): पूरे जिले में यह एकमात्र सीट है जो भाजपा के पास है। 2021 की टीएमसी लहर में भाजपा के अनूप कुमार साहा ने करीब 1.9 प्रतिशत के मामूली अंतर से जीत हासिल की।

बीरभूम की लगभग 80 प्रतिशत जनसंख्या कृषि पर निर्भर है। इस संसदीय क्षेत्र का नेतृत्व टीएमसी सांसद शताब्दी रॉय करती हैं।

2024 के लोकसभा चुनावों में शताब्दी रॉय ने भले ही 47 प्रतिशत वोट लेकर बंपर जीत दर्ज की, लेकिन असली कहानी कांग्रेस के प्रदर्शन में छिपी थी। कांग्रेस उम्मीदवार मिल्टन रशीद का वोट शेयर लगभग 10 प्रतिशत से बढ़कर 14.81 प्रतिशत हो गया, जबकि भाजपा का वोट शेयर 5 प्रतिशत घट गया।

15 मार्च को चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों की घोषणा की है। चुनाव दो चरणों में होंगे, जिनकी तिथियाँ 23 और 29 अप्रैल हैं। वोटों की गिनती 4 मई को की जाएगी।

दिलचस्प बात यह है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने चुनाव से पहले बड़ा निर्णय लिया। चुनाव आयोग की घोषणा से पूर्व ही राज्य कर्मचारियों और पेंशनरों को बकाया महंगाई भत्ता देने का ऐलान किया और राज्य के पुजारी तथा मुअज्जिनों के मानदेय में 500 रुपये की बढ़ोतरी की।

संपादकीय दृष्टिकोण

भाजपा की स्थिति कमजोर नहीं है, चुनावी रणनीति में बदलाव से परिणाम बदल सकते हैं।
RashtraPress
14 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

बीरभूम में टीएमसी की चढ़ती हुई स्थिति का कारण क्या है?
टीएमसी की कल्याणकारी योजनाओं और स्थानीय नेतृत्व की मजबूती इसका मुख्य कारण है।
क्या भाजपा बीरभूम में अपनी स्थिति मजबूत कर पाएगी?
भाजपा की रणनीति और वोटर आधार में बदलाव से यह संभव है, लेकिन चुनौती बड़ी है।
राष्ट्र प्रेस
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