BSE का मार्केट कैप फिर $5 ट्रिलियन के पार, भू-राजनीतिक तनाव घटने और तेल सस्ता होने से बाज़ार में तेज़ी
सारांश
मुख्य बातें
बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) में सूचीबद्ध कंपनियों का कुल बाज़ार पूंजीकरण बुधवार, 17 जून को $5 ट्रिलियन के स्तर को पार कर गया — लगभग छह सप्ताह में यह पहली बार इस ऊँचाई पर पहुँचा। भू-राजनीतिक तनाव में कमी, कच्चे तेल की कीमतों में तेज़ गिरावट और घरेलू निवेशकों की सतत भागीदारी ने इस उछाल को बल दिया।
मुख्य घटनाक्रम
बुधवार को सेंसेक्स 400 अंकों से अधिक यानी 0.53 प्रतिशत की बढ़त के साथ 77,219 के स्तर तक पहुँचा। निफ्टी भी 0.50 प्रतिशत की तेज़ी के साथ 24,108 पर कारोबार करता दिखा। गौरतलब है कि शुक्रवार के बंद स्तर 75,527.95 की तुलना में सेंसेक्स पिछले तीन कारोबारी सत्रों में 2 प्रतिशत से अधिक चढ़ चुका है।
भू-राजनीतिक राहत का असर
अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित शांति समझौते को लेकर सकारात्मक संकेतों ने वैश्विक निवेशकों की धारणा को बदला। कच्चे तेल की कीमतों में आई तेज़ गिरावट ने बाज़ार की अस्थिरता के संकेतकों को भी नीचे खींचा, जिससे निवेशकों की जोखिम लेने की क्षमता बढ़ी। विश्लेषकों के अनुसार पश्चिम एशिया में तनाव कम होने से भारत की अर्थव्यवस्था पर महंगाई, चालू खाते के घाटे और कॉर्पोरेट आय पर पड़ने वाला दबाव भी घट सकता है।
व्यापक बाज़ार का बेहतर प्रदर्शन
अप्रैल से अब तक मिडकैप, स्मॉलकैप और माइक्रोकैप शेयरों ने प्रमुख सूचकांकों की तुलना में कहीं अधिक मज़बूत रिटर्न दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह संकेत देता है कि मौजूदा तेज़ी में निवेशकों की भागीदारी व्यापक आधार पर है — यह केवल बड़े शेयरों तक सीमित नहीं। पिछले चार कारोबारी सत्रों में BSE-सूचीबद्ध कंपनियों के बाज़ार मूल्य में 6 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी दर्ज की गई।
घरेलू निवेशकों की भूमिका
विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की लगातार बिकवाली के बावजूद घरेलू बाज़ार मज़बूत बना रहा, जिसका श्रेय विशेषज्ञ घरेलू निवेशकों की निरंतर खरीदारी को देते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि विदेशी निवेश प्रवाह में भी सुधार आता है, तो आने वाले महीनों में बाज़ार की धारणा और मज़बूत हो सकती है।
आगे क्या
विश्लेषकों के अनुसार बाज़ार में अगले चरण की तेज़ी में बैंकिंग, दूरसंचार और आईटी क्षेत्र की कंपनियाँ अहम भूमिका निभा सकती हैं। संरचनात्मक सुधार, कंपनियों की मज़बूत बैलेंस शीट, घटता कर्ज़ स्तर और बेहतर नकदी प्रवाह को भारत के दीर्घकालिक बाज़ार विकास के प्रमुख कारक बताया जा रहा है।