दुर्गा पूजा बुकस्टॉल तोड़फोड़: कलकत्ता हाईकोर्ट ने सीपीआई-एम की मुआवजा याचिका खारिज की
सारांश
मुख्य बातें
कलकत्ता उच्च न्यायालय की सिंगल-जज वेकेशन बेंच ने मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026 को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) — सीपीआई-एम — की वह याचिका खारिज कर दी, जिसमें पश्चिम बंगाल के विभिन्न जिलों में दुर्गा पूजा के दौरान पंडालों के पास लगाए गए पार्टी के बुकस्टॉलों में हुई कथित तोड़फोड़ के लिए मुआवजे की माँग की गई थी। जस्टिस पार्थ प्रतीम रॉय ने याचिका को इस आधार पर अस्वीकार किया कि इसी विषय से जुड़ी एक याचिका पहले से न्यायालय में विचाराधीन है।
मुख्य घटनाक्रम
दक्षिण कोलकाता की सीपीआई-एम जादवपुर एरिया कमेटी ने मुआवजे की माँग को लेकर यह याचिका दायर की थी। मंगलवार दोपहर जस्टिस पार्थ प्रतीम रॉय की अध्यक्षता में वेकेशन बेंच ने तत्काल सुनवाई की। सुनवाई के अंत में जस्टिस रॉय ने स्पष्ट किया कि सीपीआई-एम के बुकस्टॉल से संबंधित एक समान याचिका पर जनवरी 2027 में मुख्य न्यायाधीश रवींद्र विठ्ठलराव घुगे की अध्यक्षता वाली डिवीजन बेंच सुनवाई करेगी।
जस्टिस रॉय ने यह भी स्मरण कराया कि इससे पहले मुख्य न्यायाधीश घुगे की डिवीजन बेंच ने यह आदेश दिया था कि पुलिस अनुमति के बिना लगाए गए किसी भी स्टॉल को चलने नहीं दिया जाए और पुलिस ऐसे अनधिकृत स्टॉल हटाने के लिए बाध्य है। इस पृष्ठभूमि में उन्होंने नई याचिका पर वेकेशन बेंच द्वारा अलग से सुनवाई को अनावश्यक बताया।
तोड़फोड़ की घटनाएँ
दुर्गा पूजा के त्योहार के आरंभ से ही राज्य के कई हिस्सों में सीपीआई-एम के बुकस्टॉलों में कथित तोड़फोड़ की सूचनाएँ आने लगी थीं। विशेष रूप से सप्तमी की रात जादवपुर इलाके में पार्टी के दो बुकस्टॉलों को कथित तौर पर तोड़ा गया। इन घटनाओं ने राज्य में राजनीतिक माहौल गर्म कर दिया और सत्तारूढ़ दल पर निशाना साधने का मौका विपक्ष को दे दिया।
गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब पश्चिम बंगाल में राजनीतिक दलों के पूजा-कालीन प्रचार बूथों को लेकर विवाद हुआ हो। राज्य में तृणमूल कांग्रेस (TMC) और वाम दलों के बीच वर्चस्व की लड़ाई का इतिहास दशकों पुराना है।
सरकार की प्रतिक्रिया
पश्चिम बंगाल के वित्त मंत्री स्वपन दासगुप्ता ने इन तोड़फोड़ की घटनाओं की कड़ी निंदा की। उन्होंने कहा, 'अगर यह कोई इकलौती घटना होती, तो मैं समझ सकता था। लेकिन, ऐसा तीन-चार जगहों पर हुआ है। मैं इसे किसी भी तरह से स्वीकार नहीं कर सकता। वामपंथी दलों के साथ हमारे वैचारिक मतभेद हो सकते हैं, लेकिन कुछ लोग उन्हें किताबें क्यों नहीं बेचने देते? वे कौन हैं? उन्हें यह अधिकार किसने दिया? ऐसी हरकतें निंदनीय हैं। मुझे शर्म आ रही है। उम्मीद है कि ऐसा दोबारा कभी नहीं होगा।'
दासगुप्ता की यह टिप्पणी उल्लेखनीय है क्योंकि वे सत्तारूढ़ दल के वरिष्ठ सदस्य होने के बावजूद विपक्षी पार्टी के पक्ष में खुलकर बोले। हालाँकि, आलोचकों का कहना है कि सरकार को बयानों से आगे बढ़कर ठोस कार्रवाई करनी चाहिए।
बुद्धिजीवियों और नागरिक समाज की आवाज़
कई बुद्धिजीवियों और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों ने भी इन घटनाओं की निंदा की है। उनका तर्क है कि पुस्तक-विक्रय जैसी सांस्कृतिक गतिविधि पर हमला न केवल राजनीतिक असहिष्णुता का प्रतीक है, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर भी चोट है। यह ऐसे समय में आया है जब पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर चिंताएँ पहले से जताई जा रही हैं।
आगे क्या होगा
सीपीआई-एम के बुकस्टॉल मामले की अगली सुनवाई जनवरी 2027 में मुख्य न्यायाधीश रवींद्र विठ्ठलराव घुगे की डिवीजन बेंच के समक्ष होगी। इस बीच, पार्टी अपनी शिकायतें दर्ज कराने के अन्य कानूनी रास्ते तलाश सकती है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह मामला आगामी राज्य चुनावों की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हो सकता है।