सीबीआई ने एलयूसीसी चिट फंड मामले में ₹25 करोड़ की 23 संपत्तियाँ कुर्क कीं, 7 मुख्य आरोपी न्यायिक हिरासत में
सारांश
मुख्य बातें
केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने मेसर्स लोनी अर्बन मल्टी स्टेट क्रेडिट एंड थ्रिफ्ट को-ऑपरेटिव सोसाइटी (एलयूसीसी) चिट फंड धोखाधड़ी मामले में आरोपियों की 23 संपत्तियाँ कुर्क कर ली हैं, जिनका कुल मूल्य ₹25 करोड़ आँका गया है। ये संपत्तियाँ उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और मुंबई में स्थित हैं। इस मामले में 16 लाख से अधिक जमाकर्ताओं के साथ कथित तौर पर ₹419 करोड़ की धोखाधड़ी की गई है।
कुर्की की प्रक्रिया कैसे हुई
सीबीआई ने जांच के दौरान उन संपत्तियों की पहचान की जो आरोपियों ने इस धोखाधड़ी से अर्जित की थीं। उत्तराखंड में 6 संपत्तियों को राज्य के सक्षम प्राधिकारी के माध्यम से कुर्की आदेश जारी करवाकर ज़ब्त किया गया। उत्तर प्रदेश में 16 संपत्तियों को राज्य के नामित बीयूडीएस अधिनियम न्यायालय से प्राधिकरण प्राप्त करने के बाद कुर्क किया गया।
मुंबई में स्थित 1 संपत्ति को महाराष्ट्र के नामित बीयूडीएस अधिनियम न्यायालय द्वारा कुर्की के लिए अधिकृत किया गया है, और सीबीआई उत्तराखंड के सक्षम प्राधिकारी से इसके लिए कुर्की आदेश जारी करवाने की प्रक्रिया में है। शेष संपत्तियों की पहचान के प्रयास अभी भी जारी हैं।
मामले की पृष्ठभूमि
गौरतलब है कि उत्तराखंड उच्च न्यायालय के आदेश पर वर्ष 2025 में सीबीआई ने उत्तराखंड राज्य पुलिस से कई प्राथमिकी (एफआईआर) अपने हाथ में लेकर यह मामला दर्ज किया था। आरोपियों पर भारतीय दंड संहिता (आईपीसी), भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), बीयूडीएस अधिनियम और यूपीआईडी अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत मुकदमा चलाया जा रहा है।
यह ऐसे समय में आया है जब देशभर में चिट फंड और सहकारी समिति धोखाधड़ी के मामलों में केंद्रीय एजेंसियों की सक्रियता बढ़ी है। आरोपियों ने कथित तौर पर 16 लाख से अधिक जमाकर्ताओं को झूठे वादों से लुभाकर ₹419 करोड़ की धनराशि का गबन किया।
गिरफ्तारी और न्यायिक स्थिति
सीबीआई ने इस मामले में 7 मुख्य आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है, जो वर्तमान में न्यायिक हिरासत में हैं। एजेंसी के अनुसार जांच अभी जारी है और आगे और संपत्तियाँ कुर्क किए जाने की संभावना है।
आगे क्या होगा
सीबीआई शेष संपत्तियों की पहचान और कुर्की की प्रक्रिया में जुटी है। विशेषज्ञों का मानना है कि बहु-राज्यीय सहकारी समितियों से जुड़े इस तरह के मामलों में संपत्ति वसूली की प्रक्रिया लंबी और जटिल होती है, क्योंकि इसमें एकाधिक राज्यों के न्यायालयों से अनुमति लेनी पड़ती है। 16 लाख से अधिक पीड़ित जमाकर्ताओं को मुआवज़े की उम्मीद जांच की प्रगति पर टिकी है।