ममता बनर्जी के धरने पर कांग्रेस ने कहा 'संवैधानिक अधिकार', भाजपा बोली — 'जनता के गुस्से का आईना'
सारांश
मुख्य बातें
तृणमूल कांग्रेस (TMC) प्रमुख ममता बनर्जी द्वारा 2 जून 2026 को आयोजित धरने पर राष्ट्रीय राजनीति में तीखी प्रतिक्रियाएँ सामने आई हैं। यह धरना TMC के नेताओं और कार्यकर्ताओं पर कथित हमलों तथा रेलवे भूमि पर कब्जा जमाए फेरीवालों को हटाए जाने के विरोध में आयोजित किया गया था। कांग्रेस ने इसे ममता बनर्जी का संवैधानिक अधिकार करार दिया, जबकि भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने कहा कि यह विरोध प्रदर्शन पश्चिम बंगाल की जनता पर कोई प्रभाव नहीं डालेगा।
कांग्रेस का रुख: संविधान देता है अधिकार
कांग्रेस सांसद प्रमोद तिवारी ने कहा कि लोकतंत्र में अन्याय के विरुद्ध शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करना संविधान-प्रदत्त अधिकार है और ममता बनर्जी यही कर रही हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि TMC सांसद अभिषेक बनर्जी — जो पार्टी में दूसरे नंबर के नेता हैं — पर हमला किया गया। तिवारी के अनुसार, यदि एक निर्वाचित सांसद भाजपा शासन में सुरक्षित नहीं है, तो यह 'सोची-समझी साजिश' का हिस्सा है।
प्रमोद तिवारी ने TMC सांसद कल्याण बनर्जी पर हुए कथित हमले का भी उल्लेख किया, जिसमें उनके सिर पर चोट लगी बताई जाती है। उन्होंने दावा किया कि TMC के दर्जनों कार्यालयों में तोड़फोड़ की गई और उन्हें आग लगाई गई। कांग्रेस सांसद ने इसे 'भाजपा का तानाशाही चेहरा' बताते हुए सभी विपक्षी दलों से एकजुट होकर विरोध करने की अपील की।
भाजपा की प्रतिक्रिया: नौटंकी और जनता का गुस्सा
भाजपा सांसद प्रवीण खंडेलवाल ने कहा कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में हार के बाद ममता बनर्जी 'हताश, परेशान और निराश' हैं। उन्होंने TMC सांसदों कल्याण बनर्जी और अभिषेक बनर्जी की गतिविधियों को 'राजनीतिक नौटंकी' करार दिया और कहा कि इस धरने का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
भाजपा नेता लॉकेट चटर्जी ने कहा कि एक महीने के भीतर हालात पूरी तरह बदल गए हैं। उनके अनुसार, ममता बनर्जी ने कभी नहीं सोचा था कि उनकी पार्टी द्वारा जनता पर थोपी गई मुश्किलें इतनी जल्दी जनाक्रोश के रूप में लौट आएंगी। चटर्जी ने दावा किया कि विधानसभा चुनावों में हार के बाद TMC 'पूरी तरह खत्म' हो चुकी है और उनके पास कार्यकर्ताओं की भारी कमी है।
धरने की पृष्ठभूमि
यह धरना ऐसे समय में आया है जब पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद से राजनीतिक हिंसा की कथित घटनाओं की संख्या बढ़ी है। गौरतलब है कि रेलवे भूमि से फेरीवालों की बेदखली का मुद्दा भी इस विरोध का हिस्सा है, जो प्रशासनिक और राजनीतिक दोनों आयाम रखता है। ममता बनर्जी पूर्व में भी धरना आंदोलनों के ज़रिए राष्ट्रीय ध्यान खींचने में सफल रही हैं — यह उनकी राजनीतिक शैली का परिचित हिस्सा है।
आगे क्या
कांग्रेस की ओर से विपक्षी एकता की अपील के बाद देखना होगा कि अन्य विपक्षी दल इस मुद्दे पर एकजुट होते हैं या नहीं। भाजपा का रुख स्पष्ट है कि वह इस धरने को TMC की आंतरिक कमज़ोरी का प्रतिबिंब मानती है। पश्चिम बंगाल में राजनीतिक स्थिति आने वाले हफ्तों में और अधिक स्पष्ट होगी।