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बंगाल जाति प्रमाणपत्र री-वेरिफिकेशन के खिलाफ सीपीआई(एमएल) की कलकत्ता हाईकोर्ट में पीआईएल

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बंगाल जाति प्रमाणपत्र री-वेरिफिकेशन के खिलाफ सीपीआई(एमएल) की कलकत्ता हाईकोर्ट में पीआईएल

सारांश

सीपीआई(एमएल) लिबरेशन ने पश्चिम बंगाल में 15 साल के जाति प्रमाणपत्रों की री-वेरिफिकेशन को असंवैधानिक बताते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट में पीआईएल दायर की। पार्टी का आरोप है कि यह प्रक्रिया दलित, आदिवासी और बहुजन समुदाय के संवैधानिक अधिकारों पर हमला है।

मुख्य बातें

सीपीआई(एमएल) लिबरेशन ने 19 जून 2026 को कलकत्ता उच्च न्यायालय में पीआईएल दायर कर पश्चिम बंगाल की जाति प्रमाणपत्र री-वेरिफिकेशन प्रक्रिया को असंवैधानिक घोषित करने की माँग की।
याचिकाकर्ता राज्य सचिव अभिजीत मजूमदार और राज्य समिति सदस्य मलय तिवारी हैं।
री-वेरिफिकेशन पिछले 15 वर्षों में जारी एससी, एसटी और ओबीसी सभी जाति प्रमाणपत्रों को प्रभावित करती है।
पार्टी का आरोप है कि एसआईआर (विशेष गहन पुनरीक्षण) को जाति प्रमाणपत्र सत्यापन से जोड़ना पूरी तरह अवैध है।
पश्चिम बंगाल राज्य समिति ने व्यापक जन अभियान और आंदोलन का आह्वान किया है।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन — जिसे सीपीआई(एमएल) लिबरेशन के नाम से जाना जाता है — ने 19 जून 2026 को कलकत्ता उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका (पीआईएल) दायर कर पश्चिम बंगाल सरकार के उस फैसले को असंवैधानिक घोषित करने की माँग की है, जिसके तहत पिछले 15 वर्षों में अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को जारी किए गए समस्त जाति प्रमाणपत्रों का पुनः सत्यापन (री-वेरिफिकेशन) कराने का निर्देश दिया गया है। पार्टी का आरोप है कि यह कदम दलित, आदिवासी और बहुजन समुदाय के संवैधानिक अधिकारों पर सीधा हमला है।

याचिका की पृष्ठभूमि और याचिकाकर्ता

यह पीआईएल सीपीआई(एमएल) लिबरेशन के राज्य सचिव अभिजीत मजूमदार और राज्य समिति सदस्य मलय तिवारी की ओर से दायर की गई है। पार्टी ने अपने बयान में स्पष्ट किया कि दलित, आदिवासी और बहुजन समुदाय के हितों की रक्षा के लिए यह कानूनी लड़ाई शुरू की गई है और इसे आगे भी जारी रखा जाएगा।

पार्टी के मुख्य आरोप

सीपीआई(एमएल) लिबरेशन ने आरोप लगाया है कि पहले मताधिकार छीनने के लिए विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की प्रक्रिया अपनाई गई, और अब आरक्षण के अधिकारों को समाप्त करने के लिए एक नया 'एसआईआर' लागू करने की कोशिश हो रही है। पार्टी का कहना है कि किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण में शामिल होने या न होने को जाति प्रमाणपत्र के सत्यापन से जोड़ना पूरी तरह अवैध है।

पार्टी ने यह भी तर्क दिया कि फर्जी जाति प्रमाणपत्रों की जाँच के लिए पहले से मौजूद सतर्कता तंत्र को प्रभावी ढंग से लागू करने के बजाय, वास्तविक एससी, एसटी और ओबीसी नागरिकों को अनावश्यक पूछताछ और उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है।

समुदाय पर संभावित असर

पार्टी के बयान के अनुसार, इस री-वेरिफिकेशन प्रक्रिया के जरिए दलित, आदिवासी और बहुजन समुदाय की नई पीढ़ी की पहचान तथा उससे जुड़े संवैधानिक अधिकारों को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है। यह ऐसे समय में आया है जब देशभर में आरक्षण नीति को लेकर राजनीतिक बहस तेज है। गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल में एससी, एसटी और ओबीसी समुदाय राज्य की कुल जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा हैं और आरक्षण उनके शैक्षणिक व रोजगार अवसरों का महत्वपूर्ण आधार है।

जन आंदोलन का आह्वान

सीपीआई(एमएल) लिबरेशन की पश्चिम बंगाल राज्य समिति ने समाज के सभी स्तरों पर व्यापक जन अभियान और आंदोलन खड़ा कर इन अधिकारों की रक्षा करने का आह्वान किया है। पार्टी ने संकेत दिया है कि न्यायालय के बाहर भी यह संघर्ष जारी रहेगा।

आगे क्या होगा

कलकत्ता उच्च न्यायालय में दायर इस पीआईएल पर सुनवाई की तारीख अभी घोषित नहीं हुई है। अदालत के फैसले से न केवल पश्चिम बंगाल में बल्कि अन्य राज्यों में भी जाति प्रमाणपत्र री-वेरिफिकेशन की प्रक्रिया पर दूरगामी प्रभाव पड़ सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

या यह प्रक्रिया वास्तविक लाभार्थियों को हाशिये पर धकेलने का जोखिम उठाती है। गौरतलब है कि देशभर में आरक्षण सूचियों की समीक्षा को लेकर बहस तेज हो रही है, और इस पृष्ठभूमि में बंगाल का यह मामला एक नज़ीर बन सकता है। कलकत्ता हाईकोर्ट का फैसला न केवल राज्य की नीति को, बल्कि अन्य राज्यों में भी ऐसी प्रक्रियाओं की वैधता को प्रभावित कर सकता है।
RashtraPress
8 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पश्चिम बंगाल में जाति प्रमाणपत्र री-वेरिफिकेशन क्या है?
पश्चिम बंगाल सरकार ने पिछले 15 वर्षों में एससी, एसटी और ओबीसी समुदायों को जारी किए गए सभी जाति प्रमाणपत्रों का पुनः सत्यापन कराने का निर्देश दिया है। सीपीआई(एमएल) लिबरेशन ने इसे असंवैधानिक बताते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट में चुनौती दी है।
सीपीआई(एमएल) लिबरेशन ने पीआईएल क्यों दायर की?
पार्टी का आरोप है कि री-वेरिफिकेशन प्रक्रिया दलित, आदिवासी और बहुजन समुदाय के संवैधानिक आरक्षण अधिकारों को कमजोर करती है और वास्तविक लाभार्थियों को अनावश्यक उत्पीड़न का शिकार बनाती है। पार्टी का यह भी कहना है कि मतदाता सूची पुनरीक्षण (एसआईआर) को जाति प्रमाणपत्र से जोड़ना कानूनी रूप से अमान्य है।
इस पीआईएल में याचिकाकर्ता कौन हैं?
सीपीआई(एमएल) लिबरेशन की ओर से पार्टी के राज्य सचिव अभिजीत मजूमदार और राज्य समिति सदस्य मलय तिवारी याचिकाकर्ता हैं।
इस मामले से कौन-से समुदाय प्रभावित होंगे?
री-वेरिफिकेशन प्रक्रिया से पश्चिम बंगाल के अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के वे सभी नागरिक प्रभावित होंगे जिन्हें पिछले 15 वर्षों में जाति प्रमाणपत्र जारी किए गए हैं। इनके शैक्षणिक और रोजगार आरक्षण अधिकार इस प्रक्रिया के परिणाम पर निर्भर हो सकते हैं।
कलकत्ता हाईकोर्ट में इस पीआईएल पर आगे क्या होगा?
पीआईएल दायर होने के बाद अदालत द्वारा सुनवाई की तारीख तय की जाएगी। अदालत का फैसला पश्चिम बंगाल की री-वेरिफिकेशन नीति की वैधता तय करेगा और संभवतः अन्य राज्यों में ऐसी प्रक्रियाओं के लिए भी एक नज़ीर बनेगा।
राष्ट्र प्रेस
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