पश्चिम बंगाल में 1.69 करोड़ पिछड़ा वर्ग प्रमाणपत्रों की दोबारा जांच, DM को मिला निर्देश

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पश्चिम बंगाल में 1.69 करोड़ पिछड़ा वर्ग प्रमाणपत्रों की दोबारा जांच, DM को मिला निर्देश

सारांश

पश्चिम बंगाल सरकार ने 15 साल में जारी 1.69 करोड़ SC/ST/OBC प्रमाणपत्रों की दोबारा जांच का आदेश दिया — यह कदम कलकत्ता हाईकोर्ट के 2024 के उस फैसले के बाद आया है जिसमें 2010 के बाद के सभी OBC प्रमाणपत्र अवैध करार दिए गए थे। फर्जी प्रमाणपत्र धारकों और दोषी अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई होगी।

मुख्य बातें

पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग विकास विभाग ने सभी जिला मजिस्ट्रेटों को 2011–2026 के बीच जारी SC/ST/OBC प्रमाणपत्रों के पुनः सत्यापन का निर्देश दिया।
जांच के दायरे में कुल 1.69 करोड़ प्रमाणपत्र — लगभग 1 करोड़ SC , 21 लाख ST और 48 लाख OBC ।
फर्जी दस्तावेजों से प्रमाणपत्र लेने वालों और अवैध रूप से प्रमाणपत्र जारी करने वाले अधिकारियों पर कड़ी कानूनी कार्रवाई के निर्देश।
मई 2024 में कलकत्ता हाईकोर्ट ने 2010 के बाद के सभी OBC प्रमाणपत्र अवैध करार देकर रद्द किए थे।
पिछले वर्ष दिसंबर में NCBC ने पश्चिम बंगाल की 35 मुस्लिम जातियों को केंद्रीय OBC सूची से हटाया था।

पश्चिम बंगाल सरकार ने 16 मई 2026 को एक बड़े प्रशासनिक कदम के तहत राज्य में वर्ष 2011 से 2026 के बीच जारी किए गए सभी पिछड़ा वर्ग प्रमाणपत्रों की दोबारा जांच का आदेश दिया है। पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग विकास विभाग ने सभी जिला मजिस्ट्रेटों (DM) को निर्देश दिए हैं कि वे SC, ST और OBC प्रमाणपत्रों का पुनः सत्यापन करें। इस जांच के दायरे में कुल करीब 1.69 करोड़ प्रमाणपत्र आएंगे।

कितने प्रमाणपत्रों की होगी जांच

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले 15 वर्षों में राज्य में लगभग 1 करोड़ SC प्रमाणपत्र, 21 लाख ST प्रमाणपत्र और 48 लाख OBC प्रमाणपत्र जारी किए गए। इन सभी की वैधता की जांच अब जिला स्तर पर की जाएगी। यह अवधि पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस (TMC) सरकार के तीन कार्यकालों से जुड़ी हुई है।

फर्जी प्रमाणपत्रों पर कड़ी कार्रवाई के निर्देश

नबन्ना सचिवालय से जुड़े सूत्रों के अनुसार, विभाग ने जिला अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि यदि कोई व्यक्ति फर्जी दस्तावेजों के आधार पर OBC या अन्य पिछड़ा वर्ग प्रमाणपत्र हासिल करता पाया जाता है, तो उसके विरुद्ध कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाए। इसके अलावा, यदि कोई सरकारी अधिकारी पैसे या किसी अन्य लाभ के बदले अवैध रूप से जाति प्रमाणपत्र जारी करता पाया जाता है, तो उस पर भी सख्त कदम उठाए जाएंगे।

सरकारी सूत्रों का कहना है कि यह पूरा अभियान इसलिए शुरू किया गया है ताकि कोई भी अपात्र व्यक्ति आरक्षण जैसी संवैधानिक सुविधाओं का गलत लाभ न उठा सके। सूत्रों के मुताबिक, पिछले वर्षों में कुछ प्रमाणपत्र जारी करने में अनियमितताओं की शिकायतें सामने आई थीं, जिसके बाद विभाग ने यह कदम उठाया।

कलकत्ता हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला — पृष्ठभूमि

गौरतलब है कि मई 2024 में कलकत्ता हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने वर्ष 2010 के बाद पश्चिम बंगाल में जारी सभी OBC प्रमाणपत्रों को अवैध करार देते हुए रद्द कर दिया था। अदालत ने अपने आदेश में कहा था कि 2010 के बाद तैयार की गई OBC सूची कानूनी प्रावधानों के अनुरूप नहीं थी। यह फैसला वर्तमान पुनः सत्यापन अभियान की प्रमुख पृष्ठभूमि माना जा रहा है।

इसके अतिरिक्त, पिछले वर्ष दिसंबर में राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (NCBC) ने पश्चिम बंगाल की 35 जातियों को केंद्रीय OBC सूची से बाहर कर दिया था। ये सभी जातियां मुस्लिम समुदाय से संबंधित थीं।

राजनीतिक प्रतिक्रिया

भारतीय जनता पार्टी (BJP) लंबे समय से आरोप लगाती रही है कि पिछली ममता सरकार ने कथित तौर पर OBC सूची में शामिल करने के मानकों में हेरफेर कर खास समुदायों को फायदा पहुंचाने की कोशिश की थी। पार्टी इस पुनः सत्यापन अभियान को अपनी उन माँगों की स्वीकृति के रूप में देख रही है।

आगे क्या होगा

जिला मजिस्ट्रेटों को दिए गए निर्देशों के अनुसार, सत्यापन प्रक्रिया जल्द शुरू होने की उम्मीद है। इस अभियान का असर राज्य भर के लाखों परिवारों पर पड़ सकता है जो आरक्षण के आधार पर शिक्षा, सरकारी नौकरी और अन्य सुविधाएं प्राप्त कर रहे हैं। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जांच प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता कैसे सुनिश्चित की जाती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल यह है कि 1.69 करोड़ प्रमाणपत्रों की जांच के लिए जिला प्रशासन के पास न तो पर्याप्त जनशक्ति है और न ही स्पष्ट समयसीमा। कलकत्ता हाईकोर्ट के 2024 के फैसले के दो साल बाद यह अभियान शुरू होना बताता है कि दबाव न्यायिक था, राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं। NCBC द्वारा 35 मुस्लिम जातियों को केंद्रीय OBC सूची से हटाने की पृष्ठभूमि में यह जांच सांप्रदायिक रंग लेने का जोखिम भी उठाती है, जिसे प्रशासन को सावधानी से संभालना होगा। बिना स्वतंत्र निगरानी तंत्र और पारदर्शी अपील प्रक्रिया के, वास्तविक लाभार्थी भी इस अभियान की चपेट में आ सकते हैं।
RashtraPress
16 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पश्चिम बंगाल में पिछड़ा वर्ग प्रमाणपत्रों की दोबारा जांच क्यों हो रही है?
पश्चिम बंगाल सरकार ने पिछले 15 वर्षों में जारी SC/ST/OBC प्रमाणपत्रों में कथित अनियमितताओं की शिकायतों के बाद यह जांच शुरू की है। इसके पीछे मई 2024 में कलकत्ता हाईकोर्ट का वह फैसला भी है जिसमें 2010 के बाद के सभी OBC प्रमाणपत्र अवैध करार दिए गए थे।
कितने प्रमाणपत्रों की जांच होगी और इनमें क्या शामिल है?
आंकड़ों के अनुसार, 2011 से 2026 के बीच जारी कुल लगभग 1.69 करोड़ प्रमाणपत्रों की जांच होगी — इनमें करीब 1 करोड़ SC, 21 लाख ST और 48 लाख OBC प्रमाणपत्र शामिल हैं। सभी की जांच जिला मजिस्ट्रेटों की निगरानी में होगी।
फर्जी प्रमाणपत्र पाए जाने पर क्या होगा?
सरकारी निर्देशों के अनुसार, फर्जी दस्तावेजों से प्रमाणपत्र लेने वाले व्यक्तियों के विरुद्ध कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी। इसके अलावा, पैसे या अन्य लाभ के बदले अवैध प्रमाणपत्र जारी करने वाले सरकारी अधिकारियों पर भी सख्त कदम उठाए जाएंगे।
कलकत्ता हाईकोर्ट ने OBC प्रमाणपत्रों पर क्या फैसला दिया था?
मई 2024 में कलकत्ता हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने 2010 के बाद पश्चिम बंगाल में जारी सभी OBC प्रमाणपत्रों को अवैध करार देते हुए रद्द कर दिया था। अदालत ने कहा था कि 2010 के बाद तैयार की गई OBC सूची कानूनी प्रावधानों के अनुरूप नहीं थी।
NCBC ने पश्चिम बंगाल की किन जातियों को OBC सूची से हटाया?
राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (NCBC) ने पिछले वर्ष दिसंबर में पश्चिम बंगाल की 35 जातियों को केंद्रीय OBC सूची से बाहर किया था। ये सभी जातियां मुस्लिम समुदाय से संबंधित थीं।
राष्ट्र प्रेस
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