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आरती साहा: 11 साल में ओलंपिक डेब्यू, इंग्लिश चैनल पार करने वाली पहली एशियाई महिला तैराक

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आरती साहा: 11 साल में ओलंपिक डेब्यू, इंग्लिश चैनल पार करने वाली पहली एशियाई महिला तैराक

सारांश

महज 4 साल की उम्र में तैराकी शुरू करने वाली आरती साहा ने 11 साल में ओलंपिक और 19 साल में इंग्लिश चैनल जीत लिया। पहली एशियाई महिला, पहली पद्म श्री विजेता महिला एथलीट — उनकी कहानी साहस और संकल्प का पर्याय है।

मुख्य बातें

आरती साहा ने 1952 के हेलसिंकी ओलंपिक में 11 साल, 10 महीने और 305 दिन की आयु में भाग लेकर सबसे युवा भारतीय ओलंपियन का रिकॉर्ड बनाया।
29 सितंबर 1959 को 19 वर्ष की आयु में 42 मील लंबा इंग्लिश चैनल पार कर वे पहली एशियाई महिला बनीं।
उनके कोच सचिन नाग ओलंपियन और एशियन गेम्स चैंपियन थे; 1951 में आरती ने 100 मीटर ब्रेस्टस्ट्रोक में राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाया।
1960 में उन्हें पद्म श्री दिया गया — यह सम्मान पाने वाली वे पहली भारतीय महिला एथलीट थीं।
23 अगस्त 1994 को उनका निधन हुआ, लेकिन उनकी विरासत भारतीय खेल इतिहास में अमर है।

भारतीय तैराकी की महान हस्ती आरती साहा ने 1952 के हेलसिंकी ओलंपिक में महज 11 साल, 10 महीने और 305 दिन की अल्पायु में हिस्सा लेकर सबसे युवा भारतीय ओलंपियन का रिकॉर्ड बनाया था। इसके सात वर्ष बाद, 29 सितंबर 1959 को मात्र 19 वर्ष की आयु में उन्होंने इंग्लिश चैनल पार कर इतिहास रचा और यह उपलब्धि हासिल करने वाली पहली एशियाई महिला बन गईं।

बचपन से तैराकी की नींव

24 सितंबर 1940 को कलकत्ता में जन्मीं आरती ने महज 4 वर्ष की आयु से ही जलक्रीड़ा में कदम रख दिया था। अगले ही वर्ष उन्होंने अपनी पहली प्रतिस्पर्धात्मक जीत दर्ज की, जो उनकी असाधारण प्रतिभा का प्रारंभिक संकेत था।

उनके करियर को नई ऊँचाइयों तक ले जाने में ओलंपियन और एशियन गेम्स चैंपियन सचिन नाग का मार्गदर्शन अत्यंत महत्त्वपूर्ण रहा। आरती ने फ्रीस्टाइल और ब्रेस्टस्ट्रोक दोनों स्पर्धाओं में पश्चिम बंगाल का प्रतिनिधित्व करते हुए अनेक पुरस्कार जीते। 1951 में उन्होंने 100 मीटर ब्रेस्टस्ट्रोक में राष्ट्रीय रिकॉर्ड भी स्थापित किया।

ओलंपिक 1952: ऐतिहासिक डेब्यू

1952 के हेलसिंकी ओलंपिक के लिए चुने गए भारतीय दल में आरती साहा को डॉली नजीर, नीलिमा घोष और मैरी डिसूजा के साथ शामिल किया गया। 26 जुलाई 1952 को महिलाओं की 200 मीटर ब्रेस्टस्ट्रोक हीट में उतरकर आरती ने सबसे युवा भारतीय ओलंपियन का कीर्तिमान अपने नाम किया।

हालाँकि उस स्पर्धा में उन्होंने 3:40.8 सेकंड का समय निकाला और छठे स्थान पर रहते हुए सेमीफाइनल के लिए क्वालीफाई नहीं कर सकीं, तथापि उनकी उपस्थिति भारतीय खेल इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय बन गई।

इंग्लिश चैनल विजय: प्रेरणा और संकल्प

यह ऐसे समय की बात है जब महिला एथलीटों के लिए ऐसी चुनौतियाँ विरले ही सोची जाती थीं। बांग्लादेशी तैराक ब्रोजेन दास ने 1958 में इंग्लिश चैनल पार करने वाले पहले एशियाई बनकर आरती को इस दिशा में सोचने पर प्रेरित किया। साथ ही, इंग्लिश चैनल पार करने वाले पहले भारतीय मिहिर सेन ने भी उन्हें इस लक्ष्य के प्रति दृढ़ किया।

गौरतलब है कि 29 सितंबर 1959 को 19 वर्ष और पाँच दिन की आयु में आरती ने 42 मील की दूरी तैरकर इंग्लिश चैनल पार किया। कठिन समुद्री परिस्थितियों के बावजूद उनका दृढ़ संकल्प अटूट रहा और वे इस उपलब्धि को हासिल करने वाली पहली एशियाई महिला बन गईं — एक ऐसा कीर्तिमान जो भारतीय खेल इतिहास में अमर है।

पद्म श्री और विरासत

1960 में भारत सरकार ने आरती साहा को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक पद्म श्री से नवाजा। वे यह सम्मान पाने वाली पहली भारतीय महिला एथलीट थीं — एक तथ्य जो उनकी उपलब्धियों की ऐतिहासिक महत्ता को रेखांकित करता है।

उनकी सफलता की कहानी ने पीढ़ियों तक भारतीय महिलाओं को खेलों में आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। 23 अगस्त 1994 को इस महान तैराक का निधन हो गया, किंतु उनके द्वारा स्थापित कीर्तिमान और भारतीय खेल जगत में उनका योगदान आज भी प्रासंगिक और प्रेरणादायी है। उनकी विरासत भविष्य की हर उस भारतीय बच्ची के लिए मार्गदर्शक है जो तरण ताल में उतरने का सपना देखती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि 1950-60 के दशक के उस भारत का दर्पण है जहाँ महिला एथलीटों को न संसाधन मिलते थे, न पहचान। यह विचारणीय है कि पद्म श्री पाने वाली पहली भारतीय महिला एथलीट की कहानी आज भी पाठ्यक्रमों में उतनी जगह नहीं पाती जितनी मिलनी चाहिए। ब्रोजेन दास और मिहिर सेन जैसे एशियाई पुरुष तैराकों से प्रेरणा लेकर उन्हें पीछे छोड़ने की यह यात्रा, लैंगिक बाधाओं को तोड़ने का अग्रदूत था। उनकी विरासत आज की भारतीय महिला एथलीटों के लिए उतनी ही प्रासंगिक है जितनी छह दशक पहले थी।
RashtraPress
23 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

आरती साहा ने इंग्लिश चैनल कब और किस उम्र में पार किया?
आरती साहा ने 29 सितंबर 1959 को 19 वर्ष और पाँच दिन की आयु में 42 मील की दूरी तैरकर इंग्लिश चैनल पार किया। वे यह उपलब्धि हासिल करने वाली पहली एशियाई महिला बनीं।
आरती साहा का ओलंपिक में इतना खास क्या है?
आरती साहा ने 1952 के हेलसिंकी ओलंपिक में 11 साल, 10 महीने और 305 दिन की आयु में हिस्सा लिया, जिससे वे सबसे युवा भारतीय ओलंपियन बनीं। उन्होंने महिलाओं की 200 मीटर ब्रेस्टस्ट्रोक हीट में 3:40.8 सेकंड का समय निकाला, हालाँकि सेमीफाइनल के लिए क्वालीफाई नहीं कर सकीं।
आरती साहा को पद्म श्री क्यों दिया गया और वे इस सम्मान में क्यों विशेष हैं?
1960 में इंग्लिश चैनल विजय की ऐतिहासिक उपलब्धि के लिए भारत सरकार ने उन्हें पद्म श्री से नवाजा। वे यह सम्मान पाने वाली पहली भारतीय महिला एथलीट थीं, जो उनकी उपलब्धि की असाधारण महत्ता को दर्शाता है।
आरती साहा को इंग्लिश चैनल पार करने की प्रेरणा कहाँ से मिली?
1958 में बांग्लादेशी तैराक ब्रोजेन दास के इंग्लिश चैनल पार करने और पहले भारतीय तैराक मिहिर सेन की उपलब्धि ने आरती को इस लक्ष्य के प्रति प्रेरित किया। उनके कोच सचिन नाग, जो खुद ओलंपियन और एशियन गेम्स चैंपियन थे, का मार्गदर्शन भी उनकी सफलता में अहम रहा।
आरती साहा का निधन कब हुआ?
23 अगस्त 1994 को आरती साहा का निधन हुआ। 24 सितंबर 1940 को कलकत्ता में जन्मी इस महान तैराक ने भारतीय खेल जगत को जो विरासत दी, वह आज भी प्रासंगिक है।
राष्ट्र प्रेस
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