13 अगस्त 2026
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कलकत्ता हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: पश्चिम बंगाल में नई व्यवस्था के तहत जारी सभी OBC प्रमाणपत्र रद्द

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कलकत्ता हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: पश्चिम बंगाल में नई व्यवस्था के तहत जारी सभी OBC प्रमाणपत्र रद्द

सारांश

कलकत्ता हाई कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में TMC सरकार के दौरान नई व्यवस्था के तहत जारी सभी OBC प्रमाणपत्र रद्द कर दिए। OBC-A और OBC-B उपश्रेणियाँ अब अमान्य हैं। 142 समुदायों को शामिल करने वाला विवादित सर्वेक्षण और भ्रष्टाचार के आरोप इस फैसले की पृष्ठभूमि में हैं।

मुख्य बातें

कलकत्ता हाई कोर्ट ने 12 अगस्त 2026 को पश्चिम बंगाल में नई व्यवस्था के तहत जारी सभी OBC प्रमाणपत्र रद्द किए।
न्यायमूर्ति राजशेखर मंथा और न्यायमूर्ति अनुज सिंह की खंडपीठ ने OBC-A और OBC-B उपश्रेणियाँ समाप्त कीं।
प्रमाणपत्र धारकों को अब सामान्य श्रेणी (General Category) में माना जाएगा।
2024 में हाई कोर्ट ने 66 समुदायों को OBC सूची से बाहर किया था; सुप्रीम कोर्ट ने भी उस आदेश को बरकरार रखा था।
विवादित सर्वेक्षण केवल 2,500 नमूनों पर आधारित था, जिसके बाद 142 समुदायों को OBC सूची में शामिल किया गया था।
राज्य सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे थे; सुप्रीम कोर्ट ने नई याचिका पर स्थगन नहीं दिया था।

कलकत्ता हाई कोर्ट की खंडपीठ ने बुधवार, 12 अगस्त 2026 को एक ऐतिहासिक आदेश में पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) की पिछली सरकार के कार्यकाल में नई व्यवस्था के अंतर्गत जारी किए गए सभी अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) प्रमाणपत्रों को रद्द कर दिया। इस फैसले के बाद ऐसे प्रमाणपत्र धारकों को अब सामान्य श्रेणी (General Category) में गिना जाएगा।

फैसले का विवरण

न्यायमूर्ति राजशेखर मंथा और न्यायमूर्ति अनुज सिंह की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि राज्य में 'OBC-A' और 'OBC-B' नाम की दो अलग OBC उपश्रेणियाँ — जो पिछली सरकार के दौरान 2010 के बाद लागू की गई थीं — अब मान्य नहीं रहेंगी। अदालत ने कहा कि इन दोनों श्रेणियों के तहत जारी सभी प्रमाणपत्र निरस्त माने जाएँगे।

विवाद की पृष्ठभूमि

गौरतलब है कि 2024 में कलकत्ता हाई कोर्ट ने इसी मामले में सुनवाई करते हुए 66 समुदायों को OBC सूची से बाहर किया था और उनके प्रमाणपत्र रद्द कर दिए थे। साथ ही नए सिरे से सर्वेक्षण कराने का निर्देश दिया था। तत्कालीन ममता बनर्जी सरकार इस आदेश के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय पहुँची थी, किंतु शीर्ष अदालत ने हाई कोर्ट के निर्णय को बरकरार रखा।

इसके बाद राज्य सरकार ने नया सर्वेक्षण कराया और OBC वर्गीकरण की 'A' व 'B' सूचियों में संशोधन करते हुए कुल 142 समुदायों को OBC सूची में शामिल किया। आलोचकों का कहना है कि यह सर्वेक्षण केवल 2,500 नमूनों के आधार पर किया गया, जो पर्याप्त नहीं था।

भ्रष्टाचार के आरोप और सुप्रीम कोर्ट का रुख

पिछली सरकार के कार्यकाल में जारी OBC प्रमाणपत्रों पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे थे। जब हाई कोर्ट ने नई सूची पर आपत्ति जताई, तो राज्य सरकार पुनः सर्वोच्च न्यायालय पहुँची। इस बार सुप्रीम कोर्ट ने कोई स्थगन आदेश (Stay) नहीं दिया, जिसके चलते नए नियमों के तहत OBC प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया जारी रही।

प्रभावित लोगों पर असर

यह फैसला उन हज़ारों लोगों को प्रभावित करेगा जिन्होंने नई व्यवस्था के अंतर्गत OBC प्रमाणपत्र प्राप्त किए थे। ऐसे सभी व्यक्तियों को अब सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थाओं में सामान्य श्रेणी के अंतर्गत आवेदन करना होगा, जिससे उनकी आरक्षण-संबंधी सुविधाएँ समाप्त हो जाएँगी।

आगे क्या होगा

यह मामला अब राज्य सरकार के लिए एक बड़ी कानूनी और राजनीतिक चुनौती बन गया है। यह ऐसे समय में आया है जब पश्चिम बंगाल में OBC आरक्षण की राजनीति पहले से ही संवेदनशील मुद्दा रही है। अदालत के इस आदेश के बाद राज्य सरकार के अगले कदम पर सभी की नज़रें टिकी हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

500 नमूनों पर आधारित सर्वेक्षण से 142 समुदायों को OBC दर्जा देना उस जल्दबाज़ी की मिसाल है जो वैधता से ज़्यादा राजनीतिक लाभ को प्राथमिकता देती है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थगन न देना और अब हाई कोर्ट का यह आदेश मिलकर एक स्पष्ट संदेश देते हैं कि प्रक्रियागत खामियों पर आधारित आरक्षण टिकाऊ नहीं है। असली सवाल यह है कि जिन लोगों ने इन प्रमाणपत्रों के भरोसे नौकरी या दाखिला लिया, उनके हितों की रक्षा कौन करेगा।
RashtraPress
13 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कलकत्ता हाई कोर्ट ने OBC प्रमाणपत्र क्यों रद्द किए?
अदालत ने पाया कि पश्चिम बंगाल में TMC सरकार के कार्यकाल में नई व्यवस्था के तहत OBC प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया में गंभीर खामियाँ थीं, जिनमें केवल 2,500 नमूनों पर आधारित अपर्याप्त सर्वेक्षण और भ्रष्टाचार के आरोप शामिल थे। इसी आधार पर खंडपीठ ने सभी ऐसे प्रमाणपत्र निरस्त कर दिए।
OBC-A और OBC-B श्रेणियाँ क्या थीं?
पश्चिम बंगाल में 2010 के बाद OBC समुदाय को दो उपश्रेणियों — OBC-A और OBC-B — में विभाजित किया गया था। कलकत्ता हाई कोर्ट ने 12 अगस्त 2026 के आदेश में इन दोनों उपश्रेणियों को अमान्य घोषित कर दिया।
इस फैसले से कौन प्रभावित होगा?
वे सभी लोग प्रभावित होंगे जिन्होंने नई व्यवस्था के तहत OBC-A या OBC-B प्रमाणपत्र प्राप्त किए थे। उन्हें अब सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थाओं में सामान्य श्रेणी (General Category) के अंतर्गत माना जाएगा और आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में क्या भूमिका निभाई?
ममता बनर्जी सरकार दो बार सुप्रीम कोर्ट पहुँची — पहली बार 2024 के हाई कोर्ट आदेश के विरुद्ध, जब शीर्ष अदालत ने हाई कोर्ट का आदेश बरकरार रखा; और दूसरी बार नई सूची पर आपत्ति के बाद, जब सुप्रीम कोर्ट ने कोई स्थगन आदेश देने से इनकार कर दिया।
क्या राज्य सरकार इस फैसले को चुनौती दे सकती है?
राज्य सरकार के पास सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने का विकल्प उपलब्ध है। हालाँकि, पिछले दो अवसरों पर सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार के पक्ष में राहत नहीं दी थी, जिससे इस बार भी राहत मिलना कठिन माना जा रहा है।
राष्ट्र प्रेस
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