दानम नागेंद्र ने तेलंगाना HC की अयोग्यता के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया
सारांश
मुख्य बातें
तेलंगाना के पूर्व विधायक दानम नागेंद्र ने 22 सितंबर 2026 को सर्वोच्च न्यायालय में तेलंगाना उच्च न्यायालय के उस आदेश को चुनौती दी, जिसके अंतर्गत उन्हें दलबदल विरोधी कानून (दसवीं अनुसूची) के तहत विधानसभा सदस्य के पद से अयोग्य ठहराया गया था। उच्च न्यायालय ने 18 सितंबर 2026 को दिए अपने फैसले में उन्हें 23 अप्रैल 2024 से विधायक के तौर पर अयोग्य घोषित किया था।
मुख्य घटनाक्रम
वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत के समक्ष सोमवार को यह मामला उठाते हुए तत्काल सुनवाई का अनुरोध किया। CJI ने नागेंद्र की स्पेशल लीव पिटिशन (SLP) को बुधवार को सूचीबद्ध करने पर सहमति जताई।
नागेंद्र ने उच्च न्यायालय के उस फैसले को चुनौती दी है जिसमें विधानसभा अध्यक्ष गड्डम प्रसाद कुमार के 11 मार्च 2026 के उस आदेश को निरस्त कर दिया गया था, जिसके तहत उनके खिलाफ दायर अयोग्यता याचिकाओं को खारिज किया गया था।
हाईकोर्ट का तर्क और कानूनी आधार
मुख्य न्यायाधीश अपारेश कुमार सिंह और जस्टिस जी.एम. मोहिउद्दीन की खंडपीठ ने माना कि नागेंद्र संविधान के अनुच्छेद 191(2) के साथ पठित दसवीं अनुसूची के पैरा 2(1)(ए) के तहत अयोग्य हुए। कारण यह था कि वे दिसंबर 2023 में खैरताबाद विधानसभा सीट से भारत राष्ट्र समिति (BRS) के विधायक चुने गए थे, किंतु 23 अप्रैल 2024 को उन्होंने सिकंदराबाद लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र से कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में नामांकन दाखिल कर BRS उम्मीदवार के विरुद्ध प्रचार किया था।
उच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि विधानसभा अध्यक्ष ने कानून की गलत व्याख्या की थी — उन्होंने सदन के बाहर के आचरण को दसवीं अनुसूची के अंतर्गत अपने अधिकार-क्षेत्र से बाहर मान लिया था, जो न्यायालय की दृष्टि में त्रुटिपूर्ण था।
अयोग्यता का प्रभाव और खाली सीट
तेलंगाना उच्च न्यायालय ने खैरताबाद विधानसभा सीट को रिक्त घोषित करते हुए निर्देश दिया कि इस आदेश की प्रति तेलंगाना विधानसभा सचिव और भारत निर्वाचन आयोग (ECI) को भेजी जाए, जिससे उपचुनाव की प्रक्रिया शुरू हो सके।
गौरतलब है कि यह फैसला भाजपा (BJP) विधायक दल के नेता एलेटी महेश्वर रेड्डी और BRS विधायक पाडी कौशिक रेड्डी द्वारा दायर याचिकाओं पर आया। दोनों ने स्पीकर के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें अयोग्यता याचिकाओं को खारिज किया गया था।
बाद के व्यवहार और अनुशासनात्मक कार्रवाई पर न्यायालय का रुख
नागेंद्र के पक्ष में यह दलील दी गई थी कि BRS द्वारा उनके खिलाफ कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई न करना और बाद का उनका राजनीतिक आचरण उनकी अयोग्यता को खत्म करता है। किंतु उच्च न्यायालय ने इस तर्क को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि 'संबंधित पार्टी की चुप्पी या उसकी ओर से आंतरिक अनुशासनात्मक कार्रवाई न होना और सदस्य का बाद का व्यवहार, नागेंद्र की उस अयोग्यता को समाप्त नहीं करेगा जो बीआरएस विधायक चुने जाने के बावजूद कांग्रेस उम्मीदवार के तौर पर 2024 का लोकसभा चुनाव लड़ने की वजह से हुई।'
आगे क्या होगा
सर्वोच्च न्यायालय में नागेंद्र की SLP की सुनवाई बुधवार को निर्धारित है। न्यायालय यह तय करेगा कि उच्च न्यायालय के आदेश पर अंतरिम रोक लगाई जाए या नहीं। यह मामला दलबदल विरोधी कानून की व्यापक व्याख्या और विधानसभा अध्यक्ष के विवेकाधिकार की सीमाओं की दृष्टि से संवैधानिक महत्व रखता है।