दिल्ली हाईकोर्ट ने तिहाड़ जेल अधीक्षक के खिलाफ अवमानना कार्यवाही शुरू की, अनुच्छेद 14 व 21 के उल्लंघन पर सख्त टिप्पणी
सारांश
मुख्य बातें
दिल्ली हाईकोर्ट ने 17 सितंबर 2026 को तिहाड़ जेल की सेंट्रल जेल-2 के अधीक्षक डॉ. पवन कुमार के खिलाफ अदालत की अवमानना की कार्यवाही शुरू करते हुए कड़ी टिप्पणी की कि पैरोल आदेश को लागू न कर जेल प्रशासन ने 'कानूनी व्यवस्था का मजाक बनाया' और एक विचाराधीन कैदी के संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन किया। न्यायमूर्ति पुरुषेन्द्र कुमार कौरव की एकल पीठ ने डॉ. कुमार को नोटिस जारी कर 22 सितंबर की सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने और जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह पूरा विवाद विचाराधीन कैदी अनवर हुसैन की याचिका से जुड़ा है, जो पाँच साल पाँच महीने से तिहाड़ जेल में बंद हैं। हुसैन ने सर्वोच्च न्यायालय में अपने कानूनी उपाय अपनाने के लिए आठ सप्ताह की पैरोल का अनुरोध किया था, लेकिन जेल प्रशासन ने उनका पैरोल आवेदन खारिज कर दिया था, जिसे उन्होंने हाईकोर्ट में चुनौती दी।
इस मामले में उल्लेखनीय यह है कि हुसैन अभी भी विचाराधीन कैदी हैं — अर्थात् उनकी सुनवाई पूरी नहीं हुई है। इतने लंबे समय तक विचाराधीन अवस्था में बंद रहना स्वयं में न्यायिक व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न उठाता है।
मुख्य घटनाक्रम
दिल्ली हाईकोर्ट ने 30 जुलाई को अनवर हुसैन को चार सप्ताह की पैरोल पर रिहा करने का आदेश दिया था और कहा था कि सक्षम प्राधिकारी आवश्यक शर्तें तय करेगा। परंतु जेल प्रशासन ने कोई शर्त ही नहीं तय की, जिससे हुसैन अदालती आदेश के बावजूद जेल में बंद रहे।
स्थिति न सुधरने पर 11 अगस्त को हाईकोर्ट ने अपने पहले आदेश में संशोधन करते हुए पैरोल की स्पष्ट शर्तें खुद तय कर दीं। इसके बाद जब हुसैन की पत्नी रिहाई की औपचारिकताएँ पूरी करने जेल पहुँची, तो उन्हें बताया गया कि जेल अधिकारी 11 अगस्त का आदेश तब तक लागू नहीं करेंगे, जब तक वह आदेश सीधे हाईकोर्ट से प्राप्त न हो।
अदालत की कड़ी टिप्पणियाँ
न्यायमूर्ति कौरव ने इस रुख को अस्वीकार्य करार देते हुए कहा कि 11 अगस्त का आदेश डिजिटल हस्ताक्षर वाला सार्वजनिक दस्तावेज था, जिसकी प्रामाणिकता सरलता से जाँची जा सकती थी। अदालत ने कहा कि 'सामान्य प्रक्रिया' और 'रूटीन' जैसे शब्दों का सहारा लेकर जेल अधीक्षक अपने अधिकारों के दुरुपयोग को उचित ठहराने की कोशिश कर रहे थे।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि 11 अगस्त के आदेश में याचिकाकर्ता के निवास स्थान से संबंधित कोई शर्त नहीं थी, इसलिए पते के सत्यापन का तर्क निराधार था। न्यायमूर्ति कौरव ने कहा कि जेल प्रशासन के 'कमजोर और अस्वीकार्य बहानों' के कारण संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन एवं स्वतंत्रता का अधिकार) के तहत मिले अधिकारों का खुला उल्लंघन हुआ।
जेल अधीक्षक का पक्ष
सुनवाई के दौरान डॉ. पवन कुमार ने कहा कि उनकी कार्रवाई किसी दुर्भावना से प्रेरित नहीं थी और पैरोल से पहले याचिकाकर्ता के रहने के पते का सत्यापन नहीं हो पाया था — जो उनके अनुसार एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया है। हाईकोर्ट ने इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया, यह कहते हुए कि 30 जुलाई के आदेश में जेल प्रशासन को शर्तें तय करने का अधिकार स्पष्ट रूप से दिया गया था, फिर भी उसने उसका पालन नहीं किया।
डॉ. कुमार ने अदालत का नोटिस स्वीकार कर लिया है और जवाब दाखिल करने के लिए समय माँगा है।
आगे क्या होगा
मामले की अगली सुनवाई 22 सितंबर 2026 को निर्धारित है, जिसमें डॉ. पवन कुमार को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना होगा। यह कार्यवाही अदालत की अवमानना अधिनियम, 1971 के तहत चलाई जा रही है। यह मामला न केवल तिहाड़ जेल प्रशासन की जवाबदेही पर, बल्कि देश भर में अदालती आदेशों के क्रियान्वयन और विचाराधीन कैदियों के अधिकारों पर भी महत्त्वपूर्ण मिसाल कायम कर सकता है।