धर्म के आधार पर आरक्षण: राज्यसभा में भाजपा सांसद का विवादित बयान, विपक्ष का वॉकआउट
सारांश
Key Takeaways
- राज्यसभा में धर्म के आधार पर आरक्षण का मुद्दा उठाया गया।
- विपक्ष ने सदन से वॉकआउट किया।
- संविधान का उल्लंघन होने का आरोप।
- सामाजिक न्याय की आवश्यकता पर जोर।
- राज्यों के उदाहरण दिए गए।
नई दिल्ली, 30 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। राज्यसभा में सोमवार को तब हंगामा मच गया, जब भाजपा सांसद के. लक्ष्मण ने ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) श्रेणी से मुस्लिम समुदाय को बाहर किए जाने का सवाल उठाया।
शून्यकाल के दौरान इस मुद्दे को उठाते हुए उन्होंने कहा कि ओबीसी आरक्षण का लाभ केवल सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों को मिलना चाहिए, और इसे धर्म के आधार पर नहीं दिया जाना चाहिए। इस पर विपक्षी दलों ने कड़ा विरोध जताया। जब विवाद बढ़ा, विपक्ष ने सरकार के खिलाफ विरोध स्वरूप सदन से वॉकआउट किया।
'इंडिया' एलायंस के सांसदों ने इसे विभाजनकारी मुद्दा बताया और इसे संविधान और सामाजिक न्याय के खिलाफ करार दिया।
भाजपा के राज्यसभा सदस्य के. लक्ष्मण ने कहा कि सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए जारी आरक्षण का कुछ राज्यों में धर्म के आधार पर दुरुपयोग हो रहा है, जो संविधान की भावना के खिलाफ है। उन्होंने आगे कहा कि आरक्षण का मुख्य उद्देश्य सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन को समाप्त करना है, लेकिन कुछ राज्य सरकारें इसे धार्मिक पहचान से जोड़कर लागू कर रही हैं। उन्होंने विभिन्न राज्यों के उदाहरण भी दिए।
उन्होंने कर्नाटक में मुस्लिम समुदाय को ओबीसी सूची में शामिल कर लगभग 4 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने का उल्लेख किया। इसके अलावा, भाजपा सांसद ने पश्चिम बंगाल का भी जिक्र किया, जहाँ बड़ी संख्या में मुस्लिम समुदाय को ओबीसी श्रेणी में शामिल किया गया है, जिससे वास्तविक पिछड़े वर्गों के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। तमिलनाडु में भी मुस्लिम समुदाय के लिए अलग से आरक्षण व्यवस्था का उल्लेख किया गया। केरल में भी मुस्लिम समुदाय को ओबीसी सूची में शामिल कर आरक्षण प्रतिशत बढ़ाने की बात की गई।
तेलंगाना में भी मुस्लिम समुदाय के लिए विशेष आरक्षण का मुद्दा उठाया गया। भाजपा सांसद ने कहा कि धर्म के आधार पर आरक्षण देना संविधान के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि कुछ मामलों में न्यायालयों (हाईकोर्ट) ने इस प्रकार की व्यवस्थाओं पर आपत्ति जताई है।
उन्होंने बीआर अंबेडकर के विचारों का हवाला देते हुए कहा कि आरक्षण का आधार धर्म नहीं, बल्कि सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन होना चाहिए। उन्होंने सरकार से अपील की कि धर्म आधारित आरक्षण की व्यापक समीक्षा कराई जाए। यह सुनिश्चित किया जाए कि आरक्षण का लाभ वास्तव में जरूरतमंद और पिछड़े वर्गों तक पहुंचे। सामाजिक न्याय की मूल भावना को बनाए रखना आवश्यक है। अंत में उन्होंने कहा कि अगर आरक्षण को केवल धार्मिक पहचान से जोड़ा गया, तो इससे सामाजिक न्याय की मूल भावना कमजोर होगी और वास्तविक रूप से वंचित वर्गों को नुकसान होगा।