डिजिटल अरेस्ट के नाम पर 73 वर्षीय मुंबई कारोबारी से ₹7.9 करोड़ की ठगी, 14 दिन तक वीडियो कॉल पर रखा बंधक
सारांश
मुख्य बातें
मुंबई के अंधेरी निवासी एक 73 वर्षीय टूर एंड ट्रैवल कारोबारी को साइबर ठगों ने 'डिजिटल अरेस्ट' का भय दिखाकर 14 दिनों में ₹7.9 करोड़ की चपत लगा दी। मुंबई वेस्ट साइबर पुलिस ने 21 जुलाई 2025 को एफआईआर दर्ज कर मामले की जांच शुरू कर दी है और ठगी गई राशि की वसूली की प्रक्रिया भी आरंभ की गई है।
कैसे बिछाया गया ठगी का जाल
5 जुलाई को कारोबारी के व्हाट्सऐप पर एक अज्ञात नंबर से कॉल आया। कॉल करने वाले ने खुद को दिल्ली पुलिस का अधिकारी बताया और दावा किया कि कारोबारी का नाम जेट एयरवेज के संस्थापक नरेश गोयल से जुड़े एक मनी लॉन्ड्रिंग मामले में सामने आया है। व्हाट्सऐप प्रोफाइल पर दिल्ली पुलिस की तस्वीर लगी होने के कारण कारोबारी को इस व्यक्ति पर विश्वास हो गया।
इसके बाद ठगों ने मामले को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़कर कारोबारी को किसी से भी बात करने से मना कर दिया। कई दिनों तक वीडियो कॉल के ज़रिए उनसे 'पूछताछ' की जाती रही। राहुल गुप्ता नाम बताने वाले एक व्यक्ति ने आरोप लगाया कि कारोबारी के आधार कार्ड का दुरुपयोग कर एक सरकारी बैंक में खाता खोला गया है, जिसमें ₹7 करोड़ जमा हैं — और गिरफ्तारी की धमकी भी दी।
फर्जी दस्तावेजों से बढ़ाया दबाव
ठगों ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) और सर्वोच्च न्यायालय के नाम से जाली दस्तावेज भेजे। खुद को दिल्ली साइबर पुलिस की अधिकारी निशा गुप्ता बताने वाली एक महिला ने कारोबारी को निर्देश दिया कि अदालत के आदेश के तहत वे अपने म्यूचुअल फंड, फिक्स्ड डिपॉजिट और बैंक खातों की राशि निर्दिष्ट निजी बैंक खातों में स्थानांतरित करें। इस दावे को विश्वसनीय बनाने के लिए एक फर्जी सुप्रीम कोर्ट आदेश भी प्रस्तुत किया गया।
14 दिनों में छह बार में गई ₹7.9 करोड़ की रकम
लगातार दबाव और भय के माहौल में कारोबारी ने 7 जुलाई से 16 जुलाई के बीच छह अलग-अलग लेनदेन में कुल ₹7.9 करोड़ ठगों द्वारा बताए गए खातों में भेज दिए। यह राशि उनकी जीवनभर की बचत — म्यूचुअल फंड, एफडी और बैंक जमा — से निकाली गई थी।
पर्दाफाश और पुलिस कार्रवाई
18 जुलाई को वेस्ट साइबर पुलिस के अधिकारी स्वयं कारोबारी के घर पहुँचे और उन्हें बताया कि वे साइबर धोखाधड़ी का शिकार हो चुके हैं। भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) से प्राप्त खुफिया जानकारी के आधार पर 21 जुलाई को एफआईआर दर्ज की गई। पुलिस के अनुसार ठगी गई ₹7.9 करोड़ की राशि की वसूली की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं
साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार 'डिजिटल अरेस्ट' एक संगठित साइबर अपराध पद्धति है जिसमें ठग पीड़ित को मनोवैज्ञानिक दबाव में रखकर परिजनों और मित्रों से अलग-थलग कर देते हैं। यह ऐसे समय में आया है जब देशभर में इस प्रकार के मामलों की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है। गौरतलब है कि केंद्र सरकार और I4C ने नागरिकों को इस तरह के फर्जी कॉल के प्रति सचेत करने के लिए कई बार सार्वजनिक परामर्श जारी किए हैं। जांच एजेंसियाँ कभी भी वीडियो कॉल के माध्यम से 'डिजिटल अरेस्ट' नहीं करतीं — यह तथ्य नागरिकों के लिए सबसे बड़ी सुरक्षा कवच है।