25 जुलाई 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

डिजिटल अरेस्ट के नाम पर 73 वर्षीय मुंबई कारोबारी से ₹7.9 करोड़ की ठगी, 14 दिन तक वीडियो कॉल पर रखा बंधक

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
डिजिटल अरेस्ट के नाम पर 73 वर्षीय मुंबई कारोबारी से ₹7.9 करोड़ की ठगी, 14 दिन तक वीडियो कॉल पर रखा बंधक

सारांश

मुंबई के एक 73 वर्षीय कारोबारी को ठगों ने 14 दिन तक वीडियो कॉल पर 'डिजिटल अरेस्ट' में रखा — फर्जी ED नोटिस, जाली सुप्रीम कोर्ट आदेश और दिल्ली पुलिस की आड़ में। नतीजा: ₹7.9 करोड़ की बचत स्वाहा। मुंबई वेस्ट साइबर पुलिस ने FIR दर्ज कर वसूली शुरू की है।

मुख्य बातें

मुंबई के अंधेरी निवासी 73 वर्षीय टूर एंड ट्रैवल कारोबारी से 'डिजिटल अरेस्ट' के नाम पर ₹7.9 करोड़ की ठगी हुई।
ठगी 7 जुलाई से 16 जुलाई 2025 के बीच छह अलग-अलग लेनदेन में की गई।
ठगों ने खुद को दिल्ली पुलिस और ED का अधिकारी बताया तथा फर्जी सुप्रीम कोर्ट आदेश भेजे।
जेट एयरवेज संस्थापक नरेश गोयल के मनी लॉन्ड्रिंग मामले का हवाला देकर कारोबारी को डराया गया।
भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) की सूचना के आधार पर 21 जुलाई को एफआईआर दर्ज हुई।
वेस्ट साइबर पुलिस ने ठगी गई ₹7.9 करोड़ की राशि वापस दिलाने की प्रक्रिया शुरू की।

मुंबई के अंधेरी निवासी एक 73 वर्षीय टूर एंड ट्रैवल कारोबारी को साइबर ठगों ने 'डिजिटल अरेस्ट' का भय दिखाकर 14 दिनों में ₹7.9 करोड़ की चपत लगा दी। मुंबई वेस्ट साइबर पुलिस ने 21 जुलाई 2025 को एफआईआर दर्ज कर मामले की जांच शुरू कर दी है और ठगी गई राशि की वसूली की प्रक्रिया भी आरंभ की गई है।

कैसे बिछाया गया ठगी का जाल

5 जुलाई को कारोबारी के व्हाट्सऐप पर एक अज्ञात नंबर से कॉल आया। कॉल करने वाले ने खुद को दिल्ली पुलिस का अधिकारी बताया और दावा किया कि कारोबारी का नाम जेट एयरवेज के संस्थापक नरेश गोयल से जुड़े एक मनी लॉन्ड्रिंग मामले में सामने आया है। व्हाट्सऐप प्रोफाइल पर दिल्ली पुलिस की तस्वीर लगी होने के कारण कारोबारी को इस व्यक्ति पर विश्वास हो गया।

इसके बाद ठगों ने मामले को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़कर कारोबारी को किसी से भी बात करने से मना कर दिया। कई दिनों तक वीडियो कॉल के ज़रिए उनसे 'पूछताछ' की जाती रही। राहुल गुप्ता नाम बताने वाले एक व्यक्ति ने आरोप लगाया कि कारोबारी के आधार कार्ड का दुरुपयोग कर एक सरकारी बैंक में खाता खोला गया है, जिसमें ₹7 करोड़ जमा हैं — और गिरफ्तारी की धमकी भी दी।

फर्जी दस्तावेजों से बढ़ाया दबाव

ठगों ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) और सर्वोच्च न्यायालय के नाम से जाली दस्तावेज भेजे। खुद को दिल्ली साइबर पुलिस की अधिकारी निशा गुप्ता बताने वाली एक महिला ने कारोबारी को निर्देश दिया कि अदालत के आदेश के तहत वे अपने म्यूचुअल फंड, फिक्स्ड डिपॉजिट और बैंक खातों की राशि निर्दिष्ट निजी बैंक खातों में स्थानांतरित करें। इस दावे को विश्वसनीय बनाने के लिए एक फर्जी सुप्रीम कोर्ट आदेश भी प्रस्तुत किया गया।

14 दिनों में छह बार में गई ₹7.9 करोड़ की रकम

लगातार दबाव और भय के माहौल में कारोबारी ने 7 जुलाई से 16 जुलाई के बीच छह अलग-अलग लेनदेन में कुल ₹7.9 करोड़ ठगों द्वारा बताए गए खातों में भेज दिए। यह राशि उनकी जीवनभर की बचत — म्यूचुअल फंड, एफडी और बैंक जमा — से निकाली गई थी।

पर्दाफाश और पुलिस कार्रवाई

18 जुलाई को वेस्ट साइबर पुलिस के अधिकारी स्वयं कारोबारी के घर पहुँचे और उन्हें बताया कि वे साइबर धोखाधड़ी का शिकार हो चुके हैं। भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) से प्राप्त खुफिया जानकारी के आधार पर 21 जुलाई को एफआईआर दर्ज की गई। पुलिस के अनुसार ठगी गई ₹7.9 करोड़ की राशि की वसूली की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है।

विशेषज्ञ क्या कहते हैं

साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार 'डिजिटल अरेस्ट' एक संगठित साइबर अपराध पद्धति है जिसमें ठग पीड़ित को मनोवैज्ञानिक दबाव में रखकर परिजनों और मित्रों से अलग-थलग कर देते हैं। यह ऐसे समय में आया है जब देशभर में इस प्रकार के मामलों की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है। गौरतलब है कि केंद्र सरकार और I4C ने नागरिकों को इस तरह के फर्जी कॉल के प्रति सचेत करने के लिए कई बार सार्वजनिक परामर्श जारी किए हैं। जांच एजेंसियाँ कभी भी वीडियो कॉल के माध्यम से 'डिजिटल अरेस्ट' नहीं करतीं — यह तथ्य नागरिकों के लिए सबसे बड़ी सुरक्षा कवच है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि एक सुनियोजित उद्योग बन चुका है — जिसमें फर्जी वर्दी, जाली अदालती दस्तावेज और मनोवैज्ञानिक अलगाव की तिहरी रणनीति अपनाई जाती है। चिंताजनक यह है कि I4C के बार-बार सार्वजनिक परामर्श के बावजूद बुजुर्ग और शिक्षित नागरिक भी इस जाल में फँस रहे हैं, जो डिजिटल साक्षरता की गहरी खाई को उजागर करता है। वसूली की 'प्रक्रिया शुरू' होना राहत की बात है, लेकिन यह भी सच है कि साइबर ठगी में रकम वापस मिलने की दर अभी भी बेहद कम है। असली सवाल यह है कि क्या पुलिस इस बार उस पूरे नेटवर्क तक पहुँच पाएगी जिसने छह खातों में ₹7.9 करोड़ खपाए — या यह मामला भी FIR तक सिमट जाएगा।
RashtraPress
25 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

डिजिटल अरेस्ट क्या होता है?
'डिजिटल अरेस्ट' एक साइबर धोखाधड़ी की तकनीक है जिसमें ठग खुद को पुलिस, ED या CBI अधिकारी बताकर पीड़ित को वीडियो कॉल पर घंटों या दिनों तक 'हिरासत' में रखने का भ्रम देते हैं। वास्तव में भारत में कोई भी जाँच एजेंसी वीडियो कॉल के ज़रिए गिरफ्तारी या हिरासत नहीं करती।
मुंबई के कारोबारी से कितनी रकम की ठगी हुई और कैसे?
अंधेरी निवासी 73 वर्षीय टूर एंड ट्रैवल कारोबारी से 7 जुलाई से 16 जुलाई 2025 के बीच छह अलग-अलग लेनदेन में कुल ₹7.9 करोड़ की ठगी की गई। ठगों ने उन्हें दिल्ली पुलिस और ED अधिकारी बनकर मनी लॉन्ड्रिंग मामले में फँसाने की धमकी दी और फर्जी सुप्रीम कोर्ट आदेश दिखाकर राशि ट्रांसफर करवाई।
मुंबई पुलिस ने इस मामले में क्या कार्रवाई की है?
भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) से मिली जानकारी के आधार पर मुंबई वेस्ट साइबर पुलिस ने 21 जुलाई 2025 को FIR दर्ज की। पुलिस ने ठगी गई ₹7.9 करोड़ की राशि वापस दिलाने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी है और मामले की गहन जांच जारी है।
इस ठगी में नरेश गोयल का नाम क्यों लिया गया?
ठगों ने जेट एयरवेज के संस्थापक नरेश गोयल से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले का हवाला देकर कारोबारी को यह विश्वास दिलाया कि उनका नाम एक हाई-प्रोफाइल वित्तीय अपराध में आया है। यह एक सुनियोजित मनोवैज्ञानिक चाल थी जिससे पीड़ित को डराकर चुप रखा जा सके।
डिजिटल अरेस्ट स्कैम से कैसे बचें?
कोई भी सरकारी एजेंसी — पुलिस, ED, CBI या अदालत — वीडियो कॉल पर 'डिजिटल अरेस्ट' नहीं करती। ऐसी कोई भी कॉल आने पर तुरंत कॉल काटें, परिजनों को सूचित करें और साइबर हेल्पलाइन नंबर 1930 पर शिकायत दर्ज करें। किसी भी दबाव में बैंक खातों में राशि ट्रांसफर न करें।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 1 महीना पहले
  2. 3 महीने पहले
  3. 3 महीने पहले
  4. 4 महीने पहले
  5. 6 महीने पहले
  6. 9 महीने पहले
  7. 9 महीने पहले
  8. 9 महीने पहले