केरल में DYFI-SFI का राज्यव्यापी प्रदर्शन, UDF सरकार पर भ्रष्टाचार और फीस वृद्धि के आरोप
सारांश
मुख्य बातें
केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम समेत पूरे राज्य में 24 जून 2026 को माकपा के युवा संगठन डेमोक्रेटिक यूथ फेडरेशन ऑफ इंडिया (डीवाईएफआई) और छात्र संगठन स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) ने कांग्रेस नेतृत्व वाली यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) सरकार के विरुद्ध बड़े पैमाने पर प्रदर्शन किए। करीब एक दशक बाद वामपंथी संगठनों की यह सड़क पर वापसी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। कई स्थानों पर पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पें भी हुईं।
प्रदर्शन की पृष्ठभूमि
2016 से 2026 तक पिनराई विजयन के नेतृत्व में वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) के सत्ता में रहने के कारण माकपा का परंपरागत आंदोलनकारी तंत्र शांत रहा था। लेकिन मई 2026 के विधानसभा चुनाव में यूडीएफ की जीत और वी.डी. सतीशन के मुख्यमंत्री पद संभालने के बाद वामपंथी दल ने विपक्ष की भूमिका में आक्रामक रुख अपना लिया है। 18 मई को नई सरकार के शपथ लेने के बाद से ही माकपा सरकार के हर फैसले पर पैनी नज़र रखे हुए है।
मुख्य मुद्दे और आरोप
डीवाईएफआई कार्यकर्ताओं ने यूडीएफ सरकार पर शराब कंपनियों को कर में रियायत देने के फैसले में भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए राज्यभर में प्रदर्शन किए। कई स्थानों पर पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पानी की बौछारें कीं और लाठीचार्ज का सहारा लिया। ये प्रदर्शन माकपा राज्य सचिव एम.वी. गोविंदन के नेतृत्व वाले पार्टी राज्य सचिवालय द्वारा जारी बयान के बाद आयोजित किए गए थे। मई में चुनावी हार के बाद यह डीवाईएफआई का पहला समन्वित राज्यव्यापी आंदोलन बताया जा रहा है।
उधर, एसएफआई कार्यकर्ताओं ने सहकारी शिक्षण संस्थानों में फीस वृद्धि के विरोध में राज्य सचिवालय तक मार्च निकाला, जिसके दौरान कई स्थानों पर तनाव बना रहा। आरोप है कि प्रदर्शनकारियों ने मुख्यमंत्री सतीशन और कांग्रेस समर्थित संगठनों के नेताओं की तस्वीरों वाले होर्डिंग्स और फ्लेक्स बोर्डों को नुकसान पहुंचाया।
ऐतिहासिक संदर्भ
डीवाईएफआई की सड़कों पर वापसी के साथ उसके कुछ पुराने उग्र आंदोलनों की यादें भी ताज़ा हो गई हैं। गौरतलब है कि एक समय प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा पिनराई विजयन की बेटी से जुड़े एक मामले की जाँच के दौरान विपक्ष के नेता के किराये के मकान पर छापेमारी के बाद वहाँ से लौट रहे अधिकारियों पर वामपंथी कार्यकर्ताओं ने कथित तौर पर हमला किया था, जिसके बाद कई गिरफ्तारियाँ हुई थीं। हालाँकि बुधवार के प्रदर्शन उस स्तर तक नहीं पहुँचे।
राजनीतिक विश्लेषण
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि बुधवार का प्रदर्शन विपक्ष के रूप में माकपा के आक्रामक अभियान की औपचारिक शुरुआत का संकेत है। यह ऐसे समय में आया है जब दस वर्षों तक सत्ता में रहने के बाद माकपा पहली बार विपक्ष की कुर्सी पर बैठी है और उसे अपनी जमीनी ताकत को फिर से सक्रिय करना है। आने वाले महीनों में वामपंथी दल और अधिक मुद्दों पर सरकार को घेरने की रणनीति अपना सकता है।