PISA 2025: यूरोप में शिक्षा का गिरता स्तर, जर्मनी-नीदरलैंड-फिनलैंड के नतीजों ने बढ़ाई चिंता
सारांश
मुख्य बातें
PISA (Programme for International Student Assessment) 2025 के नतीजों ने यूरोप की शिक्षा व्यवस्था को लेकर गहरी बेचैनी पैदा कर दी है। फ्रांस, जर्मनी, नीदरलैंड और फिनलैंड — जिन्हें दुनिया की सबसे सशक्त शिक्षा प्रणालियों में गिना जाता रहा है — के 15 वर्षीय विद्यार्थियों के गणित, पठन और विज्ञान में प्रदर्शन में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (OECD) द्वारा संचालित इस आकलन में 91 देशों और अर्थव्यवस्थाओं के करीब 7.60 लाख विद्यार्थियों ने भाग लिया, और परिणामों ने डिजिटल युग में बुनियादी शिक्षा को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
PISA क्या है और 2025 के आकलन की व्यापकता
PISA एक अंतरराष्ट्रीय शैक्षिक मूल्यांकन कार्यक्रम है, जिसे OECD संचालित करता है। इसमें यह परखा जाता है कि 15 वर्ष की आयु के विद्यार्थी स्कूल में अर्जित ज्ञान और कौशल का वास्तविक जीवन की परिस्थितियों में किस हद तक उपयोग कर सकते हैं। 2025 के दौर में यह परीक्षण गणित, पठन और विज्ञान — तीन मुख्य क्षेत्रों में किया गया।
गौरतलब है कि भारत ने अंतिम बार 2009 में इस आकलन में भाग लिया था। तब के नतीजे उत्साहवर्धक नहीं रहे थे, जिसके बाद तत्कालीन सरकार ने भागीदारी पर विराम लगा दिया था। यह ऐसे समय में और भी प्रासंगिक है जब वैश्विक स्तर पर शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर व्यापक पुनर्मूल्यांकन हो रहा है।
जर्मनी और नीदरलैंड: चिंताजनक आँकड़े
जर्मनी में गिरावट विशेष रूप से ध्यान खींचने वाली रही। आँकड़ों के अनुसार, लगभग चार में से एक विद्यार्थी विज्ञान में और करीब तीन में से एक विद्यार्थी पठन एवं गणित में आवश्यक न्यूनतम दक्षता तक नहीं पहुँच सका। रिपोर्ट बताती है कि पिछले एक दशक में जर्मनी में कमजोर प्रदर्शन करने वाले विद्यार्थियों का अनुपात लगातार बढ़ा है।
नीदरलैंड में पठन क्षमता को लेकर स्थिति और भी गंभीर है। 2025 में करीब 39% विद्यार्थी पठन में बुनियादी दक्षता हासिल नहीं कर सके, जबकि 2022 में यह आँकड़ा 33% था। पिछले एक दशक में डच विद्यार्थियों के पठन प्रदर्शन में व्यापक गिरावट दर्ज की गई है।
फ्रांस और फिनलैंड भी पिछड़े
फ्रांस के नतीजे अब तक के सबसे कमजोर परिणामों में शामिल रहे। वहीं फिनलैंड, जिसे दशकों से शिक्षा का आदर्श मॉडल माना जाता रहा है, में भी गणित और पठन प्रदर्शन में गिरावट सामने आई है। यह उन देशों के लिए भी एक झटके की तरह है जिन्होंने अपनी शिक्षा प्रणाली को विश्व के लिए अनुकरणीय बताया था।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह गिरावट किसी एक देश या एक शिक्षा मॉडल की विफलता नहीं है — OECD देशों में पिछले वर्षों की तुलना में औसत प्रदर्शन में व्यापक कमजोरी देखी गई है, जो इसे एक क्षेत्रीय प्रवृत्ति से अधिक वैश्विक चुनौती बनाती है।
गिरावट के संभावित कारण
शिक्षाविदों और विशेषज्ञों के बीच इस गिरावट के कारणों को लेकर अलग-अलग मत सामने आए हैं। कोविड-19 महामारी के दौरान पढ़ाई में आई बाधा को एक प्रमुख कारण माना जा रहा है, लेकिन आलोचकों का कहना है कि समस्या केवल महामारी तक सीमित नहीं है।
विद्यार्थियों में स्मार्टफोन और डिजिटल उपकरणों के बढ़ते उपयोग, स्कूल से अनुपस्थिति, पठन की आदत में आए बदलाव और सामाजिक-आर्थिक असमानता को भी संभावित कारणों में गिना जा रहा है। यह ऐसे समय में सामने आया है जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और डिजिटल तकनीक पर निर्भरता तेज़ी से बढ़ रही है।
विकसित देशों के लिए आगे की चुनौती
PISA 2025 के नतीजे यह रेखांकित करते हैं कि विकसित देशों की शिक्षा प्रणालियों के सामने अब एक नई और जटिल चुनौती है — डिजिटल युग में बच्चों की बुनियादी सीखने की क्षमता को किस तरह सुरक्षित और सुदृढ़ रखा जाए। शैक्षिक नीति-निर्माताओं पर यह दबाव है कि वे न केवल पाठ्यक्रम, बल्कि कक्षा में तकनीक के उपयोग और सामाजिक परिवेश को भी नए सिरे से परखें। आने वाले वर्षों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि कौन से देश इस गिरावट को पलटने में सफल होते हैं।