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PISA 2025: यूरोप में शिक्षा का गिरता स्तर, जर्मनी-नीदरलैंड-फिनलैंड के नतीजों ने बढ़ाई चिंता

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PISA 2025: यूरोप में शिक्षा का गिरता स्तर, जर्मनी-नीदरलैंड-फिनलैंड के नतीजों ने बढ़ाई चिंता

सारांश

दशकों से आदर्श मानी जाने वाली यूरोपीय शिक्षा प्रणालियाँ अब खुद एक बड़े सवाल के घेरे में हैं। PISA 2025 के नतीजों ने जर्मनी, नीदरलैंड, फ्रांस और फिनलैंड में गणित, पठन और विज्ञान में व्यापक गिरावट उजागर की — और यह संकट महामारी से कहीं गहरा और पुराना लगता है।

मुख्य बातें

PISA 2025 में 91 देशों के करीब 7.60 लाख विद्यार्थियों ने भाग लिया; OECD द्वारा संचालित इस आकलन में 15 वर्षीय छात्रों की दक्षता परखी गई।
जर्मनी में लगभग तीन में से एक छात्र पठन और गणित में न्यूनतम दक्षता से नीचे; चार में से एक विज्ञान में पिछड़ा।
नीदरलैंड में 2025 में 39% विद्यार्थी पठन में बुनियादी दक्षता से वंचित, जो 2022 में 33% था।
फ्रांस के नतीजे अब तक के सबसे कमजोर; फिनलैंड में भी गणित और पठन में गिरावट।
विशेषज्ञ कोविड-19 , स्मार्टफोन उपयोग, स्कूल अनुपस्थिति और सामाजिक-आर्थिक असमानता को संभावित कारण मान रहे हैं।
भारत ने अंतिम बार 2009 में PISA में भाग लिया था, जिसके बाद उसने भागीदारी रोक दी थी।

PISA (Programme for International Student Assessment) 2025 के नतीजों ने यूरोप की शिक्षा व्यवस्था को लेकर गहरी बेचैनी पैदा कर दी है। फ्रांस, जर्मनी, नीदरलैंड और फिनलैंड — जिन्हें दुनिया की सबसे सशक्त शिक्षा प्रणालियों में गिना जाता रहा है — के 15 वर्षीय विद्यार्थियों के गणित, पठन और विज्ञान में प्रदर्शन में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (OECD) द्वारा संचालित इस आकलन में 91 देशों और अर्थव्यवस्थाओं के करीब 7.60 लाख विद्यार्थियों ने भाग लिया, और परिणामों ने डिजिटल युग में बुनियादी शिक्षा को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

PISA क्या है और 2025 के आकलन की व्यापकता

PISA एक अंतरराष्ट्रीय शैक्षिक मूल्यांकन कार्यक्रम है, जिसे OECD संचालित करता है। इसमें यह परखा जाता है कि 15 वर्ष की आयु के विद्यार्थी स्कूल में अर्जित ज्ञान और कौशल का वास्तविक जीवन की परिस्थितियों में किस हद तक उपयोग कर सकते हैं। 2025 के दौर में यह परीक्षण गणित, पठन और विज्ञान — तीन मुख्य क्षेत्रों में किया गया।

गौरतलब है कि भारत ने अंतिम बार 2009 में इस आकलन में भाग लिया था। तब के नतीजे उत्साहवर्धक नहीं रहे थे, जिसके बाद तत्कालीन सरकार ने भागीदारी पर विराम लगा दिया था। यह ऐसे समय में और भी प्रासंगिक है जब वैश्विक स्तर पर शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर व्यापक पुनर्मूल्यांकन हो रहा है।

जर्मनी और नीदरलैंड: चिंताजनक आँकड़े

जर्मनी में गिरावट विशेष रूप से ध्यान खींचने वाली रही। आँकड़ों के अनुसार, लगभग चार में से एक विद्यार्थी विज्ञान में और करीब तीन में से एक विद्यार्थी पठन एवं गणित में आवश्यक न्यूनतम दक्षता तक नहीं पहुँच सका। रिपोर्ट बताती है कि पिछले एक दशक में जर्मनी में कमजोर प्रदर्शन करने वाले विद्यार्थियों का अनुपात लगातार बढ़ा है।

नीदरलैंड में पठन क्षमता को लेकर स्थिति और भी गंभीर है। 2025 में करीब 39% विद्यार्थी पठन में बुनियादी दक्षता हासिल नहीं कर सके, जबकि 2022 में यह आँकड़ा 33% था। पिछले एक दशक में डच विद्यार्थियों के पठन प्रदर्शन में व्यापक गिरावट दर्ज की गई है।

फ्रांस और फिनलैंड भी पिछड़े

फ्रांस के नतीजे अब तक के सबसे कमजोर परिणामों में शामिल रहे। वहीं फिनलैंड, जिसे दशकों से शिक्षा का आदर्श मॉडल माना जाता रहा है, में भी गणित और पठन प्रदर्शन में गिरावट सामने आई है। यह उन देशों के लिए भी एक झटके की तरह है जिन्होंने अपनी शिक्षा प्रणाली को विश्व के लिए अनुकरणीय बताया था।

विशेषज्ञों के अनुसार, यह गिरावट किसी एक देश या एक शिक्षा मॉडल की विफलता नहीं है — OECD देशों में पिछले वर्षों की तुलना में औसत प्रदर्शन में व्यापक कमजोरी देखी गई है, जो इसे एक क्षेत्रीय प्रवृत्ति से अधिक वैश्विक चुनौती बनाती है।

गिरावट के संभावित कारण

शिक्षाविदों और विशेषज्ञों के बीच इस गिरावट के कारणों को लेकर अलग-अलग मत सामने आए हैं। कोविड-19 महामारी के दौरान पढ़ाई में आई बाधा को एक प्रमुख कारण माना जा रहा है, लेकिन आलोचकों का कहना है कि समस्या केवल महामारी तक सीमित नहीं है।

विद्यार्थियों में स्मार्टफोन और डिजिटल उपकरणों के बढ़ते उपयोग, स्कूल से अनुपस्थिति, पठन की आदत में आए बदलाव और सामाजिक-आर्थिक असमानता को भी संभावित कारणों में गिना जा रहा है। यह ऐसे समय में सामने आया है जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और डिजिटल तकनीक पर निर्भरता तेज़ी से बढ़ रही है।

विकसित देशों के लिए आगे की चुनौती

PISA 2025 के नतीजे यह रेखांकित करते हैं कि विकसित देशों की शिक्षा प्रणालियों के सामने अब एक नई और जटिल चुनौती है — डिजिटल युग में बच्चों की बुनियादी सीखने की क्षमता को किस तरह सुरक्षित और सुदृढ़ रखा जाए। शैक्षिक नीति-निर्माताओं पर यह दबाव है कि वे न केवल पाठ्यक्रम, बल्कि कक्षा में तकनीक के उपयोग और सामाजिक परिवेश को भी नए सिरे से परखें। आने वाले वर्षों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि कौन से देश इस गिरावट को पलटने में सफल होते हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

तकनीकी रूप से उन्नत समाज स्वाभाविक रूप से बेहतर शिक्षा देते हैं। फिनलैंड जैसे देश, जिन्हें दशकों से 'शिक्षा का स्वर्ग' कहा जाता रहा, अब खुद पिछड़ रहे हैं — यह संकेत है कि समस्या संसाधनों की नहीं, बल्कि मॉडल की है। स्मार्टफोन और डिजिटल विचलन को दोष देना आसान है, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या ये देश अपनी शिक्षा नीति को डिजिटल युग के अनुरूप ढालने में पिछड़ गए। भारत के लिए भी यह परिणाम एक संकेत हैं — PISA से दूरी बनाए रखना वैश्विक तुलना से बचना तो है, पर अपनी खामियों की पहचान से भी।
RashtraPress
19 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

PISA 2025 क्या है और इसमें किन देशों ने भाग लिया?
PISA (Programme for International Student Assessment) OECD द्वारा संचालित एक अंतरराष्ट्रीय शैक्षिक आकलन है, जिसमें 15 वर्षीय विद्यार्थियों की गणित, पठन और विज्ञान में वास्तविक जीवन उपयोगिता परखी जाती है। 2025 के दौर में 91 देशों और अर्थव्यवस्थाओं के करीब 7.60 लाख विद्यार्थियों ने भाग लिया।
जर्मनी और नीदरलैंड के PISA 2025 नतीजे इतने चिंताजनक क्यों हैं?
जर्मनी में लगभग तीन में से एक विद्यार्थी पठन और गणित में न्यूनतम दक्षता तक नहीं पहुँचा, और यह गिरावट पिछले एक दशक से जारी है। नीदरलैंड में 2025 में 39% विद्यार्थी पठन में बुनियादी दक्षता से वंचित रहे, जबकि 2022 में यह आँकड़ा 33% था — यह तेज़ी से बढ़ती हुई प्रवृत्ति है।
यूरोप में शिक्षा स्तर गिरने के प्रमुख कारण क्या माने जा रहे हैं?
विशेषज्ञ कोविड-19 महामारी के दौरान पढ़ाई में आई बाधा, स्मार्टफोन और डिजिटल उपकरणों के अत्यधिक उपयोग, स्कूल से बढ़ती अनुपस्थिति, पठन की आदत में बदलाव और सामाजिक-आर्थिक असमानता को संभावित कारण मानते हैं। हालाँकि, आलोचकों का कहना है कि समस्या केवल महामारी तक सीमित नहीं है।
फिनलैंड, जो शिक्षा का आदर्श माना जाता था, PISA 2025 में क्यों पिछड़ा?
फिनलैंड में गणित और पठन प्रदर्शन में गिरावट दर्ज की गई है, जो दशकों से चले आ रहे उसके 'शिक्षा के स्वर्ग' वाले दर्जे पर सवाल उठाती है। विशेषज्ञों के अनुसार, डिजिटल युग में बुनियादी सीखने की क्षमता को बनाए रखना अब उन देशों के लिए भी चुनौती बन गई है जो अब तक मजबूत माने जाते थे।
भारत PISA में भाग क्यों नहीं लेता?
भारत ने 2009 में PISA में भाग लिया था, लेकिन नतीजे उत्साहवर्धक नहीं रहे थे। इसके बाद तत्कालीन सरकार ने इस आकलन में भागीदारी पर विराम लगा दिया था। तब से भारत इस वैश्विक आकलन से दूर है।
राष्ट्र प्रेस
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