गरियाबंद में सागौन तस्करी का भंडाफोड़: ₹6 लाख की लकड़ी जब्त, 1 गिरफ्तार, 7 फरार
सारांश
मुख्य बातें
छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले में ओडिशा सीमा के निकट सागौन लकड़ी की अवैध तस्करी का बड़ा नेटवर्क उजागर हुआ है। गरियाबंद पुलिस और वन विभाग की संयुक्त कार्रवाई में 1 आरोपी को गिरफ्तार किया गया, जबकि 7 अन्य आरोपी मौके से फरार होने में सफल रहे। प्रारंभिक जाँच में आरोपियों के ओडिशा के तस्कर गिरोहों से संबंध होने के संकेत मिले हैं।
मुख्य घटनाक्रम
5 जून को पुलिस को सूचना मिली कि परिक्षेत्र दक्षिण उदंती (कोर) के साहेबिनकछार गाँव में सागौन स्लीपर रखा गया है। इस सूचना के आधार पर पुलिस टीम ने विघाधर नामक व्यक्ति के ठिकाने पर छापा मारा, जहाँ भारी मात्रा में सागौन की लकड़ी बरामद हुई।
9 जून को की गई संयुक्त कार्रवाई में कई संदिग्धों के घरों की तलाशी ली गई। अधिकारियों के अनुसार, पकड़े जाने के डर से आरोपियों ने लकड़ी को अलग-अलग स्थानों पर छिपा दिया था — कुछ लकड़ियाँ तालाब में फेंकी गईं, जबकि कई हिस्सों को घर के आँगन और बाड़ी में गड्ढे खोदकर दफना दिया गया।
डॉग स्क्वाड की भूमिका और जब्ती का ब्योरा
वन विभाग की डॉग स्क्वाड की सहायता से छिपाई गई लकड़ियों का पता लगाया गया और उन्हें जब्त किया गया। कुल मिलाकर 193 नग सागौन स्लीपर और लगभग 4.56 घन मीटर लकड़ी बरामद की गई, जिसकी अनुमानित कीमत करीब ₹6 लाख आँकी गई है।
चार आरोपियों के पास से अवैध सागौन लकड़ी जब्त की गई। तीन अन्य आरोपियों के ठिकानों से वन्यप्राणी साही (अनुसूची-2) के अवयव और शिकार में उपयोग होने वाले फंदे भी बरामद किए गए। इसके अलावा मौके से एक आरा मशीन और तीन बड़े हाथ के आरे भी जब्त किए गए।
फर्नीचर नेटवर्क का खुलासा
वन विभाग के अनुसार, आरोपियों के घरों से सागौन से बने सोफा सेट सहित अन्य फर्नीचर भी बरामद हुए हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि तस्करी की लकड़ी का उपयोग स्थानीय स्तर पर फर्नीचर निर्माण के अवैध नेटवर्क में भी हो रहा था। यह मामला केवल लकड़ी की तस्करी तक सीमित नहीं, बल्कि संगठित वन अपराध का हिस्सा प्रतीत होता है।
आगे की जाँच और फरार आरोपी
अधिकारियों के अनुसार, वन अपराध प्रकरण के तहत अलग-अलग मामले दर्ज किए गए हैं और जाँच जारी है। फरार 7 आरोपियों की तलाश के लिए विशेष टीमें गठित की गई हैं। गौरतलब है कि यह क्षेत्र ओडिशा सीमा से सटा होने के कारण अंतरराज्यीय तस्करी के लिए संवेदनशील माना जाता है, और जाँच एजेंसियाँ इस नेटवर्क की व्यापकता का पता लगाने में जुटी हैं।