GDP 7.8% ग्रोथ पर सियासी घमासान: मनोज झा बोले — गरीबों के बीच जाकर बताएं, बेबी ने आंकड़ों में हेरफेर का लगाया आरोप
सारांश
मुख्य बातें
भारत की 7.8 प्रतिशत GDP वृद्धि दर के हालिया आंकड़े को लेकर नई दिल्ली में सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस छिड़ गई है। जहाँ सरकार समर्थक नेता इसे विकास का प्रमाण बता रहे हैं, वहीं विपक्षी दलों ने इस आंकड़े की विश्वसनीयता और ज़मीनी हकीकत पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
सत्तापक्ष का रुख: बिहार के बदलाव को बताया आधार
बिहार सरकार के मंत्री श्रवण कुमार ने विपक्ष की आलोचना को खारिज करते हुए कहा, 'उनसे कहिए कि वे 2005 से पहले के बिहार और 2005 के बाद के बिहार की तुलना करें।' उन्होंने तर्क दिया कि पहले गाँवों में सड़क, स्कूल, बिजली, पानी और अस्पताल जैसी बुनियादी सुविधाएँ नहीं थीं, जबकि आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। मंत्री ने कहा, 'शहर की तरह आज बिहार के गाँव हैं।'
विपक्ष की चुनौती: संविधान के अनुच्छेद 39 का हवाला
राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के सांसद मनोज झा ने GDP के आंकड़े को आम जनता की कसौटी पर परखने की माँग की। उन्होंने कहा, 'प्रधानमंत्री यह आर्थिक वृद्धि की बात किसी निम्न या गरीब वर्ग के बीच जाकर कहें, तब इस वृद्धि की हकीकत सामने आएगी।' झा ने संविधान के अनुच्छेद 39 का उल्लेख करते हुए कहा कि आर्थिक नीतियों का मूल्यांकन उसी कसौटी पर होना चाहिए, जिसमें संसाधनों के न्यायपूर्ण वितरण की बात कही गई है।
वामपंथ का प्रहार: आंकड़ों में हेरफेर का आरोप
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) [CPI(M)] के महासचिव एम. ए. बेबी ने इस ग्रोथ रेट को 'तथाकथित उछाल' करार दिया। उन्होंने कहा कि पूर्व वित्त सचिव और著名 अर्थशास्त्रियों ने खुद इस अनुमान की असलियत उजागर की है। बेबी ने रघुराम राजन जैसे अर्थशास्त्रियों का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि 'जीडीपी आंकड़ों के ज़रिए जो जबरदस्त ग्रोथ रेट दिखाई जा रही है, वह असल में आंकड़ों में हेरफेर का नतीजा है।' गौरतलब है कि GDP पद्धति और आधार वर्ष को लेकर विशेषज्ञों में पहले से बहस चल रही है।
CPI(M) का अगला कदम: पोलित ब्यूरो में होगी चर्चा
बेबी ने यह भी बताया कि CPI(M) इस मुद्दे पर अपने पोलित ब्यूरो में विस्तृत चर्चा करेगी और बैठक के बाद जारी बयान में पार्टी का आधिकारिक नजरिया सार्वजनिक किया जाएगा। उन्होंने कहा कि यह जानकारी 'एक-दो दिन में' सामने आएगी। यह ऐसे समय में आया है जब विभिन्न आर्थिक संस्थाएँ भारत की वास्तविक विकास गति को लेकर अलग-अलग अनुमान पेश कर रही हैं।
आम जनता पर असर: ग्रोथ और आजीविका के बीच की खाई
आलोचकों का कहना है कि उच्च GDP वृद्धि दर और आम नागरिक की क्रय शक्ति के बीच का अंतर एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। रोजगार, महँगाई और असंगठित क्षेत्र की स्थिति जैसे पैमानों पर जब तक स्थिति नहीं सुधरती, तब तक GDP के आंकड़े आम जनता की समृद्धि का पूरा चित्र नहीं दे सकते। आने वाले दिनों में इस बहस के और तेज होने के आसार हैं।