3 सितंबर 2026
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जीडीपी आंकड़ों में हेरफेर के दावे 'बेबुनियाद': 15वें वित्त आयोग के चेयरमैन एनके सिंह

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जीडीपी आंकड़ों में हेरफेर के दावे 'बेबुनियाद': 15वें वित्त आयोग के चेयरमैन एनके सिंह

सारांश

15वें वित्त आयोग के चेयरमैन एनके सिंह ने जीडीपी आंकड़ों में हेरफेर के आरोपों को सिरे से खारिज किया। उन्होंने आधार वर्ष बदलने को सामान्य वैश्विक प्रक्रिया बताया और नई पद्धति के तहत 7.8% वृद्धि दर तथा 38 साल बाद मिली 'ए' क्रेडिट रेटिंग को भारतीय अर्थव्यवस्था की मज़बूती का प्रमाण कहा।

मुख्य बातें

एनके सिंह ने 3 सितंबर 2026 को जीडीपी आंकड़ों में हेरफेर के सभी दावों को 'आधारहीन' करार दिया।
नई जीडीपी गणना पद्धति के तहत भारतीय अर्थव्यवस्था 7.8 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है।
भारत ने 38 वर्षों के अंतराल के बाद 'ए' सॉवरेन क्रेडिट रेटिंग पुनः हासिल की — पहले 1988 में थी, 1991 में गई, 2026 में वापस मिली।
पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने जीडीपी गणना पद्धति पर सवाल उठाए थे, जिन्हें सिंह ने बेबुनियाद बताया।
सिंह के अनुसार, आधार वर्ष बदलना एक सामान्य अंतरराष्ट्रीय प्रक्रिया है, न कि डेटा में हेरफेर।

15वें वित्त आयोग के चेयरमैन और वरिष्ठ अर्थशास्त्री एनके सिंह ने 3 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में स्पष्ट रूप से कहा कि सरकार पर जीडीपी वृद्धि दर को कृत्रिम रूप से बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने के जो आरोप लगाए जा रहे हैं, वे पूरी तरह 'आधारहीन' हैं। पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग द्वारा जीडीपी गणना पद्धति पर उठाई गई चिंताओं के संदर्भ में पूछे गए सवालों के जवाब में सिंह ने यह बात कही।

विवाद की पृष्ठभूमि

हाल के हफ्तों में कुछ अर्थशास्त्रियों और पूर्व नौकरशाहों ने यह सवाल उठाया था कि क्या सरकार ने आधार वर्ष (बेस ईयर) में बदलाव और नई गणना पद्धति अपनाकर जीडीपी वृद्धि के आंकड़ों को वास्तविकता से अधिक दर्शाया है। पूर्व वित्त सचिव गर्ग इस आलोचना में सबसे मुखर आवाज़ों में से एक रहे हैं।

यह ऐसे समय में आया है जब भारत की अर्थव्यवस्था नई जीडीपी गणना पद्धति के तहत 7.8 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है — एक आंकड़ा जो वैश्विक स्तर पर ध्यान खींच रहा है।

एनके सिंह का स्पष्टीकरण

सिंह ने कहा, 'जहाँ तक मुझे पता है, सरकार पर लगाए जा रहे आरोप पूरी तरह से बेबुनियाद हैं।' उन्होंने समझाया कि आधार वर्ष में बदलाव और गणना पद्धति को अद्यतन करना एक सामान्य अंतरराष्ट्रीय प्रक्रिया है, जिसे दुनिया के अधिकांश देश समय-समय पर अपनाते हैं।

उनके अनुसार, जैसे-जैसे नया आर्थिक डेटा उपलब्ध होता है और अर्थव्यवस्था में गतिविधियों के नए रूप उभरते हैं, देश अपनी जीडीपी गणना के आधार वर्ष को संशोधित करते हैं। सिंह ने कहा, 'इस तरह के बदलावों का मकसद अर्थव्यवस्था के ढाँचे और कामकाज में आए बदलावों को अधिक सटीक ढंग से समझना है।'

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि नई कार्यप्रणाली अधिक डेटा स्रोतों और आर्थिक क्षेत्रों की व्यापक रेंज को शामिल करती है, जिससे अर्थव्यवस्था की वास्तविक स्थिति का अधिक समग्र चित्र सामने आता है।

क्रेडिट रेटिंग से जुड़ाव

सिंह ने जीडीपी के ताज़ा आंकड़ों को भारत की बेहतर हुई सॉवरेन क्रेडिट रेटिंग से भी जोड़ा। उन्होंने बताया कि भारत ने 38 वर्षों के अंतराल के बाद 'ए' क्रेडिट रेटिंग फिर से हासिल की है। भारत 1988 में 'ए'-रेटेड देश था, लेकिन 1991 में यह दर्जा खो दिया था और 2026 तक इंतजार करना पड़ा।

सिंह ने क्रेडिट रेटिंग में सुधार और मज़बूत जीडीपी वृद्धि अनुमान के एक साथ आने को 'खुशी का संयोग' बताया। उनके अनुसार, ये दोनों घटनाएँ भारतीय अर्थव्यवस्था की अंदरूनी मज़बूती और विपरीत परिस्थितियों से उबरने की क्षमता को रेखांकित करती हैं।

आलोचकों का पक्ष

गौरतलब है कि आलोचकों — विशेष रूप से पूर्व वित्त सचिव गर्ग — का तर्क है कि पद्धति में बदलाव की पारदर्शिता और स्वतंत्र सत्यापन ज़रूरी है। उनका कहना है कि केवल आधार वर्ष बदलने से वृद्धि दर के आंकड़े बदल सकते हैं, जो आम नागरिकों की ज़मीनी आर्थिक अनुभूति से मेल नहीं खाते।

आगे की राह

सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) ने अभी तक नई गणना पद्धति के विस्तृत तकनीकी दस्तावेज़ सार्वजनिक नहीं किए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि पारदर्शी प्रकाशन से इस बहस पर विराम लग सकता है। जब तक ऐसा नहीं होता, जीडीपी आंकड़ों की विश्वसनीयता पर यह बहस जारी रहने की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन यह बहस की असली जड़ को संबोधित नहीं करता — पद्धति में बदलाव की पारदर्शिता। MoSPI ने अब तक नई गणना के विस्तृत तकनीकी दस्तावेज़ सार्वजनिक नहीं किए हैं, और बिना उसके 'सामान्य प्रक्रिया' का तर्क अधूरा रहता है। 7.8% की वृद्धि दर और 'ए' क्रेडिट रेटिंग एक साथ आना निश्चित रूप से सकारात्मक संकेत है, पर जब आम नागरिक की रोज़गार और आय की स्थिति इन आंकड़ों से मेल नहीं खाती, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। विश्वसनीयता बहस से नहीं, पारदर्शी डेटा प्रकाशन से बनती है।
RashtraPress
3 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

एनके सिंह ने जीडीपी हेरफेर के दावों को क्यों 'आधारहीन' बताया?
एनके सिंह के अनुसार, आधार वर्ष बदलना और गणना पद्धति अपडेट करना एक सामान्य वैश्विक प्रक्रिया है जो अर्थव्यवस्था की वास्तविक स्थिति को अधिक सटीक ढंग से दर्शाने के लिए की जाती है। उन्होंने कहा कि इसे डेटा में हेरफेर के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने जीडीपी पर क्या सवाल उठाए थे?
सुभाष चंद्र गर्ग ने जीडीपी गणना पद्धति में किए गए बदलावों पर चिंता जताई थी और यह सवाल उठाया था कि क्या इन बदलावों से वृद्धि दर के आंकड़े वास्तविकता से अधिक दिखाए जा रहे हैं। उनकी आलोचना मुख्यतः पारदर्शिता और स्वतंत्र सत्यापन की माँग पर केंद्रित थी।
नई जीडीपी गणना पद्धति के तहत भारत की विकास दर क्या है?
नई गणना पद्धति के आधार पर भारतीय अर्थव्यवस्था 7.8 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है। यह पद्धति अधिक डेटा स्रोतों और आर्थिक क्षेत्रों की व्यापक रेंज को शामिल करती है।
भारत को 'ए' क्रेडिट रेटिंग कब और कैसे मिली?
भारत ने 38 वर्षों के अंतराल के बाद 2026 में 'ए' सॉवरेन क्रेडिट रेटिंग पुनः हासिल की है। भारत 1988 में 'ए'-रेटेड था, 1991 में यह दर्जा खो दिया था और अब 2026 में इस श्रेणी में वापसी हुई है।
जीडीपी में आधार वर्ष बदलने का क्या मतलब होता है?
आधार वर्ष वह संदर्भ वर्ष होता है जिसके मूल्यों के आधार पर जीडीपी की तुलना की जाती है। जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था में नई गतिविधियाँ और क्षेत्र उभरते हैं, पुराना आधार वर्ष अप्रासंगिक हो जाता है और देश इसे अपडेट करते हैं — यह एक मानक अंतरराष्ट्रीय सांख्यिकीय प्रक्रिया है।
राष्ट्र प्रेस
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