जीडीपी आंकड़ों में हेरफेर के दावे 'बेबुनियाद': 15वें वित्त आयोग के चेयरमैन एनके सिंह
सारांश
मुख्य बातें
15वें वित्त आयोग के चेयरमैन और वरिष्ठ अर्थशास्त्री एनके सिंह ने 3 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में स्पष्ट रूप से कहा कि सरकार पर जीडीपी वृद्धि दर को कृत्रिम रूप से बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने के जो आरोप लगाए जा रहे हैं, वे पूरी तरह 'आधारहीन' हैं। पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग द्वारा जीडीपी गणना पद्धति पर उठाई गई चिंताओं के संदर्भ में पूछे गए सवालों के जवाब में सिंह ने यह बात कही।
विवाद की पृष्ठभूमि
हाल के हफ्तों में कुछ अर्थशास्त्रियों और पूर्व नौकरशाहों ने यह सवाल उठाया था कि क्या सरकार ने आधार वर्ष (बेस ईयर) में बदलाव और नई गणना पद्धति अपनाकर जीडीपी वृद्धि के आंकड़ों को वास्तविकता से अधिक दर्शाया है। पूर्व वित्त सचिव गर्ग इस आलोचना में सबसे मुखर आवाज़ों में से एक रहे हैं।
यह ऐसे समय में आया है जब भारत की अर्थव्यवस्था नई जीडीपी गणना पद्धति के तहत 7.8 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है — एक आंकड़ा जो वैश्विक स्तर पर ध्यान खींच रहा है।
एनके सिंह का स्पष्टीकरण
सिंह ने कहा, 'जहाँ तक मुझे पता है, सरकार पर लगाए जा रहे आरोप पूरी तरह से बेबुनियाद हैं।' उन्होंने समझाया कि आधार वर्ष में बदलाव और गणना पद्धति को अद्यतन करना एक सामान्य अंतरराष्ट्रीय प्रक्रिया है, जिसे दुनिया के अधिकांश देश समय-समय पर अपनाते हैं।
उनके अनुसार, जैसे-जैसे नया आर्थिक डेटा उपलब्ध होता है और अर्थव्यवस्था में गतिविधियों के नए रूप उभरते हैं, देश अपनी जीडीपी गणना के आधार वर्ष को संशोधित करते हैं। सिंह ने कहा, 'इस तरह के बदलावों का मकसद अर्थव्यवस्था के ढाँचे और कामकाज में आए बदलावों को अधिक सटीक ढंग से समझना है।'
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि नई कार्यप्रणाली अधिक डेटा स्रोतों और आर्थिक क्षेत्रों की व्यापक रेंज को शामिल करती है, जिससे अर्थव्यवस्था की वास्तविक स्थिति का अधिक समग्र चित्र सामने आता है।
क्रेडिट रेटिंग से जुड़ाव
सिंह ने जीडीपी के ताज़ा आंकड़ों को भारत की बेहतर हुई सॉवरेन क्रेडिट रेटिंग से भी जोड़ा। उन्होंने बताया कि भारत ने 38 वर्षों के अंतराल के बाद 'ए' क्रेडिट रेटिंग फिर से हासिल की है। भारत 1988 में 'ए'-रेटेड देश था, लेकिन 1991 में यह दर्जा खो दिया था और 2026 तक इंतजार करना पड़ा।
सिंह ने क्रेडिट रेटिंग में सुधार और मज़बूत जीडीपी वृद्धि अनुमान के एक साथ आने को 'खुशी का संयोग' बताया। उनके अनुसार, ये दोनों घटनाएँ भारतीय अर्थव्यवस्था की अंदरूनी मज़बूती और विपरीत परिस्थितियों से उबरने की क्षमता को रेखांकित करती हैं।
आलोचकों का पक्ष
गौरतलब है कि आलोचकों — विशेष रूप से पूर्व वित्त सचिव गर्ग — का तर्क है कि पद्धति में बदलाव की पारदर्शिता और स्वतंत्र सत्यापन ज़रूरी है। उनका कहना है कि केवल आधार वर्ष बदलने से वृद्धि दर के आंकड़े बदल सकते हैं, जो आम नागरिकों की ज़मीनी आर्थिक अनुभूति से मेल नहीं खाते।
आगे की राह
सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) ने अभी तक नई गणना पद्धति के विस्तृत तकनीकी दस्तावेज़ सार्वजनिक नहीं किए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि पारदर्शी प्रकाशन से इस बहस पर विराम लग सकता है। जब तक ऐसा नहीं होता, जीडीपी आंकड़ों की विश्वसनीयता पर यह बहस जारी रहने की संभावना है।