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भरूच का श्री सरदार नगर प्राथमिक स्कूल बना 'ग्रीन लैबोरेटरी', 1,000 से अधिक पेड़ों से मिल रही पर्यावरण शिक्षा

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भरूच का श्री सरदार नगर प्राथमिक स्कूल बना 'ग्रीन लैबोरेटरी', 1,000 से अधिक पेड़ों से मिल रही पर्यावरण शिक्षा

सारांश

भरूच की वालिया तालुका का श्री सरदार नगर प्राथमिक स्कूल 1,000 से अधिक पेड़ों के साथ 'ग्रीन लैबोरेटरी' बन गया है — एक रिटायर्ड शिक्षक की 22 साल की मेहनत का जीवंत प्रमाण, जो अब पूरे गुजरात के स्कूलों के लिए पर्यावरण शिक्षा का मॉडल बन रहा है।

मुख्य बातें

श्री सरदार नगर प्राथमिक स्कूल , वालिया तालुका, भरूच में 1,000 से अधिक विभिन्न प्रजातियों के पेड़-पौधे लगे हैं।
रिटायर्ड शिक्षक कमलेश कुमार कोसामिया ने 22 वर्षों की सेवा के दौरान इन पेड़ों को लगाया और पाला।
शिक्षिका धर्मेशाबेन अरोलिया के अनुसार, यह स्कूल क्षेत्र के इको क्लब में अग्रणी विद्यालय है।
टीपीईओ दिग्विजय सिंह राणा ने बताया कि ग्लोबल वार्मिंग से निपटने के लिए विद्यालयों को ग्रीन स्कूल के रूप में विकसित किया जा रहा है।
पूर्व विद्यार्थी गंगा वसावा सहित कई छात्र स्कूल के हरित माहौल और शिक्षकों की सराहना करते हैं।

गुजरात के भरूच जिले की वालिया तालुका का श्री सरदार नगर प्राथमिक स्कूल आज पूरे क्षेत्र में एक अनूठी 'ग्रीन लैबोरेटरी' के रूप में पहचाना जाता है। इस विद्यालय के परिसर में 1,000 से अधिक विभिन्न प्रजातियों के पेड़-पौधे लहलहाते हैं, जो न केवल परिसर की हवा को शुद्ध रखते हैं, बल्कि बच्चों को पर्यावरण संरक्षण का व्यावहारिक पाठ भी पढ़ाते हैं। 26 अगस्त 2026 को सामने आई यह तस्वीर दिखाती है कि एक समर्पित शिक्षक की दीर्घकालिक मेहनत किस तरह किसी स्कूल की पहचान बदल सकती है।

कैसे बना यह स्कूल हरा-भरा

इस विद्यालय को 'ग्रीन स्कूल' में रूपांतरित करने का श्रेय मुख्य रूप से रिटायर्ड शिक्षक कमलेश कोसामिया को जाता है। उन्होंने अपनी 22 वर्षों की सेवा के दौरान एक-एक पौधा लगाया और उसकी देखभाल की। उनके इस अथक परिश्रम ने स्कूल परिसर को एक जीवंत हरित उद्यान में बदल दिया, जो आज पूरे इलाके के लिए प्रेरणास्रोत है।

वर्तमान शिक्षिका धर्मेशाबेन अरोलिया ने बताया कि उनका सपना हमेशा से एक सुंदर और इको-फ्रेंडली विद्यालय बनाने का था। उन्होंने कहा, 'हमने बड़ी संख्या में पौधे लाकर लगाए और उनकी नियमित देखभाल की। यह स्कूल हमारे इको क्लब में एक अग्रणी विद्यालय है।' उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह उपलब्धि पूर्व प्रिंसिपल कमलेश कुमार कोसामिया के अथक प्रयासों की देन है, और मौजूदा प्रिंसिपल उनकी विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।

पूर्व विद्यार्थियों की यादें

इस स्कूल से पढ़कर निकले छात्र आज भी रिटायर्ड शिक्षक कमलेश कोसामिया के पर्यावरण के प्रति समर्पण को गर्व के साथ याद करते हैं। पूर्व विद्यार्थी गंगा वसावा ने कहा, 'मैंने यहाँ कक्षा 1 से 8 तक पढ़ाई की है। यहाँ का वातावरण बेहद सुंदर है और शिक्षक भी उत्कृष्ट हैं। यहाँ के विद्यार्थी हमेशा सक्रिय रहते हैं।' यह भावनात्मक जुड़ाव इस बात का प्रमाण है कि हरित परिवेश बच्चों की स्मृतियों पर गहरी छाप छोड़ता है।

शिक्षा विभाग और प्रशासन की भूमिका

शिक्षा विभाग के अधिकारियों के अनुसार, सरकार स्कूलों में स्वच्छता और हरियाली को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध है, क्योंकि इससे बच्चों में प्रकृति के प्रति प्रेम विकसित होता है और वे भविष्य में पर्यावरण-जागरूक नागरिक बनते हैं। वालिया तालुका के टीपीईओ दिग्विजय सिंह राणा ने बताया कि बच्चों को प्राथमिक स्तर से ही पर्यावरण सुरक्षा के प्रति जागरूक किया जा रहा है। उन्होंने कहा, 'ग्लोबल वार्मिंग के इस दौर में आने वाली पीढ़ी को तैयार करने के उद्देश्य से विद्यालयों को ग्रीन स्कूल के रूप में विकसित किया जा रहा है।'

आम जनता और अन्य स्कूलों पर असर

जलवायु परिवर्तन के बढ़ते दुष्प्रभावों और गहराते प्रदूषण संकट के बीच, वालिया तालुका का श्री सरदार नगर प्राथमिक स्कूल अन्य विद्यालयों के लिए एक व्यावहारिक मॉडल बनकर उभरा है। यह ऐसे समय में आया है जब पूरे देश में स्कूली पाठ्यक्रम में पर्यावरण शिक्षा को मज़बूत करने की माँग उठ रही है। यहाँ बच्चों को किताबी ज्ञान के साथ-साथ प्रकृति के साथ जीने का व्यावहारिक अनुभव भी मिल रहा है, जो उन्हें एक ज़िम्मेदार नागरिक के रूप में तैयार करता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि उस व्यवस्थागत सच्चाई की है जिसमें पर्यावरण शिक्षा अभी भी व्यक्तिगत समर्पण पर टिकी है, न कि संस्थागत ढाँचे पर। कमलेश कोसामिया की 22 साल की मेहनत प्रशंसनीय है, लेकिन सवाल यह है कि जब ऐसे समर्पित शिक्षक नहीं होते तो यह काम कौन करता है? सरकार ग्रीन स्कूल नीति की बात करती है, पर जब तक इसके लिए अलग बजट, प्रशिक्षित जनशक्ति और मापने योग्य लक्ष्य नहीं होंगे, तब तक ऐसी मिसालें अपवाद बनी रहेंगी, नियम नहीं।
RashtraPress
27 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री सरदार नगर प्राथमिक स्कूल को 'ग्रीन लैबोरेटरी' क्यों कहा जाता है?
भरूच की वालिया तालुका के इस स्कूल में 1,000 से अधिक विभिन्न प्रजातियों के पेड़-पौधे लगे हैं, जो परिसर को एक जीवंत हरित प्रयोगशाला का रूप देते हैं। यहाँ बच्चों को पाठ्यक्रम के साथ-साथ प्रकृति संरक्षण का व्यावहारिक ज्ञान भी दिया जाता है, इसीलिए इसे 'ग्रीन लैबोरेटरी' कहा जाता है।
इस स्कूल को हरा-भरा बनाने में किसका सबसे बड़ा योगदान है?
रिटायर्ड शिक्षक कमलेश कुमार कोसामिया ने अपनी 22 वर्षों की सेवा के दौरान इन 1,000 से अधिक पेड़ों को लगाया और उनकी देखभाल की। उनके इस अथक परिश्रम को ही इस हरित परिवर्तन की नींव माना जाता है।
क्या अन्य स्कूल भी इस मॉडल को अपना रहे हैं?
शिक्षा विभाग के अधिकारियों के अनुसार, गुजरात में विद्यालयों को ग्रीन स्कूल के रूप में विकसित करने की दिशा में काम हो रहा है। वालिया तालुका के टीपीईओ दिग्विजय सिंह राणा ने बताया कि ग्लोबल वार्मिंग से निपटने के लिए भविष्य की पीढ़ी को प्राथमिक स्तर से ही पर्यावरण-जागरूक बनाया जा रहा है।
इस स्कूल में पढ़े बच्चों पर क्या असर पड़ा है?
पूर्व विद्यार्थी गंगा वसावा के अनुसार, कक्षा 1 से 8 तक यहाँ पढ़ने के दौरान हरे-भरे माहौल और उत्कृष्ट शिक्षकों ने उनके व्यक्तित्व पर गहरी छाप छोड़ी। स्कूल से पास आउट हो चुके कई छात्र आज भी कमलेश कोसामिया के पर्यावरण-प्रेम को याद करते हैं।
यह स्कूल जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में क्यों महत्वपूर्ण है?
जलवायु परिवर्तन और बढ़ते प्रदूषण के बीच यह स्कूल एक व्यावहारिक उदाहरण है कि शैक्षणिक संस्थान पर्यावरण संरक्षण में सक्रिय भूमिका निभा सकते हैं। बच्चों को प्राथमिक स्तर से पर्यावरण की सुरक्षा सिखाना उन्हें भविष्य के ज़िम्मेदार नागरिक के रूप में तैयार करता है।
राष्ट्र प्रेस
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