गुजरात राज्यपाल आचार्य देवव्रत का किसानों से आह्वान: रासायनिक खेती छोड़ें, प्राकृतिक खेती अपनाएं
सारांश
मुख्य बातें
गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने 11 अगस्त 2026 को आनंद जिले के किसानों से रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर निर्भरता छोड़कर प्राकृतिक खेती की ओर लौटने का आग्रह किया। उन्होंने चेतावनी दी कि रसायनों के अंधाधुंध उपयोग से आने वाली पीढ़ियों के लिए न तो उपजाऊ मिट्टी बचेगी और न ही स्वच्छ पेयजल।
बोरियावी गांव में किसान के खेत का दौरा
राज्यपाल देवव्रत की आनंद जिले की दो दिवसीय यात्रा के दौरान उन्होंने आनंद तालुका के बोरियावी गांव में प्रगतिशील किसान नरेश सोलंकी के प्राकृतिक खेत का भ्रमण किया। वहाँ उन्होंने विभिन्न फसलों का निरीक्षण किया, एक गाय का दूध निकाला और स्वयं खेत की जुताई की। इसके बाद उन्होंने स्थानीय किसानों के साथ जीवामृत और घन जीवामृत की तैयारी एवं उनके लाभों पर विस्तार से चर्चा की।
रासायनिक खेती के दुष्परिणाम
राज्यपाल ने कहा कि जंगलों में पेड़-पौधे बिना किसी रासायनिक उर्वरक के फलते-फूलते हैं, जबकि खेतों में रसायनों के अत्यधिक उपयोग ने मिट्टी में मौजूद केंचुओं और सूक्ष्मजीवों को नष्ट कर दिया है। उन्होंने कहा, 'रासायनिक खेती ने मिट्टी को सख्त कर दिया है, जबकि प्राकृतिक खेती मिट्टी को उपजाऊ बनाती है और वर्षा जल को सीधे भूमि में समाने देती है।' परिणामस्वरूप किसानों को अब बाहरी स्रोतों से नाइट्रोजन, पोटाश और फास्फोरस जैसे पोषक तत्व जोड़ने पड़ रहे हैं, जिससे लागत और पर्यावरणीय बोझ दोनों बढ़ रहे हैं।
प्राकृतिक खेती के लाभ और गाय आधारित मॉडल
देवव्रत ने स्पष्ट किया कि प्राकृतिक खेती अपनाने से उत्पादन घटता नहीं, बल्कि मिट्टी में उच्च कार्बनिक कार्बन की मात्रा से फसल की पैदावार में सुधार होता है। उन्होंने इसे एक गाय आधारित प्रणाली के रूप में वर्णित किया, जिसमें पशु दूध और खाद — दोनों प्रदान करते हैं। उन्होंने बताया कि गुजरात में अनेक किसान पहले से ही प्राकृतिक खेती के पाँच स्तरीय मॉडल का उपयोग कर रहे हैं और अपेक्षाकृत कम श्रम एवं इनपुट लागत के साथ सालाना लाखों रुपये कमा रहे हैं।
राज्यपाल का निजी अनुभव
देवव्रत ने अपना स्वयं का अनुभव साझा करते हुए बताया कि उन्होंने रासायनिक उर्वरकों को त्यागकर प्राकृतिक खेती अपनाई, जिसके बाद उनकी भूमि ने अपनी खोई हुई उर्वरता वापस पा ली। उन्होंने किसानों से कहा, 'मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने के लिए प्रकृति और भगवान ने स्वयं सबसे अच्छी प्रणाली बनाई है।' यह ऐसे समय में आया है जब केंद्र सरकार भी राष्ट्रीय स्तर पर प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहित करने की नीतियाँ बना रही है।
आगे की राह
राज्यपाल ने किसानों को संदेश दिया कि आने वाली पीढ़ी को बंजर भूमि सौंपने के बजाय उपजाऊ और स्वस्थ भूमि सौंपना ही वास्तविक जिम्मेदारी है। गौरतलब है कि यह यात्रा प्राकृतिक खेती के व्यापक प्रचार-प्रसार की दिशा में एक कड़ी है, और आने वाले समय में इस मॉडल को अधिक किसानों तक पहुँचाने के प्रयास जारी रहने की संभावना है।