हलाल सर्टिफिकेशन विवाद: मौलाना इब्राहिम हुसैन और सिराज खान ने गोकुल डेयरी बहिष्कार अभियान को बताया गलत
सारांश
मुख्य बातें
गोकुल डेयरी प्रोडक्ट्स को मिले हलाल सर्टिफिकेशन के विरोध में कुछ हिंदू संगठनों द्वारा चलाए जा रहे बहिष्कार अभियान के खिलाफ मुस्लिम धर्मगुरुओं और संगठनों ने 30 मई को कड़ी आपत्ति दर्ज कराई। धर्मगुरुओं का तर्क है कि हलाल प्रमाणन केवल धार्मिक मामला नहीं, बल्कि भारत के अंतरराष्ट्रीय व्यापार और निर्यात से जुड़ा एक आर्थिक विषय है।
मौलाना इब्राहिम हुसैन का रुख
मौलाना इब्राहिम हुसैन ने कहा कि हलाल सर्टिफिकेशन का विरोध करना उचित नहीं है। उनके अनुसार, हलाल प्रमाणन की एक सुनिश्चित प्रक्रिया होती है और इसके ज़रिए भारतीय उत्पादों को खाड़ी देशों सहित कई मुस्लिम-बहुल देशों में स्वीकार्यता मिलती है, जिससे देश के निर्यात और अर्थव्यवस्था दोनों को बल मिलता है।
उन्होंने आगाह किया कि यदि इस तरह के प्रमाणपत्रों का विरोध जारी रहा, तो इसका नकारात्मक प्रभाव व्यापार और आर्थिक गतिविधियों पर पड़ सकता है। साथ ही, उनके अनुसार, ऐसे विरोध से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को लेकर भी सवाल उठ सकते हैं।
जमीयत उलेमा-ए-मुंबई की आलोचना
जमीयत उलेमा-ए-मुंबई के अध्यक्ष सिराज खान ने भी गोकुल डेयरी के बहिष्कार की माँग करने वाले संगठनों की आलोचना की। उन्होंने कहा कि यदि हलाल सर्टिफिकेशन पर आपत्ति है, तो यह भी पूछा जाना चाहिए कि संबंधित कंपनी ने यह प्रमाणपत्र क्यों प्राप्त किया — और इसका उत्तर व्यापारिक ज़रूरत में छिपा है।
सिराज खान के अनुसार, मलेशिया, इंडोनेशिया और खाड़ी क्षेत्र के अनेक देशों में हलाल-प्रमाणित उत्पादों की माँग अधिक है और वहाँ के उपभोक्ता इसी आधार पर उत्पादों का चयन करते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि कोई भारतीय कंपनी वैश्विक बाज़ार तक पहुँचने के लिए हलाल प्रमाणन लेती है, तो इसमें आपत्ति का कोई आधार नहीं है।
प्रमाणन प्रक्रिया और व्यापारिक महत्व
सिराज खान ने यह भी रेखांकित किया कि किसी भी कंपनी को हलाल सर्टिफिकेशन आसानी से नहीं मिलता — इसके लिए विस्तृत जाँच-पड़ताल और निर्धारित मानकों को पूरा करना अनिवार्य होता है। उनके अनुसार, कई देशों में खाद्य और डेयरी उत्पादों के निर्यात के लिए हलाल प्रमाणन एक आवश्यक शर्त है, और यह खाड़ी देशों के साथ भारत के व्यापारिक संबंधों को भी मज़बूत करता है।
आर्थिक प्राथमिकताओं पर जोर
सिराज खान ने कहा कि देश में महंगाई, पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतें और आम जनता की समस्याएँ जैसी गंभीर आर्थिक चुनौतियाँ मौजूद हैं, जिन पर अधिक ध्यान देने की ज़रूरत है। उनके अनुसार, संगठनों को धार्मिक विवादों के बजाय देश के विकास और आर्थिक प्रगति पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
गौरतलब है कि हलाल सर्टिफिकेशन को लेकर यह विवाद ऐसे समय में उभरा है जब भारत अपने निर्यात को बढ़ाने के लिए खाड़ी और दक्षिण-पूर्व एशियाई बाज़ारों पर ज़ोर दे रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि हिंदू संगठन और कंपनियाँ इस बहस पर क्या रुख अपनाती हैं।