3 नवंबर 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

हरियाणा कैबिनेट ने लैंड पूलिंग पॉलिसी-2026 को दी मंजूरी, जमीन मालिकों को मिलेगा 50% हिस्सा

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
हरियाणा कैबिनेट ने लैंड पूलिंग पॉलिसी-2026 को दी मंजूरी, जमीन मालिकों को मिलेगा 50% हिस्सा

सारांश

हरियाणा सरकार ने 2022 की पुरानी नीति की जगह लैंड पूलिंग पॉलिसी-2026 लागू की है। जमीन मालिकों को अब कुल बिक्री योग्य क्षेत्र का 50% हिस्सा मिलेगा, ₹1 लाख/एकड़ की वार्षिक सहायता और 4 साल की प्रोजेक्ट समय-सीमा तय की गई है — यह नीति जमीन अधिग्रहण की पुरानी कड़वाहट को कम करने का प्रयास है।

मुख्य बातें

मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी की अध्यक्षता में 3 नवंबर 2026 को हरियाणा कैबिनेट ने लैंड पूलिंग पॉलिसी-2026 को मंजूरी दी।
जमीन मालिकों को परियोजना के कुल बिक्री योग्य क्षेत्र का 50 प्रतिशत हिस्सा मिलेगा; शेष डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन के पास रहेगा।
सेल डीड पंजीकरण से 4 साल तक ₹1 लाख प्रति एकड़ वार्षिक अंतरिम सहायता; 15 दिन में भुगतान न होने पर 9% प्रति वर्ष ब्याज देय।
प्रोजेक्ट पूरा करने की समय-सीमा 5 साल से घटाकर 4 साल ; निर्धारित अवधि में इन्फ्रास्ट्रक्चर न बनाने पर भूमि मालिकों को वापस।
न्यूनतम प्लॉट आकार: आवासीय 100 वर्ग मीटर , औद्योगिक 250 वर्ग मीटर , संस्थागत 500 वर्ग मीटर ।
बायबैक समय-सीमा 1 साल से बढ़ाकर 3 साल ; TDR गणना के लिए नया फॉर्मूला — वेटेड एवरेज कलेक्टर रेट लागू।

हरियाणा सरकार ने 3 नवंबर 2026 को लैंड पूलिंग पॉलिसी-2026 को मंजूरी देकर राज्य में भूमि विकास की रूपरेखा बदल दी है। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी की अध्यक्षता में हुई हरियाणा मंत्रिपरिषद की बैठक में यह निर्णय लिया गया। नई नीति 2022 की पुरानी लैंड पूलिंग पॉलिसी का स्थान लेगी और इसका मुख्य उद्देश्य विकास परियोजनाओं में जमीन मालिकों की भागीदारी को अधिक सरल, पारदर्शी और लाभकारी बनाना है।

नई नीति में क्या है खास

नई नीति के तहत जमीन मालिकों को स्वीकृत लेआउट प्लान के अंतर्गत परियोजना के कुल बिक्री योग्य क्षेत्र का 50 प्रतिशत हिस्सा दिया जाएगा, जबकि शेष हिस्सा डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन के पास रहेगा। एक आधिकारिक बयान के अनुसार, जमीन मालिकों के हिस्से को बाजार मूल्य से जोड़ने वाले पुराने प्रावधानों को इस नीति से हटा दिया गया है।

जमीन मालिकों के 50 प्रतिशत हिस्से में तय पात्रता के अनुसार कमर्शियल साइटें आवंटित की जाएंगी। शेष क्षेत्र को परियोजना के उद्देश्य के आधार पर आवासीय, औद्योगिक या संस्थागत प्लॉट के रूप में दिया जाएगा।

अंतरिम वित्तीय सहायता और समय-सीमा

नई नीति के अनुसार, सेल डीड (बिक्री विलेख) के पंजीकरण की तारीख से चार साल तक जमीन मालिकों को उनकी दी गई जमीन के अनुपात में ₹1 लाख प्रति एकड़ की वार्षिक अंतरिम वित्तीय सहायता दी जाएगी। यदि सेल डीड के 15 दिनों के भीतर यह राशि हस्तांतरित नहीं होती है, तो जमीन मालिक देरी की अवधि पर 9 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से साधारण ब्याज पाने के हकदार होंगे।

परियोजना पूरी करने की समय-सीमा को पाँच साल से घटाकर चार साल कर दिया गया है। गौरतलब है कि यदि डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन इस अवधि में बुनियादी ढाँचे की सुविधाएँ पूरी नहीं करता, तो भूमि वापस जमीन मालिकों के पास लौट जाएगी — यह प्रावधान जमीन मालिकों के हितों की रक्षा के लिए एक महत्त्वपूर्ण सुरक्षा-कवच माना जा रहा है।

प्लॉट आकार और मुआवज़े की शर्तें

नई नीति में जमीन मालिकों को दिए जाने वाले विकसित प्लॉट का न्यूनतम आकार इस प्रकार निर्धारित किया गया है — आवासीय प्लॉट के लिए 100 वर्ग मीटर, औद्योगिक प्लॉट के लिए 250 वर्ग मीटर और संस्थागत प्लॉट के लिए 500 वर्ग मीटर। वास्तव में आवंटित क्षेत्र, दी गई जमीन के अनुपात में तय होगा।

जहाँ जमीन का योगदान 2,000 वर्ग मीटर से अधिक है, वहाँ कियोस्क या बूथ के रूप में कमर्शियल प्लॉट आवंटित किए जाएंगे। 999 वर्ग मीटर से कम जमीन देने वाले मालिकों को 'भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013' के तहत मौद्रिक मुआवजा, या प्लॉट की रिज़र्व कीमत — जो भी अधिक हो — प्रदान की जाएगी।

'भूमि अधिकार प्रमाण-पत्र' धारक अपने प्रमाण-पत्रों को एकत्र कर बड़े विकसित प्लॉट के लिए संयुक्त रूप से आवेदन कर सकेंगे। विकास संस्था द्वारा प्लॉट को वापस खरीदने (बायबैक) की समय-सीमा को एक साल से बढ़ाकर तीन साल कर दिया गया है।

लैंड एग्रीगेटर का पारिश्रमिक और टीडीआर संशोधन

नई नीति में लैंड एग्रीगेटर का पारिश्रमिक भी निर्धारित किया गया है, जो संबंधित राजस्व क्षेत्र में कृषि भूमि के लिए लागू कलेक्टर रेट का 0.5 प्रतिशत होगा। यह राशि विकास एजेंसी द्वारा परियोजना की सेल डीड प्रक्रिया पूरी होने के बाद दी जाएगी।

कैबिनेट ने ट्रांसफरेबल डेवलपमेंट राइट्स (TDR) से जुड़ी नीति में भी संशोधन को मंजूरी दी है। संशोधित नीति के तहत TDR प्रमाण-पत्र जारी करने के लिए काल्पनिक भूमि की गणना का फॉर्मूला बदला जाएगा — अब यह गणना आवेदन जमा करने की तारीख पर लागू 'वेटेड एवरेज कलेक्टर रेट' के आधार पर होगी। यह बदलाव पुराने प्रावधान की जगह लेगा, जिसमें गणना आवेदन वाले कैलेंडर वर्ष की 1 जनवरी को लागू दर पर आधारित होती थी।

यह नीति ऐसे समय में आई है जब हरियाणा में तेज़ शहरीकरण और औद्योगिक विकास के लिए भूमि अधिग्रहण एक संवेदनशील मुद्दा रहा है। नई नीति में जमीन मालिकों को अधिक अधिकार और वित्तीय सुरक्षा देने की कोशिश की गई है, जो राज्य में विकास परियोजनाओं को जमीनी विरोध से बचाने में सहायक हो सकती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली परीक्षा क्रियान्वयन की होगी — राज्य में पिछले कई विकास प्रोजेक्ट तय समय-सीमा से आगे खिसकते रहे हैं। 50 प्रतिशत हिस्सेदारी का प्रावधान आकर्षक है, परंतु यह हिस्सा किस बाज़ार मूल्य पर और कब मिलेगा, इसका जवाब नीति में स्पष्ट नहीं है। बाजार मूल्य से संबंध तोड़ने वाला प्रावधान दोधारी तलवार साबित हो सकता है — जमीन दाम बढ़ने की स्थिति में जमीन मालिकों को नुकसान उठाना पड़ सकता है। चार साल में भूमि वापसी का प्रावधान तो सशक्त है, किंतु विवाद की स्थिति में न्यायिक प्रक्रिया की लंबाई इस 'सुरक्षा-कवच' को कमज़ोर कर सकती है।
RashtraPress
3 नवंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

हरियाणा लैंड पूलिंग पॉलिसी-2026 क्या है?
यह 3 नवंबर 2026 को हरियाणा कैबिनेट द्वारा मंजूर की गई नई भूमि नीति है, जो 2022 की पुरानी लैंड पूलिंग पॉलिसी का स्थान लेती है। इसके तहत विकास परियोजनाओं में जमीन देने वाले मालिकों को कुल बिक्री योग्य क्षेत्र का 50 प्रतिशत हिस्सा दिया जाएगा।
जमीन मालिकों को इस पॉलिसी से क्या फायदा होगा?
जमीन मालिकों को परियोजना क्षेत्र का 50% हिस्सा, सेल डीड पंजीकरण से 4 साल तक ₹1 लाख प्रति एकड़ वार्षिक अंतरिम सहायता और बायबैक के लिए 3 साल की अवधि मिलेगी। 15 दिन में भुगतान न होने पर 9% प्रति वर्ष ब्याज भी देय होगा।
999 वर्ग मीटर से कम जमीन देने वाले मालिकों का क्या होगा?
ऐसे जमीन मालिकों को 'भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013' के तहत मौद्रिक मुआवजा, या प्लॉट की रिज़र्व कीमत — जो भी अधिक हो — दी जाएगी। उन्हें विकसित प्लॉट के बजाय नकद मुआवजे का विकल्प मिलेगा।
यदि डेवलपर समय पर प्रोजेक्ट पूरा नहीं करे तो क्या होगा?
नई नीति के अनुसार, अंतिम मंजूरी मिलने की तारीख से 4 साल के भीतर इन्फ्रास्ट्रक्चर पूरा न होने पर जमीन वापस जमीन मालिकों के पास लौट जाएगी। यह प्रावधान डेवलपर्स पर समय-सीमा पालने का स्पष्ट दबाव डालता है।
TDR नीति में क्या बदलाव किया गया है?
ट्रांसफरेबल डेवलपमेंट राइट्स (TDR) की गणना का फॉर्मूला बदला गया है। अब यह गणना आवेदन जमा करने की तारीख पर लागू 'वेटेड एवरेज कलेक्टर रेट' के आधार पर होगी, न कि पूर्व प्रचलित उस वर्ष की 1 जनवरी की दर पर — इससे TDR मूल्यांकन अधिक सटीक और समयबद्ध होगा।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 3 सप्ताह पहले
  2. 1 महीना पहले
  3. 3 महीने पहले
  4. 4 महीने पहले
  5. 5 महीने पहले
  6. 6 महीने पहले
  7. 7 महीने पहले
  8. 1 साल पहले