हरियाणा में लिंगानुपात संकट: नायब सैनी सरकार ने 4 सीनियर मेडिकल अधिकारी किए सस्पेंड
सारांश
मुख्य बातें
हरियाणा सरकार ने 19 मई 2025 को राज्य में गिरते लिंगानुपात पर सख्त प्रशासनिक कार्रवाई करते हुए चार सीनियर मेडिकल अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया। इन अधिकारियों पर अवैध लिंग निर्धारण और कन्या भ्रूण हत्या रोकने से जुड़े कार्यक्रमों की प्रभावी निगरानी में विफल रहने का आरोप है।
किन अधिकारियों पर हुई कार्रवाई
स्वास्थ्य और परिवार कल्याण की अतिरिक्त मुख्य सचिव डॉ. सुमिता मिश्रा द्वारा जारी आदेश के अनुसार, निलंबित अधिकारियों में सोनीपत के पुरखास स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) की एसएमओ डॉ. टीना आनंद, यमुनानगर के रादौर स्थित सीएचसी के एसएमओ डॉ. विजय परमार, रोहतक के चिड़ी स्थित सीएचसी के एसएमओ डॉ. सतपाल और नारनौल के सहलांग स्थित सीएचसी की मेडिकल अधिकारी डॉ. प्रभा शामिल हैं।
निलंबन अवधि के दौरान ये चारों अधिकारी क्रमशः रोहतक, अंबाला, झज्जर और रेवाड़ी के सिविल सर्जन कार्यालयों से संबद्ध रहेंगे। सरकार ने हरियाणा सिविल सेवा नियम, 2016 के नियम 7 के तहत इनके विरुद्ध औपचारिक अनुशासनात्मक कार्यवाही भी आरंभ कर दी है।
लिंगानुपात की चिंताजनक स्थिति
हरियाणा का जन्म लिंगानुपात (SRB) इस वर्ष के पहले चार महीनों में गिरकर 895 लड़कियाँ प्रति 1,000 लड़के रह गया है, जो 2024 के 925 के आँकड़े से काफी कम है। यह गिरावट कई जिलों में विशेष रूप से तीव्र रही है।
सबसे चिंताजनक स्थिति चरखी दादरी जिले की है, जहाँ लिंगानुपात मात्र 769 दर्ज किया गया। इसके बाद अंबाला में 843, महेंद्रगढ़ में 847, गुरुग्राम में 863 और जींद में 872 का आँकड़ा रहा।
बेहतर प्रदर्शन करने वाले जिले
इसके विपरीत, करनाल जिले ने राज्य में सर्वाधिक 968 का लिंगानुपात दर्ज करके सकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत किया। फरीदाबाद और कुरुक्षेत्र दोनों जिलों में 932 का आँकड़ा रहा, जो राज्य के औसत से बेहतर है।
सरकार का रुख और आगे की कार्रवाई
यह कार्रवाई मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी की सरकार के उस सख्त रुख का हिस्सा है, जिसके तहत अवैध लिंग निर्धारण और कन्या भ्रूण हत्या पर अंकुश लगाने के लिए चलाए जा रहे कार्यक्रमों की जमीनी स्तर पर जवाबदेही सुनिश्चित की जा रही है। गौरतलब है कि हरियाणा दशकों से देश के सबसे कम लिंगानुपात वाले राज्यों में रहा है और 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' अभियान की शुरुआत भी इसी राज्य से हुई थी। आलोचकों का कहना है कि केवल निलंबन से जमीनी बदलाव नहीं आएगा — इसके लिए सामाजिक जागरूकता और कानून के सख्त क्रियान्वयन की समान रूप से ज़रूरत है।