बड़ा फैसला: हिमाचल भर्ती-सेवा शर्त अधिनियम 2024 असंवैधानिक, हजारों कर्मचारियों को 3 माह में मिलेंगे बकाया लाभ
सारांश
Key Takeaways
- हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने 25 अप्रैल 2025 को भर्ती एवं सेवा शर्त अधिनियम, 2024 को पूरी तरह असंवैधानिक घोषित कर रद्द किया।
- न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रोमेश वर्मा की खंडपीठ ने 445 याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई की।
- अधिनियम की धारा 3, 5 और 9 को संविधान विरोधी पाया गया, जिससे पूरा कानून निरस्त हो गया।
- अधिनियम के तहत जारी सभी आदेश, निर्देश और वित्तीय वसूली प्रस्ताव स्वतः रद्द माने जाएंगे।
- सरकार को तीन महीने के भीतर सभी प्रभावित कर्मचारियों को बकाया वित्तीय लाभ सुनिश्चित करने का आदेश दिया गया।
- यह मामला 2003 के बाद नियमित हुए उन कर्मचारियों से जुड़ा है जिन्हें पहले सुप्रीम कोर्ट से राहत मिली थी, लेकिन 2024 के अधिनियम से उनके लाभ वापस लेने की कोशिश हुई।
शिमला, 25 अप्रैल 2025 — हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक निर्णय में हिमाचल प्रदेश भर्ती एवं सरकारी कर्मचारियों की सेवा शर्त अधिनियम, 2024 को पूरी तरह असंवैधानिक और अमान्य घोषित करते हुए रद्द कर दिया है। इस फैसले से प्रदेश के हजारों अनुबंध-आधारित कर्मचारियों को दीर्घकालीन कानूनी लड़ाई के बाद बड़ी राहत मिली है और उनके बकाया वित्तीय लाभ तीन महीने के भीतर दिलाने का मार्ग प्रशस्त हो गया है।
खंडपीठ का ऐतिहासिक आदेश और 445 याचिकाएं
न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रोमेश वर्मा की खंडपीठ ने एक साथ 445 याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह निर्णय सुनाया। अदालत ने स्पष्ट किया कि अधिनियम की धारा 3, 5 और 9 भारतीय संविधान के प्रावधानों के सीधे विरुद्ध हैं।
कोर्ट ने यह भी कहा कि जब इन तीन प्रमुख धाराओं को हटाया जाता है तो शेष अधिनियम में कोई सार्थक या क्रियाशील प्रावधान नहीं बचता, इसलिए संपूर्ण कानून को निरस्त करना अनिवार्य हो जाता है। यह निर्णय न केवल तकनीकी बल्कि संवैधानिक नैतिकता की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
अधिनियम के तहत सभी आदेश और वसूली प्रस्ताव रद्द
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि इस अधिनियम के आधार पर राज्य सरकार या उसके अधिकारियों द्वारा की गई समस्त कार्रवाइयां असंवैधानिक और अमान्य मानी जाएंगी। इसके तहत जारी सभी आदेश, निर्देश और कर्मचारियों से लाभ वापसी या वसूली से संबंधित सभी प्रस्ताव भी स्वतः रद्द हो गए हैं।
अदालत ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया है कि सक्षम न्यायालयों के आदेशों के अनुरूप कर्मचारियों को तीन महीने के भीतर सभी वित्तीय लाभ सुनिश्चित किए जाएं।
मामले की पृष्ठभूमि — अनुबंध से नियमितीकरण तक का संघर्ष
यह विवाद उन हजारों कर्मचारियों से जुड़ा है जिन्हें प्रारंभ में अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट) आधार पर नियुक्त किया गया था। वर्ष 2003 के बाद इन्हें चरणबद्ध तरीके से नियमित किया गया, किंतु उनकी अनुबंध अवधि को नियमित सेवा में नहीं जोड़ा गया और वित्तीय लाभों से वंचित रखा गया।
कर्मचारियों ने इस अन्याय को अदालत में चुनौती दी और मामला सुप्रीम कोर्ट तक ले जाकर जीत लिया। इसके बावजूद राज्य सरकार ने वर्ष 2024 में यह विवादास्पद अधिनियम लागू कर पहले दिए गए वित्तीय लाभों को वापस लेने का प्रयास किया।
याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि 17 जुलाई 2025 को इस अधिनियम के तहत लाभ वापसी के आदेश जारी किए गए, जो पूरी तरह असंवैधानिक थे।
विधायिका बनाम न्यायपालिका — संवैधानिक सीमाओं का प्रश्न
याचिकाकर्ताओं का केंद्रीय तर्क यह था कि सरकार ने इस अधिनियम के माध्यम से न्यायपालिका के फैसलों को पलटने का प्रयास किया, जो विधायिका के अधिकार क्षेत्र से बाहर है। उनका स्पष्ट मत था कि किसी न्यायिक निर्णय को केवल न्यायपालिका ही बदल सकती है, विधायिका नहीं।
यह प्रकरण भारतीय संवैधानिक इतिहास में उन मामलों की श्रेणी में आता है जहां राज्य सरकारों ने विधायी शक्ति का उपयोग कर न्यायिक आदेशों को निष्प्रभावी करने की कोशिश की। सुप्रीम कोर्ट पहले भी ऐसे कई मामलों में स्पष्ट कर चुका है कि विधायिका न्यायिक निर्णयों का आधार नहीं बदल सकती, केवल कानून की नींव बदल सकती है।
कर्मचारियों पर प्रभाव और आगे की राह
हाई कोर्ट के इस निर्णय से प्रदेश के हजारों कर्मचारियों को न केवल तत्काल राहत मिली है, बल्कि उनके वर्षों से लंबित बकाया वित्तीय लाभों की प्रक्रिया भी अब तीव्र गति से आगे बढ़ेगी। यह फैसला प्रशासनिक और कानूनी दोनों दृष्टियों से मील का पत्थर साबित हो सकता है।
अब सभी की निगाहें हिमाचल प्रदेश सरकार पर होंगी — क्या वह इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी या तीन महीने की समयसीमा के भीतर कर्मचारियों को उनके अधिकार सुनिश्चित करेगी। यह निर्णय अन्य राज्यों में भी समान परिस्थितियों में फंसे कर्मचारियों के लिए एक मजबूत नजीर बन सकता है।