असम CM हिमंत बिस्वा सरमा का स्पष्टीकरण: मंत्री दैमारी की उल्फा तारीफ शांति समझौते वाले गुट के लिए थी
सारांश
मुख्य बातें
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026 को स्पष्ट किया कि राज्य के मंत्री बिस्वजीत दैमारी द्वारा हाल ही में यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (उल्फा) की की गई तारीफ उस गुट के संदर्भ में थी जो बातचीत का समर्थक है और जिसने केंद्र सरकार व असम सरकार के साथ शांति समझौता संपन्न किया है — न कि परेश बरुआ के नेतृत्व वाले उल्फा-इंडिपेंडेंट (उल्फा-आई) से। गुवाहाटी में पत्रकारों से बातचीत के दौरान सरमा ने इस अंतर को रेखांकित करते हुए कहा कि शांति समझौता करने वाले गुट को प्रतिबंधित संगठन नहीं माना जाता, जबकि उल्फा-आई अभी भी प्रतिबंधित है।
विवाद की पृष्ठभूमि
मंत्री बिस्वजीत दैमारी ने कथित तौर पर तिनसुकिया जिले में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान पिछले पाँच दशकों में असम को बाहरी ताकतों से बचाने के लिए उल्फा की प्रशंसा की थी। उन्होंने संगठन के नेतृत्व में मोरन और मटक समुदायों की भूमिका का भी उल्लेख किया। यह बयान असम के उस दशकों पुराने उग्रवादी इतिहास को देखते हुए तत्काल विवाद का विषय बन गया, जो भारी हिंसा, सुरक्षा अभियानों और जान-माल के भारी नुकसान से जुड़ा रहा है।
गौरतलब है कि उल्फा की विरासत को लेकर असम में राजनीतिक संवेदनशीलता बनी रहती है, और किसी भी सरकारी प्रतिनिधि की इस संगठन के प्रति सहानुभूतिपूर्ण टिप्पणी स्वाभाविक रूप से जाँच के दायरे में आती है।
मुख्यमंत्री का स्पष्टीकरण
सरमा ने स्पष्ट किया कि दैमारी ने विशेष रूप से अनूप चेतिया और अन्य नेताओं से जुड़े उस गुट का उल्लेख किया था जो शांति प्रक्रिया में शामिल हो चुके हैं। उन्होंने कहा कि इस गुट के साथ शांति समझौता पहले ही हो चुका है, इसलिए इसे प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन की श्रेणी में नहीं रखा जाता। मुख्यमंत्री के अनुसार, दैमारी के बयानों को उल्फा-आई के समर्थन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
सरमा ने जोर देकर कहा कि शांति समझौते में शामिल गुट और परेश बरुआ के नेतृत्व वाले उल्फा-आई के बीच का अंतर महत्वपूर्ण है — क्योंकि उल्फा-आई ने किसी भी शांति प्रक्रिया में भाग नहीं लिया है और अब भी प्रतिबंधित है।
29 दिसंबर 2023 का त्रिपक्षीय समझौता
29 दिसंबर 2023 को नई दिल्ली में केंद्र सरकार, असम सरकार और उल्फा के बातचीत समर्थक गुट के प्रतिनिधियों के बीच एक त्रिपक्षीय समझौता ज्ञापन (मेमोरेंडम ऑफ सेटलमेंट) पर हस्ताक्षर किए गए थे। इस समझौते के तहत, गुट ने हिंसा का मार्ग छोड़ने, हथियार एवं गोला-बारूद सौंपने, सशस्त्र संगठन भंग करने और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेने का वचन दिया था।
यह ऐसे समय में आया था जब दशकों से चली आ रही उल्फा की सशस्त्र गतिविधियों के कारण असम में सैकड़ों लोगों की जानें गई थीं और राज्य की सामाजिक-आर्थिक प्रगति पर गहरा असर पड़ा था। परेश बरुआ के नेतृत्व वाला उल्फा-आई इस ऐतिहासिक समझौते से बाहर रहा और उसने अपना अलग रास्ता अपनाए रखा।
राजनीतिक निहितार्थ और आगे की राह
यह स्पष्टीकरण असम की राजनीति में एक नाजुक पहलू को उजागर करता है — जहाँ सरकार शांति समझौते की उपलब्धियों को रेखांकित करने और प्रतिबंधित संगठनों के प्रति कठोर रुख बनाए रखने के बीच संतुलन साध रही है। दैमारी के बयान ने राज्य के उग्रवाद के इतिहास और उसकी राजनीतिक विरासत पर एक नई बहस को जन्म दे दिया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि असम में शांति प्रक्रिया की सफलता के लिए यह ज़रूरी है कि सरकारी प्रतिनिधि सार्वजनिक मंचों पर इन दोनों गुटों के बीच का अंतर स्पष्ट रखें, ताकि शांति समझौते की विश्वसनीयता पर कोई सवाल न उठे। सरमा का यह स्पष्टीकरण उसी दिशा में एक कदम माना जा रहा है।