अमित शाह: कोविड संकट में भारत ने PPE से वैक्सीन तक 13 महीनों में विकसित की स्वदेशी क्षमता
सारांश
मुख्य बातें
केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने 27 अगस्त 2026 को अहमदाबाद के सिंधु भवन में आयोजित आरवी पटेल फार्मि नोवा अवार्ड्स 2026 समारोह में कहा कि कोविड-19 महामारी ने भारत की उस क्षमता को उजागर किया जिसमें वह संकट के दौरान अत्यंत कम समय में आवश्यक चिकित्सा आपूर्ति के लिए घरेलू विनिर्माण तंत्र खड़ा कर सकता है। यह समारोह ट्रोइका फार्मास्युटिकल्स लिमिटेड द्वारा आयोजित किया गया था।
महामारी में भारत की सामूहिक प्रतिक्रिया
शाह ने कहा कि महामारी के आरंभ में देश को अपनी स्वास्थ्य प्रणाली की क्षमता को लेकर गंभीर चिंताएँ थीं। बावजूद इसके, केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और 140 करोड़ भारतीयों की सामूहिक इच्छाशक्ति ने इस चुनौती को अवसर में बदल दिया। उन्होंने 'जनता कर्फ्यू' का उल्लेख करते हुए कहा कि नागरिकों ने प्रधानमंत्री की अपील पर भरोसा जताया और उसका पालन किया।
शाह ने कहा, "जब देश के लोग संकल्प के साथ एकजुट होकर खड़े होते हैं, तो किसी भी चुनौती से पार पाया जा सकता है।"
PPE किट से निर्यातक तक का सफर
गृह मंत्री ने बताया कि महामारी की शुरुआत में भारत में पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट (PPE) किट का उत्पादन बेहद सीमित था और N95 मास्क की उपलब्धता भी दुर्लभ थी। कम समय में देश ने बड़े पैमाने पर PPE किट और मास्क बनाने की क्षमता विकसित की और बाद में इन उत्पादों का प्रमुख उत्पादक एवं निर्यातक बनकर उभरा।
यह बदलाव इसलिए भी उल्लेखनीय है क्योंकि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएँ उस दौर में चरमरा गई थीं और कई विकसित देश भी चिकित्सा उपकरणों की कमी से जूझ रहे थे।
13 महीनों में स्वदेशी वैक्सीन निर्माण
शाह के अनुसार, भारत ने 13 महीनों के भीतर कोवैक्सिन और कोविशील्ड सहित टीके विकसित किए — जो एक अभूतपूर्व स्वास्थ्य आपातकाल के बीच देश की वैज्ञानिक और औद्योगिक क्षमता का प्रमाण है। भारत ने न केवल अपनी घरेलू ज़रूरतें पूरी कीं, बल्कि कई अन्य देशों को भी टीके आपूर्ति किए, जिससे वैश्विक महामारी-रोधी प्रयासों में योगदान मिला।
गौरतलब है कि भारत की 'वैक्सीन मैत्री' पहल के तहत दर्जनों देशों को करोड़ों खुराकें भेजी गई थीं — एक कदम जिसे अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य समुदाय ने सराहा।
फार्मा क्षेत्र में R&D की अनिवार्यता
शाह ने महामारी के अनुभव को फार्मास्युटिकल क्षेत्र में अनुसंधान एवं विकास (R&D) की आवश्यकता से जोड़ा। उन्होंने कहा, "फार्मास्युटिकल्स में काम करने वाले संगठनों को तब तक काफी योगदान देने की आवश्यकता होगी जब तक कि भारत R&D में आत्मनिर्भर बनने के लिए मजबूत सिस्टम विकसित नहीं कर लेता।" उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि आरवी पटेल फार्मि नोवा अवार्ड्स जैसे पुरस्कार शोधकर्ताओं को प्रोत्साहित करने और उनके योगदान को सार्वजनिक मान्यता दिलाने में अहम भूमिका निभाते हैं।
आगे की राह
शाह की यह टिप्पणियाँ ऐसे समय में आई हैं जब केंद्र सरकार फार्मास्युटिकल और बायोटेक क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को नीतिगत प्राथमिकता दे रही है। महामारी से मिले सबक को संस्थागत रूप देने और R&D निवेश बढ़ाने की दिशा में उद्योग और सरकार दोनों की साझा जिम्मेदारी पर उनका जोर भविष्य की स्वास्थ्य नीति की रूपरेखा तय कर सकता है।