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गगन प्रणाली को वैश्विक मान्यता: DGCA ने पहली बार व्यावसायिक जेट पर किया सफल सैटेलाइट लैंडिंग परीक्षण

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गगन प्रणाली को वैश्विक मान्यता: DGCA ने पहली बार व्यावसायिक जेट पर किया सफल सैटेलाइट लैंडिंग परीक्षण

सारांश

जून 2026 में DGCA ने पहली बार किसी व्यावसायिक जेट पर गगन-आधारित सैटेलाइट लैंडिंग अप्रोच का सफल परीक्षण किया — यह 2015 से परिचालन में चल रही ISRO-AAI की उस प्रणाली की सबसे बड़ी व्यावहारिक जीत है जो भारत को अमेरिका, यूरोप और जापान की बराबरी में लाती है।

मुख्य बातें

DGCA ने जून 2026 में पहली बार किसी व्यावसायिक जेट विमान पर गगन -आधारित सैटेलाइट लैंडिंग सिस्टम अप्रोच का सफल परीक्षण किया।
गगन को ISRO और AAI ने संयुक्त रूप से विकसित किया है और यह 2015 से पूरी तरह परिचालन में है।
भारत अब अमेरिका, यूरोप और जापान के साथ उन देशों की सूची में शामिल है जिनके पास अपना परिचालित SBAS है।
NavIC के साथ मिलकर गगन विदेशी नेविगेशन प्रणालियों पर भारत की निर्भरता कम करेगा।
विमानन के अलावा परिवहन, आपदा प्रबंधन और सर्वेक्षण क्षेत्रों में भी गगन की सेवाएँ उपलब्ध हैं।

भारत की स्वदेशी सैटेलाइट-आधारित ऑग्मेंटेशन प्रणाली गगन (GPS Aided GEO Augmented Navigation) ने जून 2026 में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की, जब नागर विमानन महानिदेशालय (DGCA) ने पहली बार किसी व्यावसायिक जेट विमान पर गगन की सहायता से सैटेलाइट-आधारित लैंडिंग सिस्टम अप्रोच का सफल परीक्षण किया। 1 जुलाई 2026 को सरकार की ओर से जारी आधिकारिक बयान में यह जानकारी दी गई। यह परीक्षण भारत के विमानन क्षेत्र में तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में एक निर्णायक कदम माना जा रहा है।

गगन प्रणाली क्या है और यह कैसे काम करती है

गगन को भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) और भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (AAI) ने संयुक्त रूप से विकसित किया है। यह प्रणाली एकीकृत ग्राउंड स्टेशनों, संचार नेटवर्क और जियोस्टेशनरी सैटेलाइट्स के माध्यम से कार्य करती है। गगन GPS सिग्नलों की निरंतर निगरानी करता है, उनमें मौजूद त्रुटियों की गणना करता है और संशोधित नेविगेशन जानकारी सीधे विमानों तक पहुँचाता है।

गौरतलब है कि GPS सिग्नल वायुमंडलीय परिस्थितियों और तकनीकी कारणों से प्रभावित हो सकते हैं। गगन इस कमी को दूर करते हुए सिग्नल की सटीकता और विश्वसनीयता दोनों बढ़ाता है, जिससे उड़ान संचालन अधिक सुरक्षित होता है।

वैश्विक मान्यता और भारत की विशिष्ट स्थिति

सरकारी बयान के अनुसार, गगन वर्ष 2015 से पूरी तरह परिचालन में है। इसके साथ भारत उन चुनिंदा देशों की सूची में शामिल हो गया है जिनके पास अपना परिचालित सैटेलाइट-आधारित ऑग्मेंटेशन सिस्टम (SBAS) है — इस सूची में अमेरिका, यूरोप और जापान पहले से शामिल हैं। अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप प्रमाणित होने के कारण गगन वैश्विक विमानन नेटवर्क में सहजता से एकीकृत हो सकती है।

NavIC के साथ मिलकर बनेगा मज़बूत नेविगेशन इकोसिस्टम

सरकार ने बताया कि NavIC (Navigation with Indian Constellation) के साथ मिलकर गगन भारत की स्वदेशी नेविगेशन तकनीकों को और सशक्त बनाएगा तथा विदेशी प्रणालियों पर निर्भरता को उल्लेखनीय रूप से कम करेगा। यह ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब वैश्विक स्तर पर सैटेलाइट नेविगेशन प्रणालियों की रणनीतिक अहमियत लगातार बढ़ रही है।

विमानन से परे: बहुक्षेत्रीय उपयोग

गगन केवल विमानन तक सीमित नहीं है। परिवहन, आपदा प्रबंधन, सर्वेक्षण और अन्य कई क्षेत्रों में भी इसके बढ़ते उपयोग को देखते हुए सरकार ने इसे भारत के आत्मनिर्भर, तकनीक-आधारित और बेहतर कनेक्टेड भविष्य का प्रमुख आधार बताया है। विशेषज्ञों के अनुसार, भारत के तेज़ी से उभरते विमानन बाज़ार को देखते हुए ऐसी सटीक और विश्वसनीय प्रणाली की आवश्यकता और भी बढ़ जाती है।

आने वाले वर्षों में गगन और NavIC की संयुक्त क्षमता भारत को वैश्विक सैटेलाइट नेविगेशन क्षेत्र में एक स्वतंत्र और प्रभावशाली खिलाड़ी के रूप में स्थापित कर सकती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

और विदेशी निर्भरता में वास्तविक कमी तभी मापी जा सकेगी जब एयरलाइनें अपने बेड़े को इन प्रणालियों के अनुकूल बनाएँ। वैश्विक सैटेलाइट नेविगेशन में स्वायत्तता रणनीतिक ज़रूरत है, पर घोषणा और क्रियान्वयन के बीच की खाई को पाटना ही असली चुनौती है।
RashtraPress
1 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गगन प्रणाली क्या है और इसे किसने बनाया?
गगन (GPS Aided GEO Augmented Navigation) भारत की स्वदेशी सैटेलाइट-आधारित ऑग्मेंटेशन प्रणाली है, जिसे ISRO और AAI ने संयुक्त रूप से विकसित किया है। यह GPS सिग्नलों की सटीकता और विश्वसनीयता बढ़ाकर विमान संचालन को अधिक सुरक्षित बनाती है और 2015 से पूरी तरह परिचालन में है।
DGCA ने गगन का सफल परीक्षण कब और कैसे किया?
जून 2026 में DGCA ने पहली बार किसी व्यावसायिक जेट विमान पर गगन की सहायता से सैटेलाइट-आधारित लैंडिंग सिस्टम अप्रोच का सफल परीक्षण किया। यह गगन के व्यावहारिक विमानन उपयोग की दिशा में अब तक का सबसे महत्वपूर्ण परीक्षण माना जा रहा है।
गगन और NavIC में क्या अंतर है और ये मिलकर कैसे काम करेंगे?
गगन एक ऑग्मेंटेशन प्रणाली है जो GPS सिग्नलों को बेहतर बनाती है, जबकि NavIC भारत का स्वतंत्र सैटेलाइट नेविगेशन नक्षत्र है। दोनों मिलकर भारत को विदेशी नेविगेशन प्रणालियों पर निर्भरता कम करने और एक पूर्ण स्वदेशी नेविगेशन इकोसिस्टम बनाने में सक्षम बनाएँगे।
गगन का उपयोग केवल विमानन तक सीमित है?
नहीं, गगन विमानन के अलावा परिवहन, आपदा प्रबंधन, सर्वेक्षण और अन्य कई क्षेत्रों में भी सैटेलाइट-आधारित नेविगेशन सेवाएँ उपलब्ध कराने में सक्षम है। सरकार ने इसे भारत के तकनीक-आधारित भविष्य का प्रमुख आधार बताया है।
गगन के साथ भारत किन देशों की श्रेणी में आ गया है?
गगन के परिचालन में आने के बाद भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया है जिनके पास अपना परिचालित SBAS है। इस सूची में अमेरिका (WAAS), यूरोप (EGNOS) और जापान (MSAS) पहले से शामिल हैं।
राष्ट्र प्रेस
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