राजा कृष्णमूर्ति: चीन की चुनौती से निपटने के लिए भारत-अमेरिका को AI, क्वांटम और सुरक्षा में बढ़ाना होगा सहयोग
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय अमेरिकी कांग्रेसी राजा कृष्णमूर्ति ने 28 जुलाई 2026 को वाशिंगटन में दिए एक विशेष साक्षात्कार में कहा कि चीन की बढ़ती रणनीतिक चुनौती का सामना करने के लिए भारत और अमेरिका को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), क्वांटम कंप्यूटिंग, स्वच्छ ऊर्जा और रक्षा क्षेत्र में अपना सहयोग कहीं अधिक गहरा करना होगा। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भारत अभी इस दिशा में पर्याप्त प्रयास नहीं कर रहा और उसकी क्षमता इससे कहीं अधिक है।
चीन की चुनौती: दोनों लोकतंत्रों की निर्णायक परीक्षा
कृष्णमूर्ति ने चीन के साथ रणनीतिक प्रतिस्पर्धा को दोनों देशों के लिए एक ऐतिहासिक कसौटी बताया। उन्होंने कहा, "चीन से जुड़ी चुनौती हमारे समय की सबसे बड़ी और सबसे महत्वपूर्ण चुनौती है। सवाल यह है कि क्या हम इस अवसर पर खरे उतरेंगे और एक देश के रूप में अपने सर्वश्रेष्ठ स्वरूप को सामने लाएंगे? फिलहाल हम ऐसा नहीं कर रहे हैं।" यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब अमेरिका और भारत दोनों अपनी-अपनी तकनीकी और रक्षा नीतियों को नए सिरे से परिभाषित कर रहे हैं।
प्रौद्योगिकी सहयोग के प्रमुख क्षेत्र
कृष्णमूर्ति ने फ्यूजन ऊर्जा, सौर ऊर्जा, क्वांटम प्रौद्योगिकी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) को भारत-अमेरिका सहयोग के केंद्रीय स्तंभ बताया। उन्होंने कहा, "मेरा मानना है कि प्रौद्योगिकी ही भविष्य है। हमें भविष्य की तकनीकों पर साथ मिलकर काम करना चाहिए, चाहे वह फ्यूजन हो, सौर ऊर्जा हो, क्वांटम प्रौद्योगिकी हो, कृत्रिम बुद्धिमत्ता हो या फिर सुरक्षा से जुड़े मुद्दे हों।" गौरतलब है कि भारत और अमेरिका पहले से iCET (इनिशिएटिव ऑन क्रिटिकल एंड इमर्जिंग टेक्नोलॉजी) के तहत तकनीकी सहयोग कर रहे हैं, लेकिन कृष्णमूर्ति के अनुसार यह पर्याप्त नहीं है।
लोकतंत्र की मजबूती और आंतरिक एकता की जरूरत
कांग्रेसी ने यह भी रेखांकित किया कि बाहरी प्रतिस्पर्धा में सफलता के लिए दोनों देशों को अपने भीतर के विभाजनों को पाटना होगा। उन्होंने कहा कि किसी भी व्यक्ति के साथ, कहीं भी, किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए। उनका मानना है कि एक मजबूत और समावेशी लोकतंत्र ही चीन के मुकाबले सबसे बड़ी रणनीतिक ताकत है।
चीन का प्रभाव अभियान और चुनावी हस्तक्षेप
अमेरिकी चुनावों में चीन के कथित हस्तक्षेप के बारे में पूछे जाने पर कृष्णमूर्ति ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों के अनुसार बीजिंग ने वोटों की गिनती या मतों के संकलन में सीधा हस्तक्षेप नहीं किया। उन्होंने कहा, "उन्होंने इस पर विचार किया था, लेकिन ऐसा किया नहीं। हालांकि, इसके बावजूद यह हमेशा चिंता का विषय बना रहता है।" उन्होंने स्पष्ट किया कि चीन के प्रभाव अभियान अक्सर सूक्ष्म तरीके से — सोशल मीडिया और जनमत को प्रभावित करने वाले व्यक्तित्वों के माध्यम से — स्थानीय स्तर पर चलाए जाते हैं।
H-1B वीजा और भारतीय पेशेवरों का मुद्दा
कृष्णमूर्ति ने अमेरिका की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को उसकी आव्रजन नीति से भी जोड़ा। उन्होंने H-1B वीजा धारकों — जिनमें बड़ी संख्या में भारतीय पेशेवर शामिल हैं — के लिए ग्रीन कार्ड प्रक्रिया में अधिक निश्चितता और तेजी लाने की मांग की। उन्होंने कहा, "करीब दस लाख लोग वर्षों से धैर्यपूर्वक ग्रीन कार्ड की प्रतीक्षा कर रहे हैं। हमें इस प्रक्रिया को तेज करने के लिए हरसंभव प्रयास करना चाहिए, विशेष रूप से उन लोगों के लिए जो दशकों से अमेरिका में रह रहे हैं।" उन्होंने यह भी तर्क दिया कि दीर्घकालिक वीजा धारक नए व्यवसाय स्थापित कर, रोजगार पैदा कर और नई प्रौद्योगिकी विकसित कर अमेरिकी समृद्धि में योगदान दे सकते हैं — बशर्ते प्रक्रियागत अनिश्चितता दूर की जाए। उन्होंने जोड़ा कि ऐसे किसी भी सुधार को द्विदलीय सहमति से लागू किया जाना चाहिए।
राजा कृष्णमूर्ति डेमोक्रेटिक पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं और 2017 से इलिनॉय के 8वें कांग्रेसनल जिले का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। नई दिल्ली में जन्मे कृष्णमूर्ति अमेरिकी कांग्रेस में चीन नीति और प्रौद्योगिकी प्रतिस्पर्धा पर सबसे मुखर आवाजों में गिने जाते हैं। उनके इस बयान को भारत-अमेरिका संबंधों की दिशा तय करने वाली बहस के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।