ईरान के युद्ध के प्रभाव से डीजल और जेट फ्यूल की कीमतें कच्चे तेल से अधिक बढ़ने की संभावना
सारांश
Key Takeaways
- ईरान युद्ध ने तेल बाजार में उथल-पुथल मचाई है।
- डीजल और जेट फ्यूल की कीमतें कच्चे तेल से अधिक तेजी से बढ़ सकती हैं।
- फारस की खाड़ी से 60%25 कच्चे तेल की आपूर्ति होती है।
- एशिया में ईंधन की कीमतें दोगुनी हो गई हैं।
- यह संकट वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को प्रभावित कर सकता है।
नई दिल्ली, 17 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। ईरान के युद्ध के कारण वैश्विक तेल बाजार में जो उथल-पुथल हुई है, उसका प्रभाव कच्चे तेल की तुलना में डीजल और जेट फ्यूल जैसे अन्य पेट्रोलियम उत्पादों पर अधिक पड़ सकता है। यह जानकारी गोल्डमैन सैक्स ग्रुप की एक रिपोर्ट में प्रदान की गई है।
रिपोर्ट के अनुसार, कई रिफाइंड उत्पादों (जैसे डीजल और जेट फ्यूल) की कीमतों में कच्चे तेल की तुलना में अधिक तेजी देखी जा रही है। विश्लेषकों ने बताया कि मीडियम और हेवी क्रूड की आपूर्ति में भारी बाधा आने से डीजल, जेट फ्यूल और फ्यूल ऑयल का उत्पादन घट सकता है।
अमेरिका और इजरायल के ईरान के खिलाफ युद्ध ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को हिला दिया है। यह संघर्ष 28 फरवरी को शुरू हुआ और अब तीसरे सप्ताह में प्रवेश कर चुका है, जिससे पूरे मध्य पूर्व क्षेत्र पर प्रभाव पड़ा है।
इस संघर्ष के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए तेल और पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात रुक गया है, और क्षेत्र में कई ऊर्जा ढांचों पर हमले हुए हैं। इससे तेल उत्पादकों को उत्पादन कम करने और कुछ रिफाइनरी संचालन भी रोकने की आवश्यकता पड़ी है।
रिपोर्ट के अनुसार, पहले हमलों के बाद से कच्चे तेल की कीमतों में 40 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है, और ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया है।
हालांकि, डीजल और जेट फ्यूल जैसी पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में इससे भी अधिक तेजी आई है। एशिया के कुछ हिस्सों में तो ईंधन की कीमतें दोगुनी तक हो गई हैं, और चीन, थाईलैंड और दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने अपने घरेलू बाजार को बचाने के लिए निर्यात सीमित कर दिया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस संकट से कोई भी क्षेत्र पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। युद्ध के कारण पर्शियन गल्फ (फारस की खाड़ी) के देशों के लिए रिफाइंड उत्पादों का निर्यात करना कठिन हो गया है, जिससे रिफाइनरी बंद हो रही हैं और डीजल जैसे ईंधन बनाने वाले क्रूड की सप्लाई कम हो रही है।
गोल्डमैन सैक्स की रिपोर्ट में बताया गया है कि पर्शियन गल्फ से होने वाले लगभग 60 प्रतिशत कच्चे तेल का हिस्सा मीडियम और हेवी क्रूड होता है, जिसका उपयोग मुख्य रूप से डीजल, जेट फ्यूल और फ्यूल ऑयल बनाने में किया जाता है, जिसके विकल्प भी सीमित हैं।
इस वैश्विक संकट का असर नेफ्था पर भी पड़ेगा, जो पेट्रोकेमिकल्स बनाने में उपयोग होता है और कई उद्योगों के लिए आवश्यक कच्चा माल है।
रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि एशिया अपने नेफ्था का लगभग 50 प्रतिशत फारस की खाड़ी क्षेत्र से प्राप्त करता है, जबकि यूरोप अपने 40 प्रतिशत जेट फ्यूल के लिए इसी क्षेत्र पर निर्भर है। ऐसे में यह संकट वैश्विक स्तर पर ईंधन की आपूर्ति और कीमतों पर बड़ा प्रभाव डाल सकता है।