ISI का नया षड्यंत्र: मुखौटा संगठनों की आड़ में आतंकी नेटवर्क फैलाने की कोशिश, खुफिया जांच में खुलासा
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय खुफिया एजेंसियों की जांच में सामने आया है कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई आतंकी गतिविधियों को छुपाने और मुख्य प्रतिबंधित संगठनों को बचाने के लिए बड़े पैमाने पर काल्पनिक मुखौटा संगठन खड़े कर रही है। 27 अगस्त 2026 को नई दिल्ली से सामने आई इस जानकारी के अनुसार, ये छद्म संगठन न केवल जांच को भटकाते हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिबंध लगाने की प्रक्रिया को भी जटिल बना देते हैं।
मुखौटा संगठनों की रणनीति
प्रतिरोध मोर्चा इस रणनीति का सबसे स्पष्ट उदाहरण है — यह लश्कर-ए-तैयबा का एक छद्म संगठन है, जिसे आईएसआई ने प्रत्येक हमले के बाद लश्कर को जिम्मेदारी से बचाने के लिए खड़ा किया था। इसी प्रकार, शहजाद भट्टी नेटवर्क तहरीक-ए-तालिबान हिंदुस्तान (टीटीएच) के बैनर तले संचालित होता था — एक ऐसा संगठन जो वास्तव में अस्तित्व में ही नहीं है।
जांचकर्ताओं के अनुसार, टीटीएच नाम को जानबूझकर तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) से मिलता-जुलता रखा गया, ताकि यह भ्रम फैलाया जा सके कि पाकिस्तान में टीटीपी की गतिविधियों में भारत की कोई भूमिका है।
सक्रिय छद्म संगठनों की सूची
खुफिया सूत्रों के अनुसार, हाल के हफ्तों में कई नए काल्पनिक संगठन सक्रिय हुए हैं। इनमें शामिल हैं:
यूनाइटेड सिख ब्रदरहुड (यूएसबी), सिख टाइगर्स ऑफ खालिस्तान (एसटीके), खालिस्तान आर्म्ड फोर्स (केएएफ), शेर-ए-पंजाब ब्रिगेड (एसपीबी), पंजाब सॉवरेनिटी अलायंस (पीएसए) और खालिस्तान लिबरेशन आर्मी (केएलए)। अधिकारियों का कहना है कि ये सभी संगठन वास्तव में अस्तित्वहीन हैं और जैश-ए-मोहम्मद, बब्बर खालसा इंटरनेशनल (बीकेआई) तथा शहजाद भट्टी नेटवर्क जैसे असली खालिस्तानी आतंकी समूहों के मुखौटे मात्र हैं।
जांच एजेंसियों के सामने चुनौती
खुफिया ब्यूरो के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि इन काल्पनिक संगठनों का कोई रिकॉर्ड भारतीय एजेंसियों के पास नहीं है और न ही गृह मंत्रालय ने गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत इन पर प्रतिबंध लगाया है। इससे इन संगठनों की जानकारी इंटरपोल और अन्य अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों को साझा करना कठिन हो जाता है।
अधिकारी ने कहा कि संबंध प्रगाढ़ होने में समय लगता है — जांच में देरी से मूल आतंकी समूह को पुनर्गठित होने और रणनीति बदलने का मौका मिल जाता है।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध की प्रक्रिया और रास्ते की अड़चनें
अधिकारियों के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र या अमेरिका द्वारा किसी संगठन पर प्रतिबंध लगवाने के लिए पहले भारत में उस संगठन को प्रतिबंधित करना और अदालतों में आरोप पत्र दाखिल करना अनिवार्य है। प्रतिरोध मोर्चे के मामले में एजेंसियों को यह पहचानने में कई महीने लग गए कि यह लश्कर का मुखौटा है — इसके बाद ही गृह मंत्रालय ने इसे प्रतिबंधित सूची में डाला और हाल ही में अमेरिका ने भी इस पर प्रतिबंध लगाया।
यह ऐसे समय में आया है जब भारत-पाकिस्तान संबंध पहले से ही तनावपूर्ण हैं और सीमा पार आतंकवाद को लेकर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ रहा है।
आगे क्या होगा
अधिकारियों का स्पष्ट मानना है कि पाकिस्तान आगे भी नए-नए काल्पनिक संगठनों के नाम गढ़ता रहेगा, जो भारतीय एजेंसियों के लिए एक दीर्घकालिक चुनौती बनेगा। जांचकर्ताओं का जोर इस बात पर है कि ऐसे मुखौटा संगठनों का जल्द से जल्द पर्दाफाश किया जाए और मूल आतंकी समूह की पहचान कर अंतरराष्ट्रीय समुदाय को सतर्क किया जाए — क्योंकि अधिकांश ऑपरेटिव विदेश में स्थित होते हैं।