ग्रेट निकोबार परियोजना 'इकोलॉजिकल तबाही का नुस्खा': जयराम रमेश ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को लिखा पत्र

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ग्रेट निकोबार परियोजना 'इकोलॉजिकल तबाही का नुस्खा': जयराम रमेश ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को लिखा पत्र

सारांश

कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को पत्र लिखकर ग्रेट निकोबार परियोजना को 'इकोलॉजिकल तबाही का नुस्खा' करार दिया। उनका तर्क है कि यह मूलतः एक वाणिज्यिक परियोजना है, जिसे सुरक्षा के नाम पर उचित ठहराया जा रहा है, जबकि मौजूदा नौसैनिक ठिकानों का विस्तार कम नुकसान के साथ संभव है।

मुख्य बातें

कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने 17 मई 2026 को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को ग्रेट निकोबार परियोजना पर पत्र लिखा।
यह पत्र पर्यावरण मंत्री ( 10 मई ) और जनजातीय कार्य मंत्री ( 13 मई ) को लिखे पत्रों की श्रृंखला की तीसरी कड़ी है।
रमेश ने परियोजना को वन अधिकार अधिनियम, 2006 का 'खुला उल्लंघन' और पर्यावरणीय मंजूरियाँ 'संदिग्ध आधारों पर' दी गई बताईं।
आईएनएस बाज (कमीशन: जुलाई 2012 ) के रनवे विस्तार और नौसैनिक जेट्टी की योजनाएँ लगभग पाँच वर्षों से लंबित हैं।
रमेश ने आईएनएस कार्डिप, कोहासा, उत्क्रोश, जरावा और कार निकोबार एयरफोर्स स्टेशन को कम पर्यावरणीय नुकसान वाले विकल्प बताया।
ट्रांसशिपमेंट पोर्ट और टाउनशिप को 'कमर्शियल वेंचर' बताते हुए सुरक्षा तर्क को भ्रामक करार दिया।

कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने रविवार, 17 मई 2026 को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को पत्र लिखकर ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना को लेकर गंभीर आपत्तियाँ दर्ज कराईं। उन्होंने परियोजना को अपने मौजूदा स्वरूप में 'इकोलॉजिकल तबाही का नुस्खा' करार देते हुए पर्यावरणीय मंजूरियों की विश्वसनीयता, वन अधिकार अधिनियम, 2006 के कथित उल्लंघन और इसे रणनीतिक ज़रूरत के नाम पर उचित ठहराए जाने पर सवाल उठाए। यह पत्र उनकी उस श्रृंखला की तीसरी कड़ी है, जो उन्होंने पर्यावरण मंत्री (10 मई) और जनजातीय कार्य मंत्री (13 मई) को पहले ही भेज चुके हैं।

मुख्य आरोप: भ्रामक FAQ और पर्यावरणीय मंजूरियाँ

जयराम रमेश ने 1 मई को सरकार की ओर से जारी प्रेस नोट — 'द ग्रेट निकोबार द्वीप प्रोजेक्ट: अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न' — को निशाने पर लिया। उनका कहना है कि यह दस्तावेज़ परियोजना को मिली पर्यावरणीय मंजूरियों के बारे में 'पूरी तरह भ्रामक तस्वीर' पेश करता है, जो उनके अनुसार 'बेहद संदिग्ध आधारों' पर दी गई हैं। साथ ही, उन्होंने आरोप लगाया कि यह प्रक्रिया वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत आदिवासी समुदायों को प्राप्त व्यक्तिगत और सामूहिक अधिकारों का 'भावना और शब्द दोनों स्तरों पर खुला उल्लंघन' है।

रणनीतिक तर्क पर सवाल: वैकल्पिक नौसैनिक ठिकानों का सुझाव

रमेश ने स्वीकार किया कि देश की रक्षा क्षमताओं को सुदृढ़ करने की ज़रूरत पर कोई मतभेद नहीं है। किंतु उन्होंने तर्क दिया कि ग्रेट निकोबार में नई विशाल परियोजना खड़ी करने के बजाय, मौजूदा नौसैनिक ठिकानों का विस्तार कहीं कम पर्यावरणीय नुकसान के साथ किया जा सकता है। उन्होंने आईएनएस कार्डिप, आईएनएस कोहासा, आईएनएस उत्क्रोश, आईएनएस जरावा और कार निकोबार एयरफोर्स स्टेशन का उल्लेख किया — जो 2014 से भी पहले स्थापित हैं और जिनके विस्तार की संभावना उनके अनुसार अधिक व्यावहारिक है।

उन्होंने यह भी बताया कि ग्रेट निकोबार के कैंपबेल वे स्थित आईएनएस बाज को जुलाई 2012 में कमीशन किया गया था और मौजूदा रनवे की लंबाई को कम से कम तीन गुना बढ़ाने तथा एक नौसैनिक जेट्टी बनाने की योजनाएँ लगभग पाँच वर्षों से मंजूरी का इंतज़ार कर रही हैं — और इन योजनाओं का पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव भी मौजूदा परियोजना की तुलना में कहीं कम होता।

व्यावसायिक परियोजना को सुरक्षा का मुलम्मा: कांग्रेस का आरोप

रमेश ने पत्र में स्पष्ट किया कि ग्रेट निकोबार परियोजना का एक बड़ा हिस्सा — ट्रांसशिपमेंट पोर्ट और टाउनशिप — 'मूल रूप से एक कमर्शियल वेंचर' है, जिसका देश की सैन्य क्षमता से कोई सीधा संबंध नहीं है। उनका आरोप है कि बढ़ती पर्यावरणीय आलोचना के बीच सरकार इस वाणिज्यिक परियोजना को 'सर्वोपरि सुरक्षा कारणों' की आड़ में उचित ठहराने की कोशिश कर रही है।

विशेषज्ञों और नौसेना अधिकारियों के हवाले से अपील

रमेश ने राजनाथ सिंह से आग्रह किया कि वे उन वैकल्पिक प्रस्तावों पर गंभीरता से विचार करें, जो स्वयं 'प्रतिष्ठित नौसेना अधिकारियों' ने अपनी लेखनी में सुझाए हैं। उन्होंने अपना पत्र इस निष्कर्ष के साथ समाप्त किया: 'ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना अपने मौजूदा स्वरूप में इकोलॉजिकल तबाही का नुस्खा है।' यह ऐसे समय में आया है जब परियोजना पहले से ही पर्यावरणविदों, आदिवासी अधिकार समूहों और विपक्षी दलों की तीखी आलोचना झेल रही है। आने वाले हफ्तों में सरकार की ओर से इन सवालों का जवाब आना बाकी है।

संपादकीय दृष्टिकोण

तो ₹72,000 करोड़ की इस विशाल परियोजना को 'राष्ट्रीय सुरक्षा' का तमगा क्यों दिया जा रहा है? ट्रांसशिपमेंट पोर्ट और टाउनशिप को सुरक्षा की आड़ में पेश करना उस पुराने पैटर्न की याद दिलाता है जिसमें वाणिज्यिक हितों को राष्ट्रीय हित का रूप दिया जाता है। बिना स्वतंत्र पर्यावरणीय समीक्षा और आदिवासी सहमति के, यह परियोजना विधिक चुनौतियों की लंबी कतार में खड़ी हो सकती है।
RashtraPress
17 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

जयराम रमेश ने ग्रेट निकोबार परियोजना पर रक्षा मंत्री को पत्र क्यों लिखा?
रमेश ने परियोजना को 'इकोलॉजिकल तबाही का नुस्खा' बताते हुए राजनाथ सिंह से आग्रह किया कि वे मौजूदा नौसैनिक ठिकानों के विस्तार जैसे कम नुकसानदेह विकल्पों पर विचार करें। उनका तर्क है कि परियोजना का बड़ा हिस्सा वाणिज्यिक है और इसे सुरक्षा कारणों से उचित ठहराना भ्रामक है।
ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना क्या है और इस पर विवाद क्यों है?
यह केंद्र सरकार की एक बड़ी विकास परियोजना है जिसमें ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, टाउनशिप और सैन्य बुनियादी ढाँचा शामिल है। पर्यावरणविद, आदिवासी अधिकार समूह और विपक्ष इसकी पर्यावरणीय मंजूरियों की विश्वसनीयता और वन अधिकार अधिनियम, 2006 के अनुपालन पर सवाल उठा रहे हैं।
रमेश ने वन अधिकार अधिनियम के उल्लंघन का आरोप क्यों लगाया?
उनका कहना है कि परियोजना की मंजूरी प्रक्रिया ने वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत आदिवासी समुदायों को मिले व्यक्तिगत और सामूहिक अधिकारों का 'भावना और शब्द दोनों स्तरों पर' उल्लंघन किया है। उन्होंने यह भी कहा कि सरकारी FAQ दस्तावेज़ इस स्थिति को गलत तरीके से प्रस्तुत करता है।
रमेश ने ग्रेट निकोबार के विकल्प के रूप में कौन-से नौसैनिक ठिकाने सुझाए?
उन्होंने आईएनएस कार्डिप, आईएनएस कोहासा, आईएनएस उत्क्रोश, आईएनएस जरावा और कार निकोबार एयरफोर्स स्टेशन का उल्लेख किया। ये सभी 2014 से पहले स्थापित हैं और इनके विस्तार से सैन्य उद्देश्य कम पर्यावरणीय नुकसान के साथ पूरे हो सकते हैं।
क्या यह पत्र रमेश की पहली आपत्ति थी?
नहीं, यह तीसरा पत्र था। रमेश ने पहले 10 मई को केंद्रीय पर्यावरण, वन व जलवायु परिवर्तन मंत्री को और 13 मई को केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्री को भी पत्र लिखे थे। 17 मई का पत्र इसी अभियान की तीसरी कड़ी है।
राष्ट्र प्रेस
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