जनजाति सांस्कृतिक समागम, नई दिल्ली: 550 से अधिक समुदायों के 1.5 लाख प्रतिनिधि एकजुट
सारांश
मुख्य बातें
नई दिल्ली के लाल किला परिसर में आयोजित 'जनजाति सांस्कृतिक समागम' में 24 मई 2026 को देशभर के 550 से अधिक जनजातीय समुदायों के करीब 1.5 लाख प्रतिनिधि एकत्रित हुए। 'धरती आबा' बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती वर्ष के अवसर पर आयोजित इस भव्य कार्यक्रम में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।
मुख्य घटनाक्रम
इस मेगा सांस्कृतिक आयोजन में भारत के लगभग 750 जनजातीय समुदायों में से 550 से अधिक के प्रतिनिधि शामिल हुए। एक प्रतिभागी ने इसे 'मिनी इंडिया' का संगम बताया — जहाँ अलग-अलग जनजातीय समाज की संस्कृति, परंपराएँ, पहनावा, बोली, भाषा, वाद्य यंत्र और जीवनशैली एक ही मंच पर देखने को मिली।
प्रतिभागियों की आवाज़
उत्तराखंड से पारंपरिक वेशभूषा में आई एक महिला प्रतिभागी ने कहा, 'हर किसी को अपनी संस्कृति दिखाने और उस पर गर्व करने का अधिकार होना चाहिए।' उन्होंने बताया कि अपने 40 वर्ष के जीवन में उन्होंने इतना बड़ा जनजातीय आयोजन पहली बार देखा है।
एक अन्य महिला प्रतिभागी ने कहा, 'हम यहाँ आकर बहुत खुश हैं। हम लाल किला भी देखने जाएंगे।' उन्होंने स्पष्ट किया कि देशभर से आए लोग केवल कार्यक्रम देखने नहीं, बल्कि जनजातीय समाज के अधिकारों और उनकी समस्याओं को उठाने के उद्देश्य से यहाँ पहुँचे हैं।
आयोजन का उद्देश्य
एक प्रतिभागी ने बताया कि इस समागम का सबसे बड़ा लक्ष्य देशभर के जनजातीय समाज को एक मंच पर लाना है। उनके अनुसार, 'हम अलग-अलग क्षेत्रों और भाषाओं के लोगों से मिल रहे हैं — व्यवस्थाएँ भी काफी अच्छी की गई हैं।' यह ऐसे समय में आया है जब जनजातीय पहचान और सांस्कृतिक संरक्षण को राष्ट्रीय विमर्श में केंद्रीय स्थान दिलाने की माँग लगातार उठती रही है।
राजनीतिक संदर्भ
कार्यक्रम में शामिल भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेताओं ने इसे 'एकजुट भारत' की संस्कृति और जनजातीय एकता का बड़ा उत्सव बताया। गौरतलब है कि बिरसा मुंडा की जयंती को 15 नवंबर को 'जनजातीय गौरव दिवस' के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर मनाने की परंपरा हाल के वर्षों में शुरू की गई है, और यह समागम उसी श्रृंखला का विस्तार है।
आगे की राह
प्रतिभागियों ने माँग की कि पूरे देश को जनजातीय समाज की सांस्कृतिक विरासत और उनके संरक्षण प्रयासों से परिचित होना चाहिए। इस आयोजन से जनजातीय अधिकारों, भाषा संरक्षण और सामाजिक समावेश पर नीतिगत संवाद को नई गति मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।