अमित शाह का जनजाति सांस्कृतिक समागम में आह्वान: भेद डालने वालों को पहचानें, एकजुट हों
सारांश
मुख्य बातें
केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने 24 मई 2026 को नई दिल्ली में आयोजित 'जनजाति सांस्कृतिक समागम' को मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित किया। यह आयोजन भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती वर्ष के उपलक्ष्य में किया गया था। शाह ने जनजातीय समाज से एकजुट होने और विभाजनकारी शक्तियों को पहचानने का आह्वान किया।
समागम का महत्व और बिरसा मुंडा की विरासत
अमित शाह ने इस समागम को जनजातियों के महाकुंभ की संज्ञा दी और कहा कि यह आयोजन आने वाले अनेक वर्षों तक याद किया जाएगा। उन्होंने कहा कि भगवान बिरसा मुंडा के बाद यह पहला ऐसा जनजातीय आंदोलन है जो पूरे देश को एकसूत्र में पिरोता है।
शाह ने उलगुलान आंदोलन का स्मरण करते हुए कहा कि बिरसा मुंडा ने संचार के किसी साधन के बिना झारखंड से गुजरात तक जनजातियों को यह संदेश पहुँचाया कि उनका धर्म सच्चा है और उनके जंगलों पर किसी का कब्ज़ा नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि जल, जंगल और पहाड़ वनवासी भाइयों के लिए आस्था का केंद्र, आजीविका का साधन और संस्कृति का संरक्षक हैं।
एकता और धर्म रक्षा का संकल्प
शाह ने कहा कि सभी जनजातियों ने बिना किसी लिखित नियम के विविधता में एकता के मंत्र को चरितार्थ किया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि संविधान ने हर व्यक्ति को अपने मूल धर्म में सम्मान से जीने का अधिकार दिया है और लोभ या जबरदस्ती से धर्म परिवर्तन संभव नहीं।
उन्होंने कहा कि जो लोग जनजातीय समाज में भेद पैदा करने की कोशिश करते हैं, उन्हें यह नहीं पता कि हजारों वर्ष पहले भगवान राम ने शबरी के झूठे बेर खाकर यह संदेश दिया था कि हम सब एक हैं। शाह ने कहा कि लाखों जनजातियों की इस सम्मेलन में उपस्थिति उन भेद पैदा करने वालों के लिए करारा जवाब है।
यूसीसी और जनजातीय अधिकारों पर स्पष्टीकरण
गृह मंत्री ने समान नागरिक संहिता (UCC) को लेकर चल रही आशंकाओं को सीधे खारिज किया। उन्होंने कहा कि यूसीसी की कोई पाबंदी वनवासी समाज पर नहीं लगेगी और किसी भी जनजाति के अधिकारों का अतिक्रमण नहीं होगा।
शाह ने बताया कि गुजरात और उत्तराखंड में यूसीसी लागू करते समय नरेंद्र मोदी सरकार ने विशेष प्रावधान कर सभी जनजातियों को इससे बाहर रखा है। उन्होंने आश्वासन दिया कि किसी भी जनजाति की परंपरा से कोई खिलवाड़ नहीं होगा।
नक्सलवाद का अंत और जनजातीय विकास
अमित शाह ने घोषणा की कि जिस नक्सली हिंसा ने 40,000 से अधिक जनजातीय जानें लीं, मोदी सरकार ने उस 5 दशक पुराने नक्सलवाद को समाप्त कर दिया है और देश अब इस समस्या से पूर्णतः मुक्त हो गया है। उन्होंने बताया कि पूर्व में सुरक्षाबलों के 70 कैंपों को शहीद वीर गुण्डाधुर सेवा डेरा जनसुविधा केंद्र में बदला गया है।
जनजातीय कल्याण बजट की बात करते हुए शाह ने कहा कि पिछली सरकार के समय यह बजट ₹28,000 करोड़ था, जिसे प्रधानमंत्री मोदी ने बढ़ाकर ₹1 लाख 50 हजार करोड़ कर दिया है। उन्होंने यह भी बताया कि हाल ही में हुए बंगाल चुनाव में सभी 16 ट्राइबल रिजर्व सीटें भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने जीती हैं।
पेसा कानून और संस्थागत प्रयास
शाह ने बताया कि पेसा (PESA) कानून के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए केंद्र सरकार ने एक पेसा सेल बनाया है और 1 लाख से अधिक मास्टर ट्रेनर्स तैयार किए हैं। पेसा के नियमों का संथाली, गोंडी, भीली, मुंडारी सहित अनेक जनजाति भाषाओं में अनुवाद किया गया है।
उन्होंने मध्य प्रदेश के पेसा कानून मॉडल को आदर्श बताया और कहा कि पेसा ग्राम पंचायत विकास योजना पोर्टल के माध्यम से रियल-टाइम मॉनिटरिंग की जा रही है। उन्होंने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु का उल्लेख करते हुए कहा कि एक गरीब संथाल परिवार की बेटी को देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद तक पहुँचाना जनजातीय सशक्तिकरण का सबसे बड़ा प्रमाण है। आने वाले समय में जनजातीय क्षेत्रों के पहाड़ों और जंगलों तक विकास पहुँचाना सरकार की प्राथमिकता रहेगी।