गणपति उत्सव में जारांगे का अनशन कानून-व्यवस्था के लिए खतरा: चंद्रकांत पाटिल की अपील
सारांश
मुख्य बातें
महाराष्ट्र सरकार के मंत्री चंद्रकांत पाटिल ने 16 सितंबर 2026 को पुणे में स्पष्ट किया कि मराठा आरक्षण आंदोलनकारी मनोज जारांगे पाटिल द्वारा गणपति उत्सव के दौरान मुंबई में प्रस्तावित अनशन से कानून-व्यवस्था गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती है। उन्होंने जारांगे पाटिल से अपील की कि वे उत्सव के दौरान अनशन की योजना पर पुनर्विचार करें, क्योंकि यह समय पुलिस और प्रशासन के लिए पहले से ही अत्यंत व्यस्त रहता है।
मराठा आरक्षण संघर्ष का लंबा इतिहास
चंद्रकांत पाटिल ने कहा कि 1960 में महाराष्ट्र के गठन के बाद से ही मराठा आरक्षण की माँग एक ज्वलंत मुद्दा रही है और 1967 से इसे लेकर संगठित संघर्ष चल रहा है। उन्होंने मंडल आयोग का उल्लेख करते हुए बताया कि 1980 के दशक में आयोग की सिफारिशों के बाद कई जातियों को ओबीसी सूची में शामिल किया गया। उस दौर में जब शरद पवार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री थे, तब मराठा समुदाय को कुनबी सूची में शामिल करने का अवसर था, लेकिन ऐसा नहीं हो सका।
इसके बाद अन्नासाहेब पाटिल ने मराठा आरक्षण के लिए आंदोलन किया, किंतु माँग पूरी नहीं हुई। पाटिल ने कहा कि कई मराठा नेताओं के मुख्यमंत्री रहने के बावजूद समुदाय को आरक्षण के लिए लगातार संघर्ष करना पड़ा।
न्यायिक प्रक्रिया में उलझता रहा आरक्षण
देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व वाली सरकार ने मराठा समाज को 16 प्रतिशत आरक्षण प्रदान किया था, जिसे बाद में न्यायिक जाँच के दौरान कम किया गया और अंततः सर्वोच्च न्यायालय में यह टिक नहीं सका। इसके बाद केंद्र सरकार की ओर से आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए 10 प्रतिशत ईडब्ल्यूएस (EWS) आरक्षण का प्रावधान आया। एसईबीसी (SEBC) आरक्षण समाप्त होने के बाद पात्र मराठा समुदाय के लोगों को ईडब्ल्यूएस का लाभ मिलने लगा। बाद में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली सरकार ने पुनः 10 प्रतिशत एसईबीसी आरक्षण का प्रावधान किया।
कुनबी प्रमाणपत्र पर सरकार का रुख
कुनबी प्रमाणपत्र की माँग पर पाटिल ने स्पष्ट किया कि केवल वे लोग ही प्रमाणपत्र के पात्र होंगे जिनके पुराने रिकॉर्ड या दस्तावेज़ों में कुनबी होने का प्रमाण उपलब्ध है। उन्होंने चेताया कि बिना दस्तावेज़ी आधार के बड़े पैमाने पर प्रमाणपत्र जारी करने का कोई भी निर्णय न्यायिक जाँच में नहीं टिक पाएगा। हैदराबाद गजट के क्रियान्वयन के बाद भी केवल उन्हीं लोगों को लाभ मिलेगा जिनके नाम और रिकॉर्ड पात्रता की शर्तें पूरी करते हों।
जारांगे से व्यक्तिगत संबंध और लोकतांत्रिक अपील
पाटिल ने बताया कि वे मनोज जारांगे पाटिल को 2014 से जानते हैं। 2014 से 2019 तक वे मराठा आरक्षण के लिए गठित कैबिनेट उपसमिति के अध्यक्ष रहे और उस दौरान जारांगे उनसे नियमित रूप से मिलते रहे। उन्होंने कहा कि माँगें रखना लोकतांत्रिक अधिकार है, परंतु माँग का कानूनी आधार होना अनिवार्य है ताकि वह न्यायालय में टिक सके।
बाहरी प्रभाव के सवाल पर पाटिल ने कहा कि जारांगे किसी के उकसावे में आकर आंदोलन करने वाले व्यक्ति नहीं हैं, हालाँकि उन्होंने यह भी माना कि कुछ ताकतें विभिन्न मुद्दों के जरिए सरकार को परेशान करने की कोशिश कर सकती हैं।
गणपति उत्सव में अनशन पर चिंता
चंद्रकांत पाटिल ने कहा कि अनशन करना जारांगे का लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन गणपति उत्सव के दौरान मुंबई में बड़ी संख्या में श्रद्धालु सड़कों पर उमड़ते हैं और पुलिस पहले से सुरक्षा व्यवस्था में व्यस्त रहती है। ऐसे में यदि अनशन और मार्च एक साथ हों, तो कानून-व्यवस्था की गंभीर चुनौती उत्पन्न हो सकती है। उन्होंने सरकार और आंदोलनकारियों के बीच सहयोग की अपील करते हुए कहा कि जारांगे अनशन किए बिना भी अपनी माँगें जारी रख सकते हैं, और सरकार समाधान की दिशा में प्रयासरत है।