2 जुलाई 2026
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झारखंड हाईकोर्ट का निर्देश: 34 साल पहले मुक्त हुए 300 बंधुआ मजदूरों को मिले सरकारी योजनाओं का लाभ

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झारखंड हाईकोर्ट का निर्देश: 34 साल पहले मुक्त हुए 300 बंधुआ मजदूरों को मिले सरकारी योजनाओं का लाभ

सारांश

34 साल की प्रतीक्षा के बाद झारखंड हाईकोर्ट ने वह कहा जो प्रशासन को कब का कहना चाहिए था — 1992 में UP से मुक्त हुए 300 बंधुआ मजदूरों को उनका कानूनी हक अब और नहीं रोका जा सकता। गढ़वा उपायुक्त को ठोस कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं।

मुख्य बातें

झारखंड हाईकोर्ट ने 2 जुलाई 2026 को आदेश दिया कि 1992 में उत्तर प्रदेश से मुक्त कराए गए करीब 300 बंधुआ मजदूरों को सरकारी योजनाओं का लाभ दिया जाए।
मुख्य न्यायाधीश एस.एम.
सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने गढ़वा उपायुक्त को पात्र मजदूरों की पहचान कर लाभ दिलाने के निर्देश दिए।
मजदूर बंधुआ मजदूरी प्रणाली (उन्मूलन) अधिनियम, 1976 के तहत आवास, स्वास्थ्य, रोजगार और पेंशन के हकदार हैं, जो अब तक नहीं मिले।
यह जनहित याचिका जनहित सेवा प्रतिष्ठान के घनश्याम पाठक ने 2023 में दायर की थी।
अदालत ने कहा कि पिछले तीन वर्षों में केवल पत्राचार हुआ, कोई ठोस कार्रवाई नहीं — यह स्थिति अस्वीकार्य है।

झारखंड हाईकोर्ट ने 2 जुलाई 2026 को आदेश दिया कि वर्ष 1992 में उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों से मुक्त कराए गए झारखंड के करीब 300 बंधुआ मजदूरों को सरकारी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ तत्काल दिलाया जाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि इन मजदूरों को उनके कानूनी अधिकारों से वंचित रखना न्यायसंगत नहीं है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला जनहित सेवा प्रतिष्ठान के घनश्याम पाठक द्वारा वर्ष 2023 में दायर जनहित याचिका से जुड़ा है। याचिका में बताया गया कि 1992 में उत्तर प्रदेश के अलग-अलग जिलों से मुक्त कराए गए ये मजदूर अब गढ़वा जिले में निवास कर रहे हैं, किंतु तीन दशकों से अधिक समय बीत जाने के बाद भी उन्हें बंधुआ मजदूरी प्रणाली (उन्मूलन) अधिनियम, 1976 के अंतर्गत देय पुनर्वास सुविधाएँ — आवास, स्वास्थ्य, रोजगार और पेंशन — नहीं मिल पाई हैं।

अदालत की सख्त टिप्पणी

मुख्य न्यायाधीश एस.एम. सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कड़ी नाराजगी जताई। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि पिछले तीन वर्षों में संबंधित अधिकारियों ने केवल पत्राचार किया, परंतु पीड़ित मजदूरों को राहत दिलाने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। खंडपीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि पात्र लोगों को उनका अधिकार मिलने में इतनी देरी किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है।

गढ़वा उपायुक्त को निर्देश

हाईकोर्ट ने गढ़वा के उपायुक्त को निर्देश दिया कि सभी पात्र मजदूरों की पहचान की जाए और उन्हें बंधुआ मजदूर अधिनियम के तहत देय लाभों के साथ-साथ अन्य सरकारी कल्याण योजनाओं से जोड़ा जाए। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि केवल कागजी कार्रवाई पर्याप्त नहीं है — कानून का वास्तविक क्रियान्वयन सुनिश्चित करना अनिवार्य है।

आम जनता पर असर

यह आदेश उन सैकड़ों परिवारों के लिए राहत की उम्मीद लेकर आया है जो दशकों से शोषण का शिकार रहे और बाद में पुनर्वास प्रक्रिया की उपेक्षा झेलते रहे। गौरतलब है कि बंधुआ मजदूरी उन्मूलन अधिनियम के तहत मुक्त कराए गए व्यक्तियों को पुनर्वास अनुदान, भूमि आवंटन और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का कानूनी अधिकार है।

आगे क्या होगा

अदालत के निर्देश के बाद अब गढ़वा जिला प्रशासन पर जिम्मेदारी है कि वह पात्र मजदूरों की सूची तैयार कर उन्हें शीघ्र लाभ दिलाए। यह मामला झारखंड में बंधुआ मजदूरी के पीड़ितों के दीर्घकालिक पुनर्वास की व्यापक चुनौती को भी उजागर करता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि उस व्यापक विफलता का प्रतीक है जिसमें कानून बनने के दशकों बाद भी उसका क्रियान्वयन जमीन पर नहीं पहुँचता। बंधुआ मजदूरी उन्मूलन अधिनियम 1976 में बना, मुक्ति 1992 में मिली, याचिका 2023 में दायर हुई — और न्याय 2026 में दरवाजे पर दस्तक दे रहा है। तीन साल की सुनवाई में प्रशासन का 'केवल पत्राचार' वाला रवैया दर्शाता है कि हाशिये के वर्गों के लिए सरकारी तंत्र की जवाबदेही कितनी कमजोर है। असली परीक्षा अब अदालत के आदेश के बाद शुरू होती है — क्या गढ़वा प्रशासन इस बार कागज से आगे बढ़ेगा?
RashtraPress
2 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

झारखंड हाईकोर्ट ने बंधुआ मजदूरों के बारे में क्या आदेश दिया?
झारखंड हाईकोर्ट ने 2 जुलाई 2026 को आदेश दिया कि 1992 में उत्तर प्रदेश से मुक्त कराए गए करीब 300 बंधुआ मजदूरों को सरकारी कल्याणकारी योजनाओं — आवास, स्वास्थ्य, रोजगार और पेंशन — का लाभ तत्काल दिलाया जाए। गढ़वा उपायुक्त को पात्र मजदूरों की पहचान कर ठोस कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं।
ये बंधुआ मजदूर कब और कहाँ से मुक्त कराए गए थे?
ये मजदूर वर्ष 1992 में उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों से मुक्त कराए गए थे और झारखंड के गढ़वा जिले के निवासी हैं। मुक्ति के 34 वर्ष बाद भी उन्हें कानूनी रूप से देय पुनर्वास सुविधाएँ नहीं मिली थीं।
बंधुआ मजदूरी उन्मूलन अधिनियम के तहत इन मजदूरों को क्या अधिकार हैं?
बंधुआ मजदूरी प्रणाली (उन्मूलन) अधिनियम, 1976 के तहत मुक्त कराए गए मजदूरों को पुनर्वास अनुदान, आवास, स्वास्थ्य सेवाएँ, रोजगार सहायता और पेंशन का कानूनी अधिकार है। इन 300 मजदूरों को अब तक इनमें से कोई भी लाभ नहीं मिल पाया था।
यह जनहित याचिका किसने और कब दायर की?
यह जनहित याचिका जनहित सेवा प्रतिष्ठान के घनश्याम पाठक ने वर्ष 2023 में दायर की थी। सुनवाई के दौरान अदालत ने कई बार अधिकारियों से जवाब माँगा, लेकिन तीन वर्षों तक केवल औपचारिक पत्राचार होता रहा।
राष्ट्र प्रेस
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