झारखंड हाईकोर्ट का निर्देश: 34 साल पहले मुक्त हुए 300 बंधुआ मजदूरों को मिले सरकारी योजनाओं का लाभ
सारांश
मुख्य बातें
झारखंड हाईकोर्ट ने 2 जुलाई 2026 को आदेश दिया कि वर्ष 1992 में उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों से मुक्त कराए गए झारखंड के करीब 300 बंधुआ मजदूरों को सरकारी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ तत्काल दिलाया जाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि इन मजदूरों को उनके कानूनी अधिकारों से वंचित रखना न्यायसंगत नहीं है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला जनहित सेवा प्रतिष्ठान के घनश्याम पाठक द्वारा वर्ष 2023 में दायर जनहित याचिका से जुड़ा है। याचिका में बताया गया कि 1992 में उत्तर प्रदेश के अलग-अलग जिलों से मुक्त कराए गए ये मजदूर अब गढ़वा जिले में निवास कर रहे हैं, किंतु तीन दशकों से अधिक समय बीत जाने के बाद भी उन्हें बंधुआ मजदूरी प्रणाली (उन्मूलन) अधिनियम, 1976 के अंतर्गत देय पुनर्वास सुविधाएँ — आवास, स्वास्थ्य, रोजगार और पेंशन — नहीं मिल पाई हैं।
अदालत की सख्त टिप्पणी
मुख्य न्यायाधीश एस.एम. सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कड़ी नाराजगी जताई। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि पिछले तीन वर्षों में संबंधित अधिकारियों ने केवल पत्राचार किया, परंतु पीड़ित मजदूरों को राहत दिलाने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। खंडपीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि पात्र लोगों को उनका अधिकार मिलने में इतनी देरी किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है।
गढ़वा उपायुक्त को निर्देश
हाईकोर्ट ने गढ़वा के उपायुक्त को निर्देश दिया कि सभी पात्र मजदूरों की पहचान की जाए और उन्हें बंधुआ मजदूर अधिनियम के तहत देय लाभों के साथ-साथ अन्य सरकारी कल्याण योजनाओं से जोड़ा जाए। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि केवल कागजी कार्रवाई पर्याप्त नहीं है — कानून का वास्तविक क्रियान्वयन सुनिश्चित करना अनिवार्य है।
आम जनता पर असर
यह आदेश उन सैकड़ों परिवारों के लिए राहत की उम्मीद लेकर आया है जो दशकों से शोषण का शिकार रहे और बाद में पुनर्वास प्रक्रिया की उपेक्षा झेलते रहे। गौरतलब है कि बंधुआ मजदूरी उन्मूलन अधिनियम के तहत मुक्त कराए गए व्यक्तियों को पुनर्वास अनुदान, भूमि आवंटन और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का कानूनी अधिकार है।
आगे क्या होगा
अदालत के निर्देश के बाद अब गढ़वा जिला प्रशासन पर जिम्मेदारी है कि वह पात्र मजदूरों की सूची तैयार कर उन्हें शीघ्र लाभ दिलाए। यह मामला झारखंड में बंधुआ मजदूरी के पीड़ितों के दीर्घकालिक पुनर्वास की व्यापक चुनौती को भी उजागर करता है।