9 अगस्त 2026
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सोपोर में जम्मू-कश्मीर पुलिस का बड़ा अभियान: प्रतिबंधित जमात-ए-इस्लामी के 26 ठिकानों पर UAPA के तहत छापे

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सोपोर में जम्मू-कश्मीर पुलिस का बड़ा अभियान: प्रतिबंधित जमात-ए-इस्लामी के 26 ठिकानों पर UAPA के तहत छापे

सारांश

जम्मू-कश्मीर पुलिस ने सोपोर में प्रतिबंधित जमात-ए-इस्लामी के 26 ठिकानों पर एक साथ छापे मारे — यह यूएपीए के तहत उस संगठन के खिलाफ जाँच का हिस्सा है जिस पर 2019 से प्रतिबंध है और फरवरी 2024 में यह प्रतिबंध पाँच साल के लिए और बढ़ाया गया।

मुख्य बातें

जम्मू-कश्मीर पुलिस ने 9 अगस्त 2026 को सोपोर में 26 स्थानों पर एक साथ तलाशी अभियान चलाया।
कार्रवाई यूएपीए के तहत प्रतिबंधित संगठन जमात-ए-इस्लामी (जेईआई) से जुड़े आतंकवाद मामले में की गई।
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने जेईआई पर प्रतिबंध 2019 के पुलवामा हमले के बाद लगाया था; फरवरी 2024 में इसे 5 वर्षों के लिए और बढ़ाया गया।
जेईआई की स्थापना 1953 में मौलाना सादुद्दीन ताराबली ने की थी; विवादास्पद नेता सैयद अली शाह गिलानी 2021 में निधन तक पाकिस्तान-समर्थक रुख पर कायम रहे।
अभियान का उद्देश्य सबूत संकलन और जेईआई के सक्रिय नेटवर्क की कड़ियाँ उजागर करना है।

जम्मू-कश्मीर पुलिस ने 9 अगस्त 2026 को सोपोर में एक साथ 26 स्थानों पर तलाशी अभियान चलाया — यह कार्रवाई प्रतिबंधित संगठन जमात-ए-इस्लामी (जेईआई) से जुड़े आतंकवाद के एक मामले में गैर-कानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत की गई। अधिकारियों के अनुसार यह अभियान सबूत संकलन और जेईआई के सक्रिय नेटवर्क की कड़ियाँ उजागर करने के व्यापक जाँच प्रयास का हिस्सा है।

मुख्य घटनाक्रम

रविवार को एक समन्वित अभियान में जम्मू-कश्मीर पुलिस की टीमों ने सोपोर के 26 ठिकानों पर एक साथ दबिश दी। अधिकारियों ने बताया कि इन स्थानों की पहचान पूर्व में एकत्र खुफिया जानकारी के आधार पर की गई थी। तलाशी के दौरान दस्तावेज़ और अन्य साक्ष्य ज़ब्त किए गए, हालाँकि अधिकारियों ने विस्तृत ब्यौरा साझा नहीं किया।

जमात-ए-इस्लामी पर प्रतिबंध की पृष्ठभूमि

केंद्रीय गृह मंत्रालय (एमएचए) ने जमात-ए-इस्लामी जम्मू-कश्मीर को यूएपीए के तहत गैर-कानूनी संगठन घोषित किया था। अलगाववादी गतिविधियों और आतंकवाद से संबंध के आरोपों के चलते यह प्रतिबंध 2019 के पुलवामा हमले के बाद लगाया गया था। फरवरी 2024 में एमएचए ने इस प्रतिबंध को अगले पाँच वर्षों के लिए और बढ़ा दिया। अधिकारी राष्ट्रीय संप्रभुता के लिए खतरे और अलगाववाद को बढ़ावा देने को इस निरंतर प्रतिबंध का आधार बताते हैं।

संगठन का इतिहास और विभाजन

जमात-ए-इस्लामी जम्मू-कश्मीर का गठन 1950 के दशक में एक स्वतंत्र शाखा के रूप में हुआ, जो सैयद अबुल आला मौदूदी की इस्लामी विचारधारा से प्रभावित थी। संगठन ने स्कूलों और सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों का एक विस्तृत नेटवर्क स्थापित करते हुए कट्टर धार्मिक दृष्टिकोण को प्रोत्साहित किया।

मौलाना सादुद्दीन ताराबली ने 1953 में इस संगठन की स्थापना की और 1985 तक इसके प्रमुख रहे। संगठन के सबसे विवादास्पद नेता सैयद अली शाह गिलानी रहे, जिन्होंने अलगाववादी हिंसा शुरू होने से पहले जम्मू-कश्मीर विधानसभा के लिए आठ बार चुनाव लड़ा — तीन बार जीते और पाँच बार हारे। बाद में गिलानी मुख्यधारा की जमात से अलग हो गए और उन्होंने 'तहरीक-ए-हुर्रियत' का गठन किया। 2021 में अपनी मृत्यु तक वे पाकिस्तान-समर्थक कड़े रुख पर कायम रहे।

संगठन में फूट के बाद एक गुट ने जस्टिस एंड डेवलपमेंट फ्रंट (जेडीएफ, जम्मू-कश्मीर) का गठन किया। इस गुट के कई पूर्व कार्यकर्ताओं ने घोषणा की कि वे देश के संवैधानिक ढाँचे के भीतर काम करेंगे।

सुरक्षा बलों की रणनीति

यह ऐसे समय में आया है जब जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा बल प्रतिबंधित संगठनों के वित्तीय और संगठनात्मक नेटवर्क को ध्वस्त करने के लिए लगातार अभियान चला रहे हैं। गौरतलब है कि सोपोर क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से अलगाववादी गतिविधियों का केंद्र रहा है और यहाँ इस प्रकार की कार्रवाइयाँ पहले भी हो चुकी हैं।

आगे की जाँच

अधिकारियों ने संकेत दिया है कि तलाशी अभियान से प्राप्त साक्ष्यों का विश्लेषण किया जाएगा और जाँच के दायरे को आगे बढ़ाया जा सकता है। जम्मू-कश्मीर पुलिस ने फिलहाल किसी गिरफ्तारी की पुष्टि नहीं की है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली कसौटी यह होगी कि इससे जेईआई के वित्तीय और संगठनात्मक नेटवर्क पर कितना ठोस असर पड़ता है। प्रतिबंध के बावजूद संगठन की कथित गतिविधियाँ जारी रहना यह सवाल उठाता है कि पिछले पाँच वर्षों की कार्रवाइयाँ नेटवर्क को वास्तव में कमज़ोर कर पाई हैं या नहीं। यूएपीए के तहत बार-बार होने वाले छापों और नवीनीकृत प्रतिबंधों के बावजूद यदि संगठन की जड़ें बनी रहती हैं, तो यह कानूनी उपकरणों की सीमाओं और ज़मीनी पुनर्वास रणनीति की ज़रूरत की ओर भी इशारा करता है।
RashtraPress
9 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

जम्मू-कश्मीर पुलिस ने सोपोर में 26 ठिकानों पर छापे क्यों मारे?
यह तलाशी अभियान प्रतिबंधित संगठन जमात-ए-इस्लामी (जेईआई) से जुड़े आतंकवाद के एक मामले में यूएपीए के तहत चलाया गया। अधिकारियों के अनुसार इसका उद्देश्य सबूत इकट्ठा करना और जेईआई के सक्रिय नेटवर्क की कड़ियाँ उजागर करना है।
जमात-ए-इस्लामी जम्मू-कश्मीर पर प्रतिबंध कब और क्यों लगा?
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 2019 के पुलवामा हमले के बाद जमात-ए-इस्लामी को यूएपीए के तहत गैर-कानूनी संगठन घोषित किया था। अलगाववादी गतिविधियों और आतंकवाद से संबंध के आरोप प्रतिबंध का आधार रहे हैं; फरवरी 2024 में यह प्रतिबंध पाँच वर्षों के लिए और बढ़ाया गया।
जमात-ए-इस्लामी जम्मू-कश्मीर का इतिहास क्या है?
इस संगठन की स्थापना 1953 में मौलाना सादुद्दीन ताराबली ने की थी और वे 1985 तक इसके प्रमुख रहे। संगठन सैयद अबुल आला मौदूदी की विचारधारा से प्रभावित था और उसने स्कूलों व सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों का बड़ा नेटवर्क चलाया।
सैयद अली शाह गिलानी का जमात-ए-इस्लामी से क्या संबंध था?
सैयद अली शाह गिलानी जमात-ए-इस्लामी के सबसे प्रमुख और विवादास्पद नेता थे। उन्होंने अलगाववादी हिंसा शुरू होने से पहले जम्मू-कश्मीर विधानसभा के लिए आठ बार चुनाव लड़ा, बाद में मुख्यधारा की जमात से अलग होकर 'तहरीक-ए-हुर्रियत' बनाई और 2021 में अपनी मृत्यु तक पाकिस्तान-समर्थक रुख पर कायम रहे।
जमात-ए-इस्लामी में टूट के बाद क्या हुआ?
संगठन में विभाजन के बाद एक गुट ने जस्टिस एंड डेवलपमेंट फ्रंट (जेडीएफ, जम्मू-कश्मीर) का गठन किया। इस गुट के कई पूर्व कार्यकर्ताओं ने घोषणा की कि वे देश के संवैधानिक ढाँचे के भीतर काम करेंगे।
राष्ट्र प्रेस
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