करम पर्व 2026: प्रकृति-पूजा, भाई-बहन का प्रेम और सदियों पुरानी जनजातीय इकोलॉजी का जीवंत उत्सव
सारांश
मुख्य बातें
करम पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मनुष्य और प्रकृति के बीच सदियों पुरानी साझेदारी, कृषि-संस्कृति और भाई-बहन के पवित्र बंधन का अनूठा उत्सव है। मुंडा, उरांव, संथाल और गोंड सहित अनेक जनजातीय और सदान समुदायों की दैनंदिन संस्कृति में रचा-बसा यह पर्व यह संदेश देता है कि प्रकृति का सम्मान ही जीवन को उत्सव बनाता है। 22 सितंबर 2026 को मनाया जा रहा यह पर्व झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और बंगाल के आदिवासी अंचलों में विशेष उल्लास के साथ मनाया जाता है।
करम वृक्ष: इस पर्व का केंद्रबिंदु
करम पर्व के हृदय में है 'करम' का वृक्ष, जिसका वानस्पतिक नाम नौक्लिया पार्विफोलिया अथवा एडीना कोर्डिफोलिया है। लोक-मान्यता के अनुसार करम की लकड़ी इतनी सुदृढ़ और औषधीय गुणों से समृद्ध होती है कि उसमें घुन या कीड़े नहीं लगते। यह गुण ही मानव जीवन में शक्ति, दीर्घायु और निरोगी काया की प्रेरणा बनता है।
करम देवता को पराक्रम और ऊर्जा का अधिष्ठाता माना जाता है। खेतों में हरी-भरी फसलें, समुचित वर्षा और अच्छी पैदावार की कामना लेकर ग्राम-समाज करम देव के समक्ष नतमस्तक होता है। यह आस्था कृषि-समाज और वन-संपदा के बीच के अटूट सहजीवी रिश्ते को परिभाषित करती है।
भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक
रक्षाबंधन और भैया दूज की तरह करम पर्व भी भाई-बहन के निश्छल स्नेह का जीवंत प्रमाण है। इस अवसर पर बहनें निर्जला व्रत रखकर अपने भाइयों के सुखी जीवन, दीर्घायु और समृद्धि के लिए प्रार्थना करती हैं। मान्यता है कि जब भाई वनों या दूरस्थ क्षेत्रों में श्रम के लिए प्रस्थान करते हैं, तो बहनों की यह प्रार्थना उनके चारों ओर सुरक्षा-कवच की भाँति विद्यमान रहती है।
अगली प्रभात विसर्जन के समय भाई अपनी बहनों को नदियाँ पार कराते हैं और बहनें उन्हें प्रेमपूर्वक 'ठेकुआ' तथा अन्य पारंपरिक पकवानों का प्रसाद अर्पित करती हैं। यह सरल किंतु भावपूर्ण आदान-प्रदान इस पर्व की आत्मा है।
'जावा' उत्सव: अंकुरण से समृद्धि की कामना
करम पर्व के साथ अविवाहित कन्याएं 'जावा' उत्सव मनाती हैं। बाँस की छोटी-छोटी टोकरियों में बालू भरकर उनमें सात प्रकार के अन्न — धान, मक्का, चना, उड़द आदि — बोए जाते हैं। कन्याएं दिन-रात इनकी सेवा करती हैं, हल्दी के पानी से सींचती हैं और पारंपरिक जावा गीतों के माध्यम से इन्हें जागृत करती हैं।
जब ये बीज अंकुरित होकर हल्के पीले-सुनहरे रेशों में परिवर्तित होते हैं, तो वे नई फसल के अच्छे अंकुरण, घर-आँगन की समृद्धि और आने वाले सुखी वैवाहिक जीवन के शुभ संकेत बन जाते हैं। पूजा के दौरान खीरे को संतान के प्रतीक स्वरूप अर्पित कर नव-सृजन की प्रार्थना की जाती है। यह अनुष्ठान आधुनिक पारिस्थितिकी-विज्ञान के उस सिद्धांत की लोक-अभिव्यक्ति है जो बीज-संरक्षण और जैव-विविधता को मानव-जीवन से जोड़ता है।
करम डाली लाने की अनुशासित परंपरा
करम पर्व में वृक्ष की डाली लाने की प्रक्रिया अत्यंत मर्यादित और अनुशासनबद्ध है। नए वस्त्रों में सजे युवक-युवतियाँ, पूजा की थाल में धूप, अक्षत, सिंदूर, फूल और दूध लेकर मांदर की गूँज के साथ वन की ओर प्रस्थान करते हैं। वृक्ष की विधिपूर्वक वंदना के बाद एक या तीन डालियाँ काटी जाती हैं।
सबसे महत्त्वपूर्ण नियम यह है कि कटी हुई करम डाली किसी भी स्थिति में भूमि को स्पर्श न करे। इसे हाथों-हाथ अथवा थाली के सहारे बड़े आदर-भाव से गाँव लाया जाता है। गाँव के मध्य स्थित 'अखाड़े' या आँगन को गाय के गोबर और मिट्टी से लीपकर पवित्र किया जाता है, जहाँ पाहन (पुजारी) द्वारा यह डाली विधिपूर्वक रोपी जाती है।
करमा-धरमा की लोककथा और विसर्जन
डाली रोपने के पश्चात व्रती महिलाएं और ग्रामीण चारों ओर वृत्ताकार बैठते हैं। पाहन द्वारा 'करमा और धरमा' नामक दो भाइयों की अमर लोककथा सुनाई जाती है, जो कर्म (सत्कर्म) और धर्म (प्राकृतिक संतुलन) की महत्ता को रेखांकित करती है। कथा की समाप्ति पर एक-दूसरे के कानों में जावा के फूल खोंसकर शुभकामनाएं दी जाती हैं।
इसके बाद गीतों और सामूहिक नृत्यों का उल्लासपूर्ण सिलसिला आरंभ होता है, जिसमें युवतियाँ मांदर की थाप पर झूमती हैं। अगले दिन प्रातःकाल अश्रुपूरित नेत्रों और नवीन संकल्पों के साथ करम डाली को किसी पवित्र नदी या जलस्रोत में विसर्जित कर दिया जाता है। यह विसर्जन प्रकृति से ग्रहण करने और पुनः लौटाने के उस चक्र का प्रतीक है जो जनजातीय पारिस्थितिकी-दर्शन की मूल आत्मा है।