कर्नाटक विधानसभा मॉनसून सत्र अनिश्चितकाल के लिए स्थगित, ₹184 करोड़ आदिवासी घोटाले पर भाजपा का रात भर विरोध
सारांश
मुख्य बातें
कर्नाटक विधानसभा के स्पीकर जी.एस. पाटिल ने 24 अगस्त 2026 को मॉनसून सत्र अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया। यह कदम उस समय उठाया गया जब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने आदिवासी कल्याण निगम घोटाले में कथित तौर पर संलिप्त योजना एवं सांख्यिकी मंत्री बी. नागेंद्र के इस्तीफे की माँग को लेकर रात भर विरोध प्रदर्शन जारी रखने की घोषणा की। सत्र 13 अगस्त को शुरू हुआ था और इसे 27 अगस्त तक चलना था।
मुख्य घटनाक्रम
भाजपा सत्र की शुरुआत से ही मंत्री नागेंद्र के इस्तीफे की माँग करते हुए कार्यवाही में बाधा डालती रही। विपक्ष का आरोप है कि आदिवासी एवं दलित समुदायों के लिए आवंटित ₹184 करोड़ का गबन किया गया है। सत्र के अंतिम दिन से तीन दिन पहले ही स्पीकर द्वारा कार्यवाही स्थगित किए जाने को भाजपा ने सरकार की 'भगोड़ी रणनीति' करार दिया।
भाजपा की प्रतिक्रिया
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष एवं विधायक बी.वाई. विजयेंद्र ने कहा, 'हमें समझ आ गया है कि हमें न्याय नहीं मिल सकता। हम जनता के पास जाएँगे। हम इस मामले में राज्यपाल से दखल की माँग करते हैं और उनसे आग्रह करते हैं कि वे एक भ्रष्ट मंत्री को बचाने के लिए कांग्रेस सरकार को फटकार लगाएँ।' विजयेंद्र ने यह भी आरोप लगाया कि नागेंद्र को इसलिए बचाया जा रहा है क्योंकि उनके हटने से व्यापक भ्रष्टाचार उजागर हो सकता है।
विधानसभा में विपक्ष के नेता आर. अशोक ने कहा, 'कर्नाटक के इतिहास में पिछले 25-30 वर्षों में पहली बार ऐसा हुआ है कि विपक्ष के डर से कांग्रेस सरकार ने सत्र खत्म कर दिया।' अशोक ने स्पीकर पाटिल की भी आलोचना करते हुए कहा कि एक वरिष्ठ राजनेता होने के बावजूद वे सदन को ठीक से नहीं चला सके।
घोटाले का संदर्भ
यह विवाद आदिवासी कल्याण निगम में कथित वित्तीय अनियमितताओं को लेकर है, जिसमें भाजपा का आरोप है कि दलित एवं आदिवासी परिवारों के लिए निर्धारित ₹184 करोड़ का गबन हुआ। आर. अशोक ने कहा, 'दलितों के लूटे गए ₹184 करोड़ दलित परिवारों तक पहुँचने चाहिए। इसमें कोई राजनीति नहीं है।' गौरतलब है कि मंत्री नागेंद्र स्वयं दलित समुदाय से हैं, जिसे लेकर राजनीतिक पेचीदगी और गहरी हो गई है।
आगे क्या होगा
भाजपा ने घोषणा की है कि वह राज्यपाल थावरचंद गहलोत से मिलकर हस्तक्षेप की माँग करेगी और इस मुद्दे को जन-आंदोलन का रूप देगी। यह ऐसे समय में आया है जब कर्नाटक में कांग्रेस सरकार पहले से ही कई मोर्चों पर दबाव में है। आलोचकों का कहना है कि सत्र का समय से पहले स्थगन विधायी जवाबदेही के लिहाज़ से चिंताजनक मिसाल है।