केपीएससी एसआईटी आदेश: कर्नाटक सरकार सुप्रीम कोर्ट जाएगी, भाजपा ने पूछा — किसे बचाने की कोशिश?
सारांश
मुख्य बातें
कर्नाटक उच्च न्यायालय ने 21 सितंबर 2026 को कर्नाटक लोक सेवा आयोग (केपीएससी) में 400 पशु चिकित्सा अधिकारियों (वेटनरी ऑफिसर) की भर्ती में कथित अनियमितताओं की जांच के लिए वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी आलोक कुमार की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (एसआईटी) गठित करने का आदेश दिया था। अब कर्नाटक सरकार इस आदेश को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देने के लिए स्पेशल लीव पिटिशन (एसएलपी) दायर करने का निर्णय ले चुकी है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि उसे एसआईटी जांच से कोई आपत्ति नहीं है, परंतु उच्च न्यायालय द्वारा खास अधिकारियों को स्वयं नियुक्त करने के निर्देश को वह न्यायिक अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण मानती है।
मुख्य विवाद: न्यायिक अतिक्रमण का आरोप
मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने कहा, 'हमें एसआईटी बनाने से कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन सरकार को खास अधिकारियों को नियुक्त करने का निर्देश देना गलत संदेश देता है।' सरकार ने कानूनी विशेषज्ञों से परामर्श के बाद यह कदम उठाया है। राज्य का तर्क है कि कार्यकारी अधिकार के दायरे में आने वाले अधिकारियों की तैनाती का निर्णय न्यायालय नहीं, बल्कि सरकार को करना चाहिए।
यह ऐसे समय में आया है जब न्यायपालिका और राज्य सरकारों के बीच जांच एजेंसियों के नियंत्रण को लेकर बहस पूरे देश में तेज हो रही है। गौरतलब है कि यह पहला मामला नहीं है जब किसी राज्य सरकार ने उच्च न्यायालय के एसआईटी गठन संबंधी आदेश को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी हो।
सीआईडी जांच और नई एसआईटी का टकराव
राज्य सरकार ने बताया है कि अपराध जांच विभाग (सीआईडी) की जांच पहले ही लगभग 80 प्रतिशत पूरी हो चुकी है। गिरफ्तारियां हो चुकी हैं, सबूत और दस्तावेज जब्त किए जा चुके हैं, बरामद धनराशि और सीसीटीवी फुटेज सहित तकनीकी साक्ष्य एकत्र किए जा चुके हैं। ऐसे में सरकार का सवाल है कि जब जांच लगभग समाप्ति पर है, तो नई एसआईटी बनाना क्यों आवश्यक है।
उच्च न्यायालय के आदेश के अनुसार, सीआईडी को सभी संबंधित दस्तावेज और जांच सामग्री एसआईटी को सौंपनी होगी। एसआईटी को हर 30 दिनों में प्रगति रिपोर्ट देने और 100 दिनों के भीतर जांच पूरी करने का निर्देश दिया गया है।
भाजपा की तीखी प्रतिक्रिया
विपक्ष के नेता आर. अशोक ने सरकार के इस फैसले पर कड़े सवाल उठाए। उन्होंने पूछा, 'सरकार हाई कोर्ट द्वारा नियुक्त एसआईटी से इतनी डरी हुई क्यों है? आप सुप्रीम कोर्ट में अपील करके किसे बचाने की कोशिश कर रहे हैं?' अशोक ने आरोप लगाया कि सरकार केपीएससी वेटनरी ऑफिसर भर्ती मामले से जुड़ी सच्चाई को सामने आने से रोकने की कोशिश कर रही है।
भारतीय जनता पार्टी (BJP) नेता ने यह भी सवाल उठाया कि जब सीआईडी जांच पहले से जारी थी, तो उच्च न्यायालय की निगरानी वाली जांच को चुनौती क्यों दी जा रही है। उनके अनुसार, उच्च न्यायालय की देखरेख में होने वाली जांच से भर्ती प्रक्रिया में कथित प्रभावशाली राजनीतिक नेताओं, मंत्रियों और बिचौलियों की भूमिका — यदि कोई हो — का पता चल सकता है।
मामले का दायरा और आरोपों की प्रकृति
उच्च न्यायालय के आदेश के तहत जांच का दायरा केएएस और सहायक कार्यकारी अभियंता (AEE) भर्ती परीक्षाओं सहित अन्य केपीएससी परीक्षाओं तक भी विस्तारित होने की संभावना है — वह भी उस दौरान जब ज्ञानेंद्र कुमार केपीएससी के नियंत्रक थे। इस प्रकार, पिछले तीन से चार वर्षों की कई भर्ती प्रक्रियाएं जांच के घेरे में आ सकती हैं।
इस मामले में लगे आरोपों में प्रश्न-पत्र लीक, चयन के लिए धनराशि का लेन-देन, बिचौलियों की भूमिका और परीक्षा रिकॉर्ड में हेरफेर शामिल हैं। ये सभी आरोप अभी जांच के दायरे में हैं और इनमें नामित किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध आपराधिक अपराध अभी न्यायालय में साबित नहीं हुआ है।
आगे क्या होगा
अब सर्वोच्च न्यायालय में दायर एसएलपी पर सुनवाई के बाद स्पष्ट होगा कि एसआईटी जांच आगे बढ़ेगी या स्थगित रहेगी। भाजपा ने सरकार से आग्रह किया है कि वह एसआईटी के साथ सहयोग करे और उसे चुनौती देने के बजाय निष्पक्ष जांच का मार्ग प्रशस्त करे। लाखों उम्मीदवारों का भविष्य इस मामले के परिणाम पर निर्भर है, और यह विवाद कर्नाटक की भर्ती प्रक्रियाओं की पारदर्शिता पर बड़े सवाल खड़े कर रहा है।