24 सितंबर 2026
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केपीएससी एसआईटी आदेश: कर्नाटक सरकार सुप्रीम कोर्ट जाएगी, भाजपा ने पूछा — किसे बचाने की कोशिश?

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केपीएससी एसआईटी आदेश: कर्नाटक सरकार सुप्रीम कोर्ट जाएगी, भाजपा ने पूछा — किसे बचाने की कोशिश?

सारांश

कर्नाटक सरकार ने उच्च न्यायालय के एसआईटी आदेश को न्यायिक अतिक्रमण बताते हुए सर्वोच्च न्यायालय जाने का फैसला किया है — जबकि सीआईडी की 80% जांच पूरी हो चुकी है। भाजपा का सीधा सवाल: अगर कुछ छिपाना नहीं, तो अदालती निगरानी से डर क्यों?

मुख्य बातें

कर्नाटक सरकार ने उच्च न्यायालय के 21 सितंबर 2026 के एसआईटी गठन आदेश को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देने के लिए एसएलपी दायर करने का निर्णय लिया है।
शिवकुमार ने एसआईटी जांच पर नहीं, बल्कि उच्च न्यायालय द्वारा खास अधिकारियों को नियुक्त करने के निर्देश पर आपत्ति जताई है।
सरकार का तर्क है कि सीआईडी की जांच पहले ही लगभग 80 प्रतिशत पूरी हो चुकी है — गिरफ्तारियां, साक्ष्य और तकनीकी सबूत एकत्र किए जा चुके हैं।
उच्च न्यायालय ने 400 वेटनरी ऑफिसर भर्ती मामले की जांच के लिए वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी आलोक कुमार की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय एसआईटी बनाई थी, जिसे 100 दिनों में रिपोर्ट देनी थी।
अशोक (BJP) ने आरोप लगाया कि सरकार सच्चाई छिपाने के लिए एसआईटी को चुनौती दे रही है और प्रभावशाली नेताओं को बचाने की कोशिश हो रही है।
जांच का दायरा केएएस और AEE भर्ती परीक्षाओं तक भी बढ़ सकता है, जो पिछले तीन-चार वर्षों की प्रक्रियाओं को प्रभावित कर सकता है।

कर्नाटक उच्च न्यायालय ने 21 सितंबर 2026 को कर्नाटक लोक सेवा आयोग (केपीएससी) में 400 पशु चिकित्सा अधिकारियों (वेटनरी ऑफिसर) की भर्ती में कथित अनियमितताओं की जांच के लिए वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी आलोक कुमार की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (एसआईटी) गठित करने का आदेश दिया था। अब कर्नाटक सरकार इस आदेश को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देने के लिए स्पेशल लीव पिटिशन (एसएलपी) दायर करने का निर्णय ले चुकी है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि उसे एसआईटी जांच से कोई आपत्ति नहीं है, परंतु उच्च न्यायालय द्वारा खास अधिकारियों को स्वयं नियुक्त करने के निर्देश को वह न्यायिक अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण मानती है।

मुख्य विवाद: न्यायिक अतिक्रमण का आरोप

मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने कहा, 'हमें एसआईटी बनाने से कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन सरकार को खास अधिकारियों को नियुक्त करने का निर्देश देना गलत संदेश देता है।' सरकार ने कानूनी विशेषज्ञों से परामर्श के बाद यह कदम उठाया है। राज्य का तर्क है कि कार्यकारी अधिकार के दायरे में आने वाले अधिकारियों की तैनाती का निर्णय न्यायालय नहीं, बल्कि सरकार को करना चाहिए।

यह ऐसे समय में आया है जब न्यायपालिका और राज्य सरकारों के बीच जांच एजेंसियों के नियंत्रण को लेकर बहस पूरे देश में तेज हो रही है। गौरतलब है कि यह पहला मामला नहीं है जब किसी राज्य सरकार ने उच्च न्यायालय के एसआईटी गठन संबंधी आदेश को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी हो।

सीआईडी जांच और नई एसआईटी का टकराव

राज्य सरकार ने बताया है कि अपराध जांच विभाग (सीआईडी) की जांच पहले ही लगभग 80 प्रतिशत पूरी हो चुकी है। गिरफ्तारियां हो चुकी हैं, सबूत और दस्तावेज जब्त किए जा चुके हैं, बरामद धनराशि और सीसीटीवी फुटेज सहित तकनीकी साक्ष्य एकत्र किए जा चुके हैं। ऐसे में सरकार का सवाल है कि जब जांच लगभग समाप्ति पर है, तो नई एसआईटी बनाना क्यों आवश्यक है।

उच्च न्यायालय के आदेश के अनुसार, सीआईडी को सभी संबंधित दस्तावेज और जांच सामग्री एसआईटी को सौंपनी होगी। एसआईटी को हर 30 दिनों में प्रगति रिपोर्ट देने और 100 दिनों के भीतर जांच पूरी करने का निर्देश दिया गया है।

भाजपा की तीखी प्रतिक्रिया

विपक्ष के नेता आर. अशोक ने सरकार के इस फैसले पर कड़े सवाल उठाए। उन्होंने पूछा, 'सरकार हाई कोर्ट द्वारा नियुक्त एसआईटी से इतनी डरी हुई क्यों है? आप सुप्रीम कोर्ट में अपील करके किसे बचाने की कोशिश कर रहे हैं?' अशोक ने आरोप लगाया कि सरकार केपीएससी वेटनरी ऑफिसर भर्ती मामले से जुड़ी सच्चाई को सामने आने से रोकने की कोशिश कर रही है।

भारतीय जनता पार्टी (BJP) नेता ने यह भी सवाल उठाया कि जब सीआईडी जांच पहले से जारी थी, तो उच्च न्यायालय की निगरानी वाली जांच को चुनौती क्यों दी जा रही है। उनके अनुसार, उच्च न्यायालय की देखरेख में होने वाली जांच से भर्ती प्रक्रिया में कथित प्रभावशाली राजनीतिक नेताओं, मंत्रियों और बिचौलियों की भूमिका — यदि कोई हो — का पता चल सकता है।

मामले का दायरा और आरोपों की प्रकृति

उच्च न्यायालय के आदेश के तहत जांच का दायरा केएएस और सहायक कार्यकारी अभियंता (AEE) भर्ती परीक्षाओं सहित अन्य केपीएससी परीक्षाओं तक भी विस्तारित होने की संभावना है — वह भी उस दौरान जब ज्ञानेंद्र कुमार केपीएससी के नियंत्रक थे। इस प्रकार, पिछले तीन से चार वर्षों की कई भर्ती प्रक्रियाएं जांच के घेरे में आ सकती हैं।

इस मामले में लगे आरोपों में प्रश्न-पत्र लीक, चयन के लिए धनराशि का लेन-देन, बिचौलियों की भूमिका और परीक्षा रिकॉर्ड में हेरफेर शामिल हैं। ये सभी आरोप अभी जांच के दायरे में हैं और इनमें नामित किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध आपराधिक अपराध अभी न्यायालय में साबित नहीं हुआ है।

आगे क्या होगा

अब सर्वोच्च न्यायालय में दायर एसएलपी पर सुनवाई के बाद स्पष्ट होगा कि एसआईटी जांच आगे बढ़ेगी या स्थगित रहेगी। भाजपा ने सरकार से आग्रह किया है कि वह एसआईटी के साथ सहयोग करे और उसे चुनौती देने के बजाय निष्पक्ष जांच का मार्ग प्रशस्त करे। लाखों उम्मीदवारों का भविष्य इस मामले के परिणाम पर निर्भर है, और यह विवाद कर्नाटक की भर्ती प्रक्रियाओं की पारदर्शिता पर बड़े सवाल खड़े कर रहा है।

संपादकीय दृष्टिकोण

परंतु राजनीतिक संदेश विनाशकारी है। जब सीआईडी की 80% जांच पूरी होने का दावा खुद सरकार कर रही है, तो अदालती निगरानी से एसएलपी का रास्ता चुनना स्वाभाविक रूप से संदेह उत्पन्न करता है। असली सवाल यह नहीं है कि न्यायालय को अधिकारी नियुक्त करने का अधिकार है या नहीं — असली सवाल यह है कि जांच की स्वतंत्रता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए कौन जिम्मेदार है। केपीएससी भर्ती कांड के केंद्र में हजारों उम्मीदवारों का भविष्य है — और यह कानूनी लड़ाई जितनी लंबी खिंचेगी, उतना ही उनका नुकसान होगा।
RashtraPress
24 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कर्नाटक सरकार सुप्रीम कोर्ट में केपीएससी एसआईटी आदेश को क्यों चुनौती दे रही है?
कर्नाटक सरकार को एसआईटी जांच से आपत्ति नहीं है, लेकिन उसका कहना है कि उच्च न्यायालय द्वारा विशेष अधिकारियों को स्वयं नियुक्त करना न्यायिक अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण है। सरकार ने एसएलपी दायर करने का फैसला कानूनी विशेषज्ञों से परामर्श के बाद लिया है।
केपीएससी वेटनरी ऑफिसर भर्ती मामले में क्या आरोप हैं?
इस मामले में प्रश्न-पत्र लीक, चयन के लिए धनराशि का लेन-देन, बिचौलियों की भूमिका और परीक्षा रिकॉर्ड में हेरफेर जैसे आरोप लगे हैं। ये सभी आरोप अभी जांच के दायरे में हैं और किसी भी नामित व्यक्ति के विरुद्ध अपराध न्यायालय में साबित नहीं हुआ है।
उच्च न्यायालय द्वारा गठित एसआईटी का क्या आदेश था?
उच्च न्यायालय ने 21 सितंबर 2026 को वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी आलोक कुमार की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय एसआईटी गठित की थी। एसआईटी को हर 30 दिनों में प्रगति रिपोर्ट देनी थी और 100 दिनों के भीतर जांच पूरी करनी थी।
भाजपा ने इस मामले में क्या सवाल उठाए हैं?
विपक्ष के नेता आर. अशोक ने आरोप लगाया कि सरकार हाई कोर्ट की निगरानी वाली जांच से इसलिए डरी है क्योंकि इससे प्रभावशाली नेताओं और मंत्रियों की संभावित भूमिका उजागर हो सकती है। उन्होंने सरकार से एसआईटी के साथ सहयोग करने की अपील की।
इस जांच से कौन-कौन सी भर्तियां प्रभावित हो सकती हैं?
उच्च न्यायालय के आदेश के तहत जांच का दायरा केएएस और सहायक कार्यकारी अभियंता (AEE) भर्ती परीक्षाओं तक भी विस्तारित हो सकता है। इससे पिछले तीन से चार वर्षों की कई केपीएससी भर्ती प्रक्रियाएं जांच के घेरे में आ सकती हैं।
राष्ट्र प्रेस
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