कीर्ति चक्र विजेता मेजर जनरल सुनील कुमार रजदान का निधन, व्हीलचेयर पर भी देते रहे देश को सेवा
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय सेना के असाधारण वीर और कीर्ति चक्र से सम्मानित मेजर जनरल सुनील कुमार रजदान (सेवानिवृत्त) का 13 अगस्त 2026 को निधन हो गया। उनके जाने से भारतीय रक्षा बलों में गहरे शोक की लहर है। 7वीं बटालियन, पैराशूट रेजिमेंट (7 पैरा एसएफ) के इस जाँबाज अधिकारी ने अपने जीवन से साहस, कर्तव्यनिष्ठा और अदम्य संकल्प की ऐसी मिसाल कायम की, जो पीढ़ियों तक याद रखी जाएगी।
1994 का वह ऐतिहासिक अभियान
1994 में जम्मू-कश्मीर में एक आतंकवाद-विरोधी अभियान के दौरान लश्कर-ए-तैयबा के आतंकवादियों ने कुछ युवतियों को बंधक बना लिया। उस समय लेफ्टिनेंट कर्नल के पद पर तैनात सुनील कुमार रजदान ने अभियान की कमान संभाली और आगे बढ़कर दो आतंकवादियों को मार गिराया।
इस मुठभेड़ में उन्हें पेट में कई गोलियाँ लगीं, जिससे उनकी रीढ़ की हड्डी गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो गई। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद उन्होंने तत्काल चिकित्सा निकासी से इनकार कर दिया और अभियान पूरा होने तक मोर्चे पर डटे रहे — बंधकों को सुरक्षित निकालना सुनिश्चित किया।
कीर्ति चक्र और विशिष्ट सेवा पदक से सम्मान
इस असाधारण वीरता के लिए मेजर जनरल रजदान को भारत के दूसरे सर्वोच्च शांतिकालीन वीरता पुरस्कार — कीर्ति चक्र से नवाज़ा गया। इसके अतिरिक्त उन्हें विशिष्ट सेवा पदक भी प्रदान किया गया, जो उनकी सेवा की व्यापकता और गहराई को रेखांकित करता है।
भारतीय सेना के पहले व्हीलचेयर जनरल
उस अभियान में लगी गंभीर चोटों के कारण उनके शरीर का कमर से नीचे का हिस्सा स्थायी रूप से लकवाग्रस्त हो गया। किंतु इस शारीरिक सीमा को उन्होंने कभी अपने संकल्प के आड़े नहीं आने दिया। दृढ़ इच्छाशक्ति के बल पर वे भारतीय सेना के पहले व्हीलचेयर पर सेवारत जनरल अधिकारी बने — एक ऐसी उपलब्धि जो सैन्य इतिहास में अभूतपूर्व है।
यह ऐसे समय में और भी महत्त्वपूर्ण है जब दिव्यांगजनों की सक्रिय भागीदारी को लेकर राष्ट्रीय विमर्श तेज़ हो रहा है। गौरतलब है कि उन्होंने अपने सक्रिय सैन्य करियर का समापन मुख्यालय इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ में किया, जहाँ उन्होंने महत्त्वपूर्ण शोध कार्यों में योगदान दिया।
रक्षा बलों की श्रद्धांजलि
भारतीय रक्षा बलों ने शोक संतप्त परिवार के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त की है और दिवंगत आत्मा की शांति की प्रार्थना की है। सैन्य हलकों में उनके निधन को एक ऐसे युग के अंत के रूप में देखा जा रहा है जिसने साहस की परिभाषा को नए अर्थ दिए।
मेजर जनरल रजदान का जीवन आने वाली पीढ़ियों के सैनिकों और नागरिकों के लिए प्रेरणा का अक्षय स्रोत बना रहेगा।