लीलावती अस्पताल काला जादू केस: सेशन कोर्ट ने निकेत मेहता का समन रद्द किया, कहा — कलश मिलना अपराध नहीं
सारांश
मुख्य बातें
मुंबई के प्रतिष्ठित लीलावती अस्पताल से जुड़े कथित काला जादू मामले में ग्रेटर मुंबई सेशन कोर्ट ने 29 अक्टूबर 2026 को एक अहम फैसला सुनाते हुए आरोपी निकेत विजय मेहता के खिलाफ जारी समन आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी के कार्यालय के फर्श के नीचे महज कलश मिल जाना अपने आप में कोई आपराधिक कृत्य नहीं है — इसके लिए अपराध के पीछे की मंशा और अन्य आवश्यक तथ्यों का प्रमाण भी अनिवार्य है।
फैसले का विवरण
मझगांव स्थित ग्रेटर मुंबई सेशन कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश कुणाल धनाजी जाधव ने क्रिमिनल रिवीजन एप्लीकेशन नंबर 01/2026 को स्वीकार करते हुए बांद्रा की 12वीं अदालत के न्यायिक मजिस्ट्रेट (प्रथम श्रेणी) द्वारा 8 दिसंबर 2025 को जारी समन आदेश को निरस्त कर दिया। इस फैसले पर 30 अक्टूबर 2026 को हस्ताक्षर किए गए और उसी दिन इसे अपलोड किया गया।
यह ऐसे समय में आया है जब ट्रस्ट प्रशासन को लेकर दो पक्षों के बीच करीब दो दशक लंबी कानूनी लड़ाई चल चुकी है, और अब यह विवाद आपराधिक अदालतों तक पहुँच गया था।
शिकायत की पृष्ठभूमि
शिकायतकर्ता प्रशांत मेहता ने दावा किया था कि वह लीलावती कीर्तिलाल मेहता मेडिकल ट्रस्ट के स्थायी ट्रस्टी हैं। उनके अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय के 18 सितंबर 2023 के आदेश के बाद करीब 20 वर्ष की कानूनी लड़ाई के पश्चात उन्हें ट्रस्ट का प्रशासन सौंपा गया था। प्रशासन संभालने के बाद 21 सितंबर 2024 को उनके कार्यालय कक्ष के फर्श के नीचे से आठ तांबे के कलश बरामद हुए, जिनमें कथित तौर पर मानव अवशेष, चावल, बाल और अन्य तांत्रिक सामग्री होने का आरोप लगाया गया।
शिकायत में आरोप था कि ट्रस्ट के पूर्व प्रबंधन से जुड़े निकेत मेहता और छह अन्य आरोपियों — चेतन मेहता, रश्मि मेहता, भाविन मेहता, सुशील मेहता, निमेश शेठ और आयुष्मान मेहता — ने कथित तौर पर अलौकिक शक्तियाँ प्राप्त करने और ट्रस्टियों को नुकसान पहुँचाने के उद्देश्य से काला जादू किया था। इस संबंध में 27 सितंबर 2024 को बांद्रा पुलिस और विजिलेंस अधिकारी के पास शिकायत दर्ज कराई गई थी।
मजिस्ट्रेट से सेशन कोर्ट तक की प्रक्रिया
पुलिस द्वारा जाँच न किए जाने पर शिकायतकर्ता ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 175 के तहत मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन किया। मजिस्ट्रेट ने 7 फरवरी 2025 को पुलिस जाँच का आदेश देने से इनकार करते हुए शिकायतकर्ता का सत्यापन बयान दर्ज किया। इसके बाद 6 और 13 मार्च 2025 को दो गवाहों — सिविल कॉन्ट्रैक्टर कलूराम चित्रामल सैनी और विपुल दिलीप चावड़ा — के बयान दर्ज किए गए।
इन्हीं बयानों के आधार पर महाराष्ट्र नरबलि और अन्य अमानवीय, अनिष्ट एवं अघोरी प्रथा तथा जादूटोना प्रतिबंधक अधिनियम, 2013 की धारा 3(1), 3(2) और 3(3) के तहत आरोपियों को समन जारी किया गया था।
बचाव पक्ष की दलीलें
निकेत मेहता की ओर से अधिवक्ता आलौकिक आर. पई ने सेशन कोर्ट में दलील दी कि मजिस्ट्रेट ने बीएनएसएस की धारा 223 के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया और बिना तथ्यों पर उचित विचार किए तथा न्यायिक विवेक का इस्तेमाल किए समन जारी कर दिया गया। बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि शिकायत में किसी भी आरोपी की विशिष्ट भूमिका स्पष्ट नहीं की गई है, और यह मूलतः ट्रस्ट से जुड़े पुराने सिविल विवाद को आपराधिक मामले का रूप देने का प्रयास है।
इसके अलावा, बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि काला जादू विरोधी कानून के तहत विजिलेंस अधिकारी की ओर से जाँच और धारा 6(3) के तहत संबंधित सामग्री की जब्ती की अनिवार्य प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया।
आगे की स्थिति
सेशन कोर्ट द्वारा समन रद्द किए जाने के बाद निकेत मेहता को इस प्रकरण में तत्काल राहत मिल गई है। गौरतलब है कि ट्रस्ट से जुड़े अन्य पक्ष अभी भी मामले में शामिल हैं और शिकायतकर्ता के पास उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने का विकल्प खुला है। यह मामला महाराष्ट्र के काला जादू विरोधी कानून की व्याख्या और उसके व्यावहारिक अनुप्रयोग की सीमाओं पर एक महत्त्वपूर्ण मिसाल कायम कर सकता है।