लखनऊ अग्निकांड: 15 मौतों पर अखिलेश यादव का तंज — 'सरकार के लिए SIT बनाना सबसे आसान रास्ता'
सारांश
मुख्य बातें
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने मंगलवार, 23 जून को लखनऊ अग्निकांड में कम से कम 15 लोगों की मौत पर उत्तर प्रदेश सरकार को आड़े हाथों लिया। उन्होंने रिहायशी इलाके में अवैध रूप से चल रही व्यावसायिक गतिविधियों पर निगरानी न रखने के लिए सरकार की जवाबदेही पर सीधे सवाल उठाए। यह हादसा ऐसे समय में सामने आया है जब राज्य में अग्नि सुरक्षा मानकों की अनदेखी को लेकर पहले से ही सवाल उठते रहे हैं।
मृतकों के परिजनों का दर्द, अखिलेश की आवाज़
एक भंडारे के अवसर पर पत्रकारों से बात करते हुए अखिलेश यादव ने कहा, 'कल की घटना दुखद है, क्योंकि इसमें बहुत से छात्रों की जान चली गई। जो लोग वहाँ कोचिंग, नौकरी या काम के लिए गए थे, उनमें से ज़्यादातर लोगों की मौत हो गई।' उन्होंने यह भी बताया कि आग के दौरान बच्चे अपने माता-पिता और भाइयों को फ़ोन कर रहे थे, और कई ने फायर ब्रिगेड को भी संपर्क करने की कोशिश की।
यादव ने कहा, 'जरा सोचिए, जिन परिवारों ने अपने बच्चों को खो दिया है, उनके लिए इससे बड़ा दुख और क्या हो सकता है।' उनके इस बयान ने उन परिवारों की पीड़ा को केंद्र में रखा जो दूर-दराज से अपने बच्चों को पढ़ाई और रोज़गार के लिए लखनऊ भेजते हैं।
सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप
सपा प्रमुख ने उत्तर प्रदेश सरकार पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए और कहा कि यह लखनऊ में जनहानि की पहली घटना नहीं है। उन्होंने पुराने हादसों का हवाला दिया — चारबाग में आग, एक झुग्गी-बस्ती में लगी संदिग्ध आग, और हजरतगंज के एक प्रसिद्ध होटल में हुई अग्निकांड की घटना। यादव का कहना था, 'रिहायशी इलाके में कमर्शियल गतिविधियाँ चल रही थीं' — और इस पर किसी ने आँख नहीं मूँदी, यह सवाल उन्होंने सीधे प्रशासन पर उठाया।
उन्होंने आरोप लगाया, 'इस भाजपा सरकार में सिर्फ लूट मची है।' साथ ही कहा कि 'ऐसा लगता है कि पिछले 10 वर्षों से कोई सरकार ही नहीं है। उनके भ्रष्टाचार का स्तर हर हद पार कर चुका है।'
SIT पर तंज — राम मंदिर दान चोरी से तुलना
अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश सरकार की जाँच-प्रक्रिया पर तीखा व्यंग्य किया। उन्होंने कहा, 'सरकार के लिए बचने का सबसे आसान तरीका एसआईटी बनाना है।' उन्होंने इसकी तुलना अयोध्या के राम मंदिर में दान चोरी की जाँच कर रही एसआईटी से की, यह सुझाव देते हुए कि ऐसी समितियाँ जवाबदेही से बचने का माध्यम बन जाती हैं। गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ वर्षों में कई बड़े हादसों के बाद एसआईटी गठन की घोषणाएँ हुई हैं, लेकिन आलोचकों का कहना है कि इनके नतीजे अक्सर सार्वजनिक नहीं किए जाते।
आम जनता और छात्रों पर असर
इस हादसे में मारे गए अधिकांश लोग कथित तौर पर छात्र और युवा कामगार थे जो लखनऊ में कोचिंग या रोज़गार के सिलसिले में रह रहे थे। रिहायशी इमारत में व्यावसायिक गतिविधियाँ चलाने की अनुमति कैसे मिली, यह सवाल अब जाँच एजेंसियों के सामने है। अग्नि सुरक्षा मानकों का पालन हो रहा था या नहीं, इसकी जानकारी अभी आधिकारिक रूप से सामने नहीं आई है।
आगे क्या
उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से अभी तक आधिकारिक जाँच के स्वरूप की घोषणा की जानी बाकी है। विपक्ष के दबाव और जनता के आक्रोश के बीच यह देखना होगा कि सरकार जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए क्या ठोस कदम उठाती है — और क्या मृतकों के परिजनों को समय पर न्याय मिल पाएगा।