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मधुश्रावणी व्रत: मिथिलांचल की नवविवाहिताएँ सावन में करती हैं पति की दीर्घायु के लिए महादेव की विशेष पूजा

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मधुश्रावणी व्रत: मिथिलांचल की नवविवाहिताएँ सावन में करती हैं पति की दीर्घायु के लिए महादेव की विशेष पूजा

सारांश

बिहार के मिथिलांचल में सावन का महीना नवविवाहिताओं के लिए एक अनूठा अनुष्ठान लेकर आता है — मधुश्रावणी। 14-15 दिनों तक चलने वाला यह व्रत पति की दीर्घायु की कामना से किया जाता है और इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि पूरी पूजा महिला पुरोहित संपन्न कराती हैं।

मुख्य बातें

मधुश्रावणी व्रत बिहार के मिथिलांचल में नवविवाहिताओं द्वारा पति की दीर्घायु के लिए रखा जाता है।
यह अनुष्ठान 14 से 15 दिनों तक चलता है — सावन कृष्ण पक्ष पंचमी से शुक्ल पक्ष तृतीया तक।
पूजा महिला पुरोहित द्वारा संपन्न कराई जाती है — यह मिथिलांचल की विशिष्ट सांस्कृतिक परंपरा है।
अंतिम दिन 'टेमी' अनुष्ठान होता है; अब 'शीतल टेमी' (बिना अग्नि के) का चलन अधिक प्रचलित है।
व्रत के दौरान नवविवाहिता एक वक्त बिना नमक का भोजन करती हैं और समस्त सामग्री ससुराल से आती है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार माता पार्वती ने सर्वप्रथम यह व्रत किया था।

बिहार के मिथिलांचल क्षेत्र में सावन का महीना नवविवाहित महिलाओं के लिए एक अत्यंत पवित्र अनुष्ठान लेकर आता है — मधुश्रावणी व्रत। यह व्रत नवविवाहिताएँ अपने पति की दीर्घायु और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना से रखती हैं, जिसमें भगवान शिव और माता गौरी की विधिवत पूजा की जाती है। इस पूजा की सबसे विशिष्ट बात यह है कि इसे महिला पुरोहित संपन्न कराती हैं — एक ऐसी परंपरा जो मिथिलांचल की सांस्कृतिक पहचान को अलग बनाती है।

मधुश्रावणी क्या है और कौन मनाता है

मधुश्रावणी मिथिलांचल की ब्राह्मण, कर्ण कायस्थ और स्वर्णकार समुदायों की परंपरागत पूजा है। जिस परिवार में उस वर्ष कन्या का विवाह हुआ हो, उस नवविवाहिता को शादी के वर्ष पड़ने वाले श्रावण मास में 14 से 15 दिनों तक यह अनुष्ठान करना होता है। यह त्योहार सावन के कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि से आरंभ होता है और शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को समाप्त होता है।

अनुष्ठान की विधि और नियम

इन दिनों नवविवाहिता दुल्हन के वस्त्र धारण करती हैं और प्रतिदिन मौसमी फूल व पेड़ों की पत्तियाँ एकत्र कर बांस की टोकरियों में रखती हैं। पूजा में कच्ची मिट्टी से बने हाथी, नाग-नागिन और शिव-गौरी की प्रतिमाएँ कोहवर स्थान पर स्थापित की जाती हैं। व्रत के दौरान नवविवाहिता एक वक्त बिना नमक का भोजन करती हैं, ज़मीन पर सोती हैं, और पहले दिन जो बाल बाँधती हैं वही अंतिम दिन तक बाँधे रखती हैं। सुबह शिव-गौरी की नियमित पूजा और शाम को संध्या पूजा का नियम भी पालन किया जाता है।

इस पूजा की एक और अनूठी परंपरा यह है कि जहाँ सामान्यतः देवी-देवताओं को ताजे फूल चढ़ाए जाते हैं, वहीं मधुश्रावणी में मनसा देवी को बासी फूल अर्पित किए जाते हैं। पूजा में जूही और मैनी जैसे पौधों का विशेष उपयोग होता है, जो पर्यावरण के प्रति जागरूकता का प्रतीक भी माना जाता है।

'टेमी' — अग्नि परीक्षा की परंपरा और उसका बदलता स्वरूप

अनुष्ठान के अंतिम दिन नवविवाहिता के घुटनों को 'टेमी' दी जाती है — एक पारंपरिक प्रक्रिया जिसमें घुटनों को अग्नि के संपर्क में लाया जाता है। मान्यता है कि घुटने पर जितना बड़ा घाव होगा, पति की आयु उतनी ही दीर्घ होगी। हालाँकि, अब 'शीतल टेमी' का चलन अधिक प्रचलित हो गया है, जिसमें यह अनुष्ठान बिना आग के किया जाता है। यदि दीपक का उपयोग होता भी है, तो उसे घुटनों के निकट लाकर तुरंत हटा लिया जाता है।

ससुराल की सामग्री और सामाजिक परंपरा

इस पूजा की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि पूजन सामग्री से लेकर भोजन में प्रयुक्त अनाज तक सब कुछ नवविवाहिता के ससुराल से आता है। प्रतिदिन पूजा की समाप्ति पर नवविवाहिता सुहागिन महिलाओं को सुहाग की सामग्री वितरित करती हैं, जिसमें कच्ची पिसी मेहंदी का विशेष महत्व है। पूजा में नाग देवता, गौरी, सूर्य, चंद्रमा और नवग्रह की भी उपासना की जाती है।

पौराणिक महत्व और महिला पुरोहित की भूमिका

पौराणिक मान्यता के अनुसार माता पार्वती ने सर्वप्रथम मधुश्रावणी का व्रत किया था, जिसके फलस्वरूप वे जन्म-जन्मांतर तक भगवान शिव को अपने पति के रूप में प्राप्त करती रहीं। इस व्रत की शुरुआत प्राचीन काल में नवविवाहित महिलाओं को वैवाहिक जीवन में सहजता प्रदान करने के उद्देश्य से हुई थी, ऐसा माना जाता है। यह त्योहार इसलिए भी विशिष्ट है क्योंकि पूरी पूजा महिला पुरोहित द्वारा संपन्न कराई जाती है और वही नवविवाहिता को कथा भी सुनाती हैं — यह परंपरा महिलाओं की धार्मिक सत्ता और सांस्कृतिक नेतृत्व की मिसाल है। आने वाले वर्षों में यह परंपरा मिथिलांचल की सांस्कृतिक विरासत के रूप में और अधिक दस्तावेज़ीकरण की माँग करती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि मिथिलांचल की उस सांस्कृतिक संरचना का प्रतिबिंब है जहाँ महिलाएँ पुरोहित की भूमिका में भी अग्रणी रही हैं — एक तथ्य जो मुख्यधारा की धार्मिक रिपोर्टिंग में प्रायः अनदेखा रह जाता है। 'टेमी' जैसी परंपराओं का 'शीतल' रूप में रूपांतरण यह दर्शाता है कि समाज स्वयं अपनी रीतियों को समय के साथ संशोधित कर रहा है — बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के। साथ ही, पर्यावरण-जागरूकता को अनुष्ठान में बुनना — जूही और मैनी जैसे पौधों के माध्यम से — यह बताता है कि यह परंपरा जड़ नहीं, जीवित है।
RashtraPress
3 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मधुश्रावणी व्रत क्या है?
मधुश्रावणी बिहार के मिथिलांचल क्षेत्र में नवविवाहिताओं द्वारा रखा जाने वाला 14-15 दिनों का व्रत है, जिसमें वे भगवान शिव और माता गौरी की पूजा कर पति की दीर्घायु और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना करती हैं। यह व्रत सावन के कृष्ण पक्ष की पंचमी से शुक्ल पक्ष की तृतीया तक चलता है।
मधुश्रावणी में महिला पुरोहित का क्या महत्व है?
इस पूजा की सबसे विशिष्ट परंपरा यह है कि इसे महिला पुरोहित ही संपन्न कराती हैं और नवविवाहिता को कथा भी सुनाती हैं। यह मिथिलांचल की उस सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है जहाँ महिलाओं को धार्मिक अनुष्ठान में नेतृत्व की भूमिका दी जाती है।
'टेमी' अनुष्ठान क्या होता है और क्या यह अब भी प्रचलित है?
अनुष्ठान के अंतिम दिन नवविवाहिता के घुटनों को 'टेमी' दी जाती है, जिसमें परंपरागत रूप से घुटनों को अग्नि के संपर्क में लाया जाता था। अब 'शीतल टेमी' का चलन अधिक सामान्य हो गया है, जिसमें यह प्रक्रिया बिना अग्नि के की जाती है या केवल तेल का दीपक क्षण भर के लिए पास लाकर हटा लिया जाता है।
मधुश्रावणी व्रत के दौरान नवविवाहिता को कौन-कौन से नियमों का पालन करना होता है?
व्रत के दौरान नवविवाहिता एक वक्त बिना नमक का भोजन करती हैं, ज़मीन पर सोती हैं और पहले दिन जो बाल बाँधती हैं वही अंतिम दिन तक बाँधे रखती हैं। पूजा सामग्री और भोजन का अनाज भी ससुराल से आता है।
मधुश्रावणी का पौराणिक आधार क्या है?
पौराणिक मान्यता के अनुसार माता पार्वती ने सर्वप्रथम मधुश्रावणी का व्रत किया था, जिसके फलस्वरूप वे जन्म-जन्मांतर तक भगवान शिव को अपने पति के रूप में प्राप्त करती रहीं। यह व्रत प्राचीन काल से नवविवाहित महिलाओं को वैवाहिक जीवन में सहजता प्रदान करने के उद्देश्य से प्रचलित माना जाता है।
राष्ट्र प्रेस
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