दिग्विजय सिंह के महाकाल और राम मंदिर पर बयान से विवाद, संत समाज ने बताया निराधार और आपत्तिजनक
सारांश
मुख्य बातें
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह द्वारा उज्जैन के श्री महाकालेश्वर मंदिर और अयोध्या के राम मंदिर को लेकर दिए गए हालिया बयानों पर देशभर के संत समाज ने तीखी प्रतिक्रिया जताई है। विभिन्न धार्मिक संस्थाओं से जुड़े संतों और महंतों ने 4 जुलाई को उनके आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि सनातन परंपराओं और धार्मिक आस्थाओं पर इस प्रकार की टिप्पणी न केवल अनुचित है, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाओं को आहत करती है।
दिग्विजय सिंह ने क्या कहा था
दिग्विजय सिंह ने आरोप लगाया था कि उज्जैन स्थित श्री महाकालेश्वर मंदिर की बहुमूल्य भूमि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से संबद्ध एक ट्रस्ट को अत्यंत कम मूल्य पर आवंटित की गई है और मंदिर की दान राशि में भी अनियमितताएं हो रही हैं। इसके अतिरिक्त उन्होंने अयोध्या के राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा पर भी सवाल उठाए — यह दावा करते हुए कि बिना कलश स्थापना के प्राण प्रतिष्ठा की गई और भगवान राम की प्रतिमा का रंग परंपरा के अनुरूप नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि वर्तमान घटनाएं इन्हीं कारणों से उत्पन्न 'दंड' का परिणाम हैं।
नासिक के महंत की कड़ी प्रतिक्रिया
महाराष्ट्र के नासिक स्थित कालाराम मंदिर के मुख्य पुजारी महंत सुधीर दास पुजारी महाराज ने दिग्विजय सिंह के बयानों की कड़ी निंदा की। उन्होंने कहा कि यह नेता लगातार RSS, विश्व हिंदू परिषद (VHP) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) पर टिप्पणी कर देश के धार्मिक माहौल को प्रभावित करने का प्रयास करते रहे हैं। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि दिग्विजय सिंह वही नेता हैं जिन्होंने अतीत में ओसामा बिन लादेन को 'साहब' कहकर संबोधित किया था, आतंकवादियों के लिए नरम भाषा का प्रयोग किया और 'हिंदू आतंकवाद' जैसे शब्द इस्तेमाल किए। उनके अनुसार ऐसे व्यक्ति से सनातन परंपराओं के प्रति सम्मान की अपेक्षा नहीं की जा सकती।
महंत सुधीर दास ने स्पष्ट किया कि राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा पूर्णतः शास्त्रीय विधि-विधान से संपन्न हुई थी — कलश स्थापना और स्नपन सहित सभी अनुष्ठान विधिवत किए गए। भगवान राम की प्रतिमा के रंग पर उठाए गए सवालों के संदर्भ में उन्होंने कहा कि भगवान राम को अनेक स्थानों पर श्याम या काले स्वरूप में पूजा जाता है — नासिक का कालाराम मंदिर इसका सबसे प्रमुख उदाहरण है। संगमरमर की श्वेत प्रतिमाओं के अस्तित्व से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि अन्य स्वरूप गलत हैं।
प्रतापगढ़ और मिर्जापुर के संतों का मत
उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ स्थित सच्चा बाबा आश्रम के महंत मनोज ब्रह्मचारी ने भी दिग्विजय सिंह के बयान को अनुचित ठहराया। उन्होंने भारतीय शास्त्रों का हवाला देते हुए कहा कि जिस प्रकार गंगा एक होते हुए भी विभिन्न घाटों पर अलग-अलग नामों से जानी जाती है, उसी प्रकार भगवान राम भी विभिन्न स्वरूपों में पूजे जाते हैं। उन्होंने बताया कि वे स्वयं प्राण प्रतिष्ठा समारोह में उपस्थित थे और उन्होंने पूरे धार्मिक अनुष्ठान को प्रत्यक्ष देखा। उनके अनुसार देशभर के संत-महात्माओं, प्रतिष्ठित नागरिकों और प्रधानमंत्री सहित अनेक गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति में यह समारोह शास्त्रीय विधि से संपन्न हुआ था।
उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर में जूना अखाड़े के महंत योगानंद गिरि महाराज ने दिग्विजय सिंह के आरोपों को पूरी तरह निराधार बताया। उन्होंने कहा कि राम मंदिर में स्थापित विग्रह साधारण पत्थर से नहीं, बल्कि गंडकी नदी से प्राप्त शालिग्राम शिला से निर्मित है। भारत की प्राचीन परंपरा में विष्णु, राम, कृष्ण और अन्य देवी-देवताओं की अनेक प्रतिमाएं काले पत्थर से बनाई जाती रही हैं — इसलिए प्रतिमा के रंग पर सवाल उठाना धार्मिक और ऐतिहासिक तथ्यों की अनदेखी है।
राजनीतिक उद्देश्य का आरोप
महंत योगानंद गिरि ने आरोप लगाया कि दिग्विजय सिंह का यह बयान राजनीतिक प्रेरणा से दिया गया है और इसका मकसद सनातन समाज की एकता को कमजोर करना है। हालांकि उन्होंने विश्वास जताया कि ऐसे प्रयास कभी सफल नहीं होंगे और राम मंदिर के प्रति देश की आस्था अटूट बनी रहेगी।
आगे क्या
यह विवाद ऐसे समय में उभरा है जब धार्मिक स्थलों के प्रशासन और राजनीतिक दलों के बीच तनाव पहले से ही चर्चा में है। गौरतलब है कि महाकालेश्वर मंदिर की भूमि आवंटन और दान प्रबंधन से जुड़े दिग्विजय सिंह के आरोपों पर अब तक मंदिर प्रशासन या मध्य प्रदेश सरकार की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। संत समाज की एकजुट प्रतिक्रिया यह संकेत देती है कि यह विवाद आने वाले दिनों में और व्यापक रूप ले सकता है।