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दिग्विजय सिंह 2 अक्टूबर को महाकाल से अयोध्या पदयात्रा पर, राम मंदिर दान का हिसाब माँगेंगे अदालत में

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दिग्विजय सिंह 2 अक्टूबर को महाकाल से अयोध्या पदयात्रा पर, राम मंदिर दान का हिसाब माँगेंगे अदालत में

सारांश

कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह 2 अक्टूबर को महाकाल से अयोध्या पदयात्रा पर निकलेंगे और राम मंदिर को दिए ₹1.11 लाख दान का हिसाब अदालत में माँगेंगे। एसआईटी जाँच के बीच यह कदम धार्मिक दान की जवाबदेही को राजनीतिक नहीं, न्यायिक मंच पर ले जाने की कोशिश है।

मुख्य बातें

दिग्विजय सिंह 2 अक्टूबर 2026 को महाकाल मंदिर, उज्जैन से अयोध्या तक गैर-राजनीतिक पदयात्रा निकालेंगे।
उन्होंने राम मंदिर निर्माण के लिए ₹1.11 लाख का दान दिया था; रसीद और चेक की प्रति उनके पास सुरक्षित है।
5 या 6 जुलाई को वकील से परामर्श के बाद अयोध्या की अदालत में दान के उपयोग की जानकारी माँगने हेतु मामला दर्ज कराएँगे।
राम मंदिर में दान और कीमती सामान की कथित चोरी की जाँच एसआईटी कर रही है।
कांग्रेस के भीतर उज्जैन भूमि आवंटन विवाद पर जीतू पटवारी और दिग्विजय सिंह के बीच मतभेद सामने आए हैं।
यदि अदालत को वित्तीय गड़बड़ी मिली तो दिग्विजय सिंह दान वापस माँगकर किसी शंकराचार्य -संबद्ध ट्रस्ट को देंगे।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने 3 जुलाई 2026 को भोपाल में घोषणा की कि वे 2 अक्टूबर (गांधी जयंती) को उज्जैन के महाकाल मंदिर से अयोध्या तक एक गैर-राजनीतिक पदयात्रा आरंभ करेंगे। 79 वर्षीय नेता का यह कदम राम मंदिर निर्माण के लिए एकत्र किए गए दान में पारदर्शिता की माँग को लेकर उठाया गया है। साथ ही उन्होंने अयोध्या की अदालत में एक याचिका दायर करने की भी घोषणा की है।

पदयात्रा और कानूनी कार्रवाई की घोषणा

दिग्विजय सिंह ने बताया कि पदयात्रा 2 अक्टूबर को महाकाल मंदिर, उज्जैन से शुरू होकर अयोध्या में समाप्त होगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह यात्रा राजनीतिक नहीं, बल्कि श्रद्धालुओं की आस्था और उनके दान की जवाबदेही से जुड़ा विषय है। उन्होंने कहा कि 5 या 6 जुलाई को अपने वरिष्ठ अधिवक्ता से परामर्श के बाद वे अयोध्या जाकर न्यायालय में मामला दर्ज कराएँगे।

दान की रसीद और वित्तीय जवाबदेही की माँग

दिग्विजय सिंह ने खुलासा किया कि उन्होंने राम मंदिर निर्माण के लिए ₹1.11 लाख का दान दिया था और आज भी उनके पास उसकी रसीद तथा चेक की प्रति सुरक्षित है। उन्होंने कहा कि यदि न्यायालय को दान के उपयोग में वित्तीय अनियमितता मिलती है, तो वे अपना दान वापस माँगेंगे और उसे किसी मान्यता प्राप्त धार्मिक संस्था अथवा शंकराचार्य से संबद्ध किसी ट्रस्ट को समर्पित कर देंगे।

यह घोषणा ऐसे समय में आई है जब राम मंदिर में दान और कीमती सामान की कथित चोरी के आरोपों की जाँच एक विशेष जाँच दल (एसआईटी) द्वारा की जा रही है। करोड़ों श्रद्धालुओं ने आस्था के साथ जो दान दिया, उसके उपयोग की जानकारी उन्हें मिलनी चाहिए — यही उनकी केंद्रीय माँग है।

धार्मिक आस्था पर दिग्विजय सिंह का पक्ष

भोपाल स्थित अपने आवास के बाहर 'भगवान राम को चढ़ाए गए चढ़ावे और दान की चोरी करने वालों का प्रवेश वर्जित है' लिखा बैनर लगाने के बाद पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा, 'मैं सनातन धर्म का सच्चा अनुयायी हूँ। मेरा पैतृक स्थान राघौगढ़ है, जहाँ भगवान राघव, हनुमान जी, माता और जगदीश स्वामी के प्राचीन मंदिर पीढ़ियों से मौजूद हैं। वहाँ चौबीसों घंटे दीपक जलते हैं। मेरी आस्था पर कोई सवाल नहीं उठा सकता।' उन्होंने यह भी घोषणा की कि वे अपने घर के बाहर एक और पट्टिका लगाएँगे जिस पर लिखा होगा — 'दान चोरों का मेरे घर में प्रवेश वर्जित है।'

कांग्रेस की आंतरिक राजनीति और उज्जैन भूमि विवाद

यह घोषणा ऐसे समय में हुई है जब मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी मुख्यमंत्री मोहन यादव पर उज्जैन में एक ट्रस्ट को अत्यंत कम मूल्य पर सरकारी भूमि आवंटित करने का आरोप लगा रहे हैं, जिसे भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने सिरे से नकार दिया है। गौरतलब है कि दिग्विजय सिंह ने स्वयं सार्वजनिक रूप से पटवारी के आरोपों पर असहमति जताई थी — उनका कहना था कि उनके पास उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार संबंधित ट्रस्ट कोई निजी संस्था नहीं, बल्कि एक सरकारी इकाई है। इस प्रकार, कांग्रेस के भीतर भी इस मुद्दे पर मतभेद उभरकर सामने आए हैं।

मध्य प्रदेश महिला कांग्रेस द्वारा भोपाल में आयोजित 'सद्बुद्धि यज्ञ' और सामूहिक उपवास कार्यक्रम में बोलते हुए उन्होंने कहा, 'लोगों ने भगवान राम के नाम पर पूरी श्रद्धा के साथ दान दिया। यदि उस धन का दुरुपयोग हुआ है तो निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए और दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई की जानी चाहिए।'

आगे क्या होगा

दिग्विजय सिंह की यह पदयात्रा और न्यायिक पहल मध्य प्रदेश की राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे सकती है। धार्मिक दान में पारदर्शिता का यह मुद्दा अब केवल विपक्षी आरोप तक सीमित न रहकर न्यायालय के दायरे में प्रवेश कर सकता है। यदि याचिका स्वीकार होती है, तो राम मंदिर ट्रस्ट को दान के उपयोग का विवरण सार्वजनिक करना पड़ सकता है — जो इस पूरे विमर्श की दिशा बदल सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसकी परतें राजनीतिक हैं — एसआईटी जाँच के बीच राम मंदिर को घेरने की यह कोशिश कांग्रेस को हिंदू आस्था के मुद्दे पर 'साफ हाथ' वाली पार्टी के रूप में पेश करने का प्रयास है। विडंबना यह है कि वही दिग्विजय सिंह जो अपने ही प्रदेश अध्यक्ष पटवारी के उज्जैन भूमि-आरोपों से असहमत हैं, अब एक समानांतर धार्मिक मोर्चा खोल रहे हैं। न्यायालय में याचिका यदि स्वीकार हुई तो यह नज़ीर बन सकती है — लेकिन असली सवाल यह है कि क्या यह जवाबदेही की लड़ाई है या 2027 के मध्य प्रदेश चुनावी समीकरणों की तैयारी।
RashtraPress
4 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दिग्विजय सिंह की महाकाल-अयोध्या पदयात्रा क्या है और कब शुरू होगी?
यह एक गैर-राजनीतिक पदयात्रा है जो 2 अक्टूबर 2026 (गांधी जयंती) को उज्जैन के महाकाल मंदिर से शुरू होकर अयोध्या में समाप्त होगी। इसका उद्देश्य राम मंदिर निर्माण के लिए एकत्र दान में पारदर्शिता और जवाबदेही की माँग करना है।
दिग्विजय सिंह राम मंदिर दान को लेकर अदालत क्यों जा रहे हैं?
दिग्विजय सिंह ने राम मंदिर निर्माण के लिए ₹1.11 लाख का दान दिया था और उनके पास रसीद व चेक की प्रति मौजूद है। वे अयोध्या की अदालत में यह जानकारी माँगेंगे कि इस दान का उपयोग किस प्रकार हुआ, विशेषकर जब एसआईटी राम मंदिर में दान की कथित चोरी की जाँच कर रही है।
राम मंदिर दान में कथित अनियमितता की जाँच कौन कर रहा है?
राम मंदिर में दान और कीमती सामान की कथित चोरी के आरोपों की जाँच एक विशेष जाँच दल (एसआईटी) कर रही है। दिग्विजय सिंह की न्यायिक पहल इसी पृष्ठभूमि में आई है।
यदि अदालत को दान में गड़बड़ी मिली तो दिग्विजय सिंह क्या करेंगे?
उन्होंने कहा है कि वे अपना ₹1.11 लाख का दान वापस माँगेंगे और उसे किसी मान्यता प्राप्त धार्मिक संस्था या शंकराचार्य से संबद्ध किसी ट्रस्ट को समर्पित कर देंगे।
उज्जैन भूमि विवाद और कांग्रेस के आंतरिक मतभेद क्या हैं?
मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी मुख्यमंत्री मोहन यादव पर उज्जैन में एक ट्रस्ट को कम मूल्य पर सरकारी भूमि देने का आरोप लगा रहे हैं। दिग्विजय सिंह ने इन आरोपों से सार्वजनिक असहमति जताई है, यह कहते हुए कि उनके दस्तावेज़ों के अनुसार वह ट्रस्ट सरकारी इकाई है, निजी नहीं।
राष्ट्र प्रेस
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