महाराष्ट्र में ड्रग डिटेक्शन मशीनें शुरू: 2 मिनट में दवाओं की गुणवत्ता जांच, 8 विभागों में लागू
सारांश
मुख्य बातें
महाराष्ट्र के सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग ने राज्य के सरकारी अस्पतालों में दवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए 26 अक्टूबर 2026 को एक महत्वपूर्ण पहल की शुरुआत की — राज्य के आठ विभागों में आधुनिक ड्रग डिटेक्शन मशीनें स्थापित की गई हैं, जो मात्र दो से तीन मिनट में दवाओं के नमूनों की प्रारंभिक जांच कर सकती हैं। यह कदम सरकारी स्वास्थ्य तंत्र में नकली या घटिया दवाओं की आपूर्ति पर लगाम लगाने की दिशा में उठाया गया है।
मुख्य घटनाक्रम
स्वास्थ्य मंत्री प्रकाश आबिटकर ने सोमवार को मुंबई स्थित आरोग्य भवन में पत्रकारों को यह जानकारी दी। इस अवसर पर स्वास्थ्य विभाग के आयुक्त डॉ. संजय काटकर और डॉ. सुनील भोकरे भी उपस्थित रहे। कार्यक्रम में मशीन की कार्यप्रणाली का सजीव प्रदर्शन भी किया गया।
प्रत्येक ड्रग डिटेक्शन मशीन की कीमत करीब ₹1 करोड़ 20 लाख बताई गई है। विभाग के अनुसार यह मशीन नोबेल पुरस्कार विजेता भारतीय वैज्ञानिक सर सीवी रमन के प्रसिद्ध 'रमन इफेक्ट' पर आधारित तकनीक का उपयोग करती है, जिससे किसी रसायन की आणविक संरचना की तेज़ पहचान संभव होती है।
जांच प्रक्रिया और टीम संरचना
आठों विभागों में मशीनों के संचालन के लिए अलग-अलग दो-सदस्यीय टीमें गठित की गई हैं, यानी कुल 16 अधिकारी और कर्मचारी इस व्यवस्था में तैनात होंगे। सभी संबंधित अधिकारियों को मशीन के उपयोग का प्रशिक्षण दिया जा चुका है।
यदि प्रारंभिक जांच में किसी नमूने में संदेह उत्पन्न होता है, तो उसे पुष्टि के लिए बाहरी प्रयोगशाला भेजा जाएगा। विभाग के पास इस प्रयोजन के लिए 12 सरकारी मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाएँ उपलब्ध हैं और प्रयोगशाला रिपोर्ट लगभग आठ दिनों में मिलने की उम्मीद है।
यादृच्छिक जांच और पारदर्शिता
अब दवाओं की जांच केवल शिकायत मिलने पर निर्भर नहीं रहेगी। स्वास्थ्य विभाग की टीमें हर महीने यादृच्छिक (रैंडम) तरीके से जिला अस्पतालों, महिला अस्पतालों और सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग की अन्य संस्थाओं में उपलब्ध दवाओं के नमूने लेंगी।
गौरतलब है कि मेडिकल वस्तु खरीद प्राधिकरण से खरीदी गई दवाओं के अलावा जिला स्तर पर स्थानीय निधि और स्थानीय खरीद से आई दवाएँ भी इस जांच के दायरे में होंगी। निविदा प्रक्रिया में दिए गए नमूनों और वास्तविक आपूर्ति के बीच संभावित अंतर की पहचान भी इस तंत्र के ज़रिए की जा सकेगी।
यदि जांच में दवा की गुणवत्ता में कमी, नकली दवा या नियमों का उल्लंघन सामने आता है, तो खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) को सूचित कर नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी। फिलहाल यह व्यवस्था सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग के अस्पतालों के लिए सीमित रहेगी।
स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार की योजनाएँ
स्वास्थ्य मंत्री आबिटकर ने यह भी बताया कि 4 नवंबर को मुंबई के यशवंतराव चव्हाण प्रतिष्ठान में एक साथ 1,440 डॉक्टरों को नियुक्ति पत्र दिए जाएंगे। इसके अगले चरण में 1,900 कम्युनिटी हेल्थ ऑफिसर की नियुक्ति प्रस्तावित है, जिनकी परीक्षा प्रक्रिया 25 अक्टूबर को पूरी हो चुकी है और अगले 8 से 15 दिनों में नियुक्ति पत्र मिलने की संभावना है।
इन नियुक्तियों से ग्रामीण, आदिवासी, दुर्गम और कोंकण क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवाओं को मज़बूती मिलने की उम्मीद है। विभाग ने 15,000 कर्मचारियों को स्थायी व्यवस्था में शामिल करने का निर्णय भी लिया है। राज्य में 1.12 लाख स्वास्थ्य केंद्रों के विकास की योजना है जहाँ दवाएँ, इंजेक्शन और डे-केयर सुविधाएँ स्थानीय स्तर पर उपलब्ध होंगी।
आम जनता पर असर
इस पहल से सरकारी अस्पतालों में इलाज करा रहे लाखों मरीजों — विशेषकर ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों — को घटिया या नकली दवाओं से सुरक्षा मिलने की उम्मीद है। महात्मा फुले जनआरोग्य योजना के तहत महंगी पीईटी स्कैन सुविधा शामिल करने की भी योजना बनाई जा रही है, जिसके लिए मरीजों से कोई राशि नहीं ली जाएगी।
स्वास्थ्य संवाद यात्रा के ज़रिए गांवों और बस्तियों में फीडबैक लिया जाएगा। तालुका और विधानसभा स्तर पर स्वास्थ्यवर्धिनी समितियाँ बनाई गई हैं जिनमें विधायक, जिला परिषद और पंचायत समिति के सदस्य शामिल होंगे — इनकी समीक्षा हर तीन महीने पर होगी। इस वर्ष 10 लाख जनआरोग्य समिति सदस्य जोड़ने के लक्ष्य के सापेक्ष अब तक करीब साढ़े छह से सात लाख सदस्य जुड़ चुके हैं।
कुल मिलाकर, महाराष्ट्र सरकार दवाओं की गुणवत्ता निगरानी, जनशक्ति विस्तार और तकनीक-आधारित प्रशासन के समन्वय से सरकारी स्वास्थ्य ढांचे को व्यापक रूप देने की कोशिश कर रही है — अगला बड़ा पड़ाव 4 नवंबर की सामूहिक नियुक्ति है।